ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगेः गांव की हत्या

पिछले दिनों बिहार के कुछ गांवों में जाने का मौका मिला। एक गांव में तकरीबन बीस साल के बाद गया था। मेरे मन-मस्तिष्क में गांव की वही छवि बैठी थी, जब मैंने नब्बे के दशक में उसे देखा था।

(File Photo)

पिछले दिनों बिहार के कुछ गांवों में जाने का मौका मिला। एक गांव में तकरीबन बीस साल के बाद गया था। मेरे मन-मस्तिष्क में गांव की वही छवि बैठी थी, जब मैंने नब्बे के दशक में उसे देखा था। तब गांव में दाखिल होने के पहले दो बड़े-बड़े तालाब होते थे। वहीं गांव के दक्षिणी सीमा पर तीन और तालाब थे। उनमें पानी भी खूब रहता था। जब भी मैं गांव जाता था, तो उन तालाबों में नहाना और खेलना भी होता था। लेकिन इस बरस गया तो पहले वाले दो तालाब नजर नहीं आए।

बल्कि तालाब की जगह पर एक पंक्ति में दुकानें नजर आर्इं। विकास एक अनिवार्य प्रक्रिया है, लेकिन यह देखते ही मेरा माथा घूम गया। पूरे गांव का चक्कर काट आया तो बाकी के उन तीन तालाबों में से दो सूख कर समतल हो चुके थे। उस जमीन पर एक जगह एक मजार की दीवार खड़ी थी और पास में ही मंदिर बन गया था। एक जो तालाब की तरह दिखाई दे भी रहा था, उसमें कूड़ा, गांव के घरों से निकला गंदा पानी और कचरा भरा था।

दूसरी तस्वीर भी बिल्कुल नई थी। गांव न केवल बदल गए, बल्कि डिजिटल भी हो गए। खुली दुकानों और उनके स्वरूप को देख कर यह अनुमान लगाना कठिन नहीं था। लैपटॉप लेकर बैठे गांव के बच्चे उसके जरिए कुछ पढ़ाई-लिखाई करते होंगे या नहीं, यह तो पता नहीं चला, लेकिन भोजपुरी और फिल्मी गाने डाउनलोड करने के काम में वे जरूर जुटे थे। यह भी तो एक किस्म का बदलाव ही था। जहां कभी गांव में डिबिया के पास बैठ कर पिताजी और चाचा ने पढ़ाई की थी, वहां गांव में अब इन्वर्टर भी था, कई घरों में फ्रीज, पंखे, एलसीडी स्क्रीन वाली टीवी भी थी। बदलाव यह भी था कि खेती की जगहें सिमट गई थीं।

खेतों की जमीनें अब घर या दुकान की जगहों में तब्दील हो चुकी थी। यह सब देख कर लगा कि जो लोग कहते हैं कि हमारे गांव अभी पिछड़े हुए हैं तो उनसे कहूं कि कितना और किस तरह पीछे हैं! ठीक है कि गांव के लोगों के पास सुविधा और सुख के साधन नहीं हैं। लेकिन अब के गांव अगर शहर नहीं तो कम से कम कस्बों को पीछे जरूर छोड़ने की होड़ में जरूर हैं। हालांकि वहां के बच्चों के पास आज क्या नहीं है! स्मार्टफोन आम होते जा रहे हैं। कुछ के पास तो महंगी गाड़ी और सुंदर सुसज्जित कमरों वाले घर भी हैं। लेकिन यह देखना जरूरी है कि ये साधन उनके पास कहां से आए। बोलेरो, इनोवा, फॉरच्यूनर या डस्टर जैसी गाड़ियों की अपनी कहानी है। गांव से होकर अगर हाइवे निकल रही है, आधुनिकीकरण हो रहा है तो सरकार को जमीन की जरूरत पड़ती है। अधिग्रहण के बाद जमीन मालिकों को मुआवजा मिलता है। उसके बाद उन पैसों से गाड़ियां खरीद ली जाती हैं और शहरों में मकान।

मुझे यह समझने और स्वीकारने में थोड़़ा समय लगा कि लोगों ने पैसों का इस्तेमाल किस रूप में किया। हालांकि मेरा मानना है कि सुख-सुविधा और गाड़ियों पर घूमने का शौक सिर्फ शहरों-महानगरों में रहने वालों तक ही सिमटा क्यों रहे! उस पर गांवों का भी पूरा हक है। लेकिन यह कैसा आनंद और सुख है जो खेतों और पैतृक जायदाद को बेच कर मिली रकम से इस तरह हासिल किया जाता है!

दूसरी तस्वीर यह है कि गांवों से पलायन भी खूब हुए हैं। उसी गांव के युवा लुधियाना, पंजाब, दिल्ली, कोलकाता, बंगलुरु आदि महानगरों में खपने की कोशिश में हाड़ गला रहे हैं। कोई कारखाने में काम कर रहा है तो कोई फल-सब्जियों की रेहड़ी लगा रहा है। लेकिन शहर में रहने की जिद कह लें या गांव की सुविधाहीन जिंदगी से आजिज आकर गांव छोड़ने का निर्णय, जो भी हो, लेकिन यहां तक आना आसान नहीं रहा होगा। विस्थापन के दौर से गुजरना एक बड़ी पीड़ा होती है। घर में किसी की मृत्यु भी हो जाए तो हम टिकट लेकर तुरंत वहां नहीं पहुंच सकते। अगर पैसे हैं तो हवाई जहाज जैसी सुविधाएं हैं, लेकिन फल की रेहड़ी लगा रहे हैं तो रेलगाड़ी के सिवा और क्या उपाय है!

होली और दिवाली के मौके पर कुछ राज्यों की ओर जाने वाली रेलगाड़ियों में भीड़ और उसकी प्रतीक्षा सूची को देख लेने भर से अंदाजा हो जाता है कि उस राज्य से कितनी भारी संख्या में पलायन हुआ होगा। तब महानगरों से लगातार भीड़ गांवों की ओर भागती दिखती है। गोया जिस शहर में वे मजदूरी या कोई अन्य रोजगार कर रहे थे, वह शहर उनका नहीं है और वे गांव से बिछड़ कर खुश नहीं हैं। मगर हकीकत यही है कि अपना गांव कोई यों ही नहीं छोड़ता, कोई यों ही विस्थापन की जिंदगी नहीं चुनता!

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App