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दुनिया मेरे आगेः धरोहर की शहादत

अल-हदबा’ भी जमींदोज हो गई। अल-नूरानी मस्जिद का नाम भी अब गुजरे जमाने के पन्नों में बंद होकर रह गया है।
Author July 21, 2017 03:06 am
अल हाबदा

अलका कौशिक

‘अल-हदबा’ भी जमींदोज हो गई। अल-नूरानी मस्जिद का नाम भी अब गुजरे जमाने के पन्नों में बंद होकर रह गया है। यानी बामियान के बुद्ध अकेले नहीं हैं जिन्हें कुछ सिरफिरों ने हमारे विरासत के पन्नों से गायब कर दिया था। इसी कड़ी में अब मोसुल की अल-नूरानी मस्जिद और उसकी झुकी मीनार ‘अल-हदबा’ भी जुड़ चुकी है। मुझे ‘अल-हदबा’ नाम ने चौंकाया था। इराकियों ने मोसुल शहर की अल-नूरानी मस्जिद की इस तिरछी मीनार को बड़े प्यार से यह नाम दिया था। ‘अल-हदबा’ यानी कूबड़। मुझे अचरज हुआ था जान कर कि किसी मीनार का भी भला नाम हो सकता है? ‘हदबा’ की कहानी ऐसी ही है। आप भी सुनेंगे तो आपको भी प्यार हो जाएगा। मगर उस प्यार को जताने कहां जाएंगे? मोसुल में तो हदबा बची नहीं। अब वह कुछ तस्वीरों में बाकी है या फिर मोसुल के बाशिंदों के दिलों के किसी कोने में बैठी होगी।

इब्न-बतूता जब चौदहवीं सदी में मोसुल से गुजरा तब उसने भी यह झुकी मीनार देखी थी और उस वक्त तक इसका ‘नामकरण’ भी हो चुका था। पैंतालीस फुट ऊंची गोलाकार मीनार के डिजाइन में ईरानी झलक थी और इसकी चोटी पर एक छोटा-सा, सफेदी में नहाया गुंबद लगा था। तुर्की बादशाह नुरूद्दीन अल जंगी ने मोसुल पर कब्जे के बाद 1172-73 में अल-नूरानी मस्जिद बनवाई थी। मस्जिद की मीनार कब और क्यों झुक गई इस बारे में सही-सही जानकारी नहीं मिलती। मीनार के झुकने के जो किस्से आम हैं, वे भी कम अचरज वाले नहीं हैं। कुछ लोग मानते हैं कि जन्नत के सफर पर जब पैगंबर मुहम्मद आसमान से गुजर रहे थे तो उनके लिए इज्जत का इजहार करते हुए मीनार झुक गई! अब इससे जुड़े किस्से कुछ और भी हो सकते हैं। लेकिन वैज्ञानिकों के दावे ज्यादा सटीक लगते हैं। उनका मानना है कि उत्तर-पश्चिमी हवाओं के थपेड़ों ने इस मीनार को दक्षिण की तरफ झुका दिया था। शायद इसकी र्इंटों को जोड़ने वाला मसाला कमजोर रहा होगा।

कुदरत ने जिसे झुकाया भर था, इंसानी फितूर ने उसे जड़ से ही उखाड़ डाला। बीते दिनों तक ‘अल हदबा’ दजला के पश्चिमी किनारे पर खड़ी थी। इस किनारे बसे इराक के दूसरे सबसे बड़े शहर मोसुल पर 2014 में कहर बरपा था, जब इस्लामिक स्टेट ने इसे अपने कब्जे में ले लिया था। आइएस के मुखिया अबु-बकर अल-बगदादी ने खुद को नया खलीफा घोषित कर डाला और तभी से मोसुल की विरासत को नजर लग गई। शहर के इबादतखाने और कई दूसरे स्मारक एक-एक कर उन्माद का शिकार बनते रहे। मोसुल की लाइब्रेरी में रखी सैकड़ों किताबों और पांडुलिपियों को जला कर खाक कर दिया गया। फिर एक वक्त वह भी आया जब इस मस्जिद को भी उड़ा देने की भनक लगते ही मोसुलवासियों ने इसकी घेराबंदी कर ली और यह बच गई।
इतिहास में ऐसी घटनाओं की गूंज सुनाई देती रही है, जब अपनी साझा विरासत को बचाने के लिए किसी इलाके के लोगों ने एक साथ मिल कर विरोध किया हो। राजस्थान के खेजड़ली गांव में खेजड़ी वृक्ष को बचाने के लिए बिश्नोइयों का बलिदान, उत्तराखंड में जंगलात बचाने की खातिर शुरू हुए ‘चिपको आंदोलन’ से लेकर बीते महीने दिल्ली के अरबिंदो मार्ग पर सड़कें चौड़ी करने के लिए काटे जाने वाले पेड़ों की जीवन-रक्षा में उतरे शहर भर के वृक्ष-प्रेमियों का आंदोलन दरअसल अपनी सामूहिक धरोहर को बाद की पीढ़ियों के लिए बचाने की कोशिश ही तो है!
हमलावरों का सबसे पसंदीदा शगल होता है कब्जाई गई जमीन के सीने पर खड़े स्मारकों को उखाड़ फेंकना। फिर उस मलबे पर नई इबारत दर्ज करना। सीरिया, लेबनान, ईरान, इराक, तिब्बत और अब मोसुल की ‘अल-हदबा’ तक यही तो होता आया है। हर नया हमलावर हर बार पिछले साम्राज्य की निशानियों को मिटाने में अपनी सारी ताकत झोंक देता है। उसके अदब-कल्चर, ईमान-इमारत-पहचान को नष्ट करने में ही अपनी फतह का ऐलान समझता है। उस जमीन के इतिहास पर लीपापोती या उन स्मारकों की हस्तियों को ही मिटा देने की कोशिश, जिनसे इतिहास बोध होता है, हर दौर में हमेशा होती आई है।

ऐसा करना दोतरफा निशानेबाजी की तरह होता है। एक, हार के बाद इलाके के समृद्ध इतिहास, उसकी सांस्कृतिक धरोहर, जुबान, रिवायतों, मजहब वगैरह को सदा के लिए मिटा डालना, ताकि पुराने का कोई नामलेवा न बचे। दूसरे, जीती गई जमीन और उसके पुराने बाशिंदों को पल-पल उनकी गुलामी का अहसास कराना। सांस्कृतिक चिह्नों को उजाड़ कर उनकी जगह नई इबारत लिखना जेहनी गुलामी का सबसे कारगर हथियार है। पुरानी मुद्राओं को चलन से बाहर करना भी इसी रणनीति का हिस्सा होता है। बेशक, अल-नूरानी और अल-हदबा की शहादत के साथ इतिहास का एक और लम्हा फना हो गया। लेकिन इराक में दस हजार दीनार के बैंक नोट पर वे दोनों बची रह गई हैं। मोसुलवासियों की यादों में भी!

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