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दुनिया मेरे आगेः खुश रहने का हुनर

अगर आप अपने बच्चों को खुश देखना चाहते हैं तो पहले हमें खुद यह कला सीखनी होगी। हम बच्चों को भारी-भरकम तोहफे देकर यह सोचते हैं कि शायद उसकी खुशी इसमें छिपी है। लेकिन यह एकदम गलत है, क्योंकि यह एक तरह उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करने का सामान भर है।

पेरेंट्स बेटे को रोजाना समाझाते हैं कि बेटा, देर तक मोबाइल चलाते रहना और फिर आधी-आधी रात तक टीवी देखते रहना सेहत के लिए बहुत हानिकारक है। इसके बाद वह कमरे में जाकर बिस्तर पर लेट जाता है। (फोटो-pixabay.com)

विलाश जोशी

यह देख कर अक्सर बहुत दुखी हो जाता हूं कि मेरा बच्चा खुश होना ही भूल गया है। ऐसी भी बात नहीं है कि उसने कभी मुझसे कुछ मांगा हो और मैंने उसे न दिया हो। हम पति-पत्नी के सरकारी नौकरी में होने के नाते रोजमर्रा का एक रूटीन है। सुबह की पूरी तैयारी के बाद हम दोनों दफ्तर के लिए निकलते हैं और बेटा विद्यालय। शाम को हम जब थके-हारे लौटते हैं, तब बेटा हमें मोबाइल में उलझा नजर आता है। मोबाइल से दिल भर जाने के बाद वह टीवी देखने में मशगूल हो जाता है। हम उसे रोजाना समाझाते हैं कि बेटा, देर तक मोबाइल चलाते रहना और फिर आधी-आधी रात तक टीवी देखते रहना सेहत के लिए बहुत हानिकारक है। इसके बाद वह कमरे में जाकर बिस्तर पर लेट जाता है। देर रात तक टीवी देखते रहने के कारण वह सुबह देर से उठता है। वह उठाने की कई कोशिशों के बाद। एक दिन उसने मेरे सामने उसके स्कूल के शिक्षक का लिखा नोट दिया, जिसमें लिखा था- ‘कृपया, आप मुझे जल्दी आकर मिलें। मैं आपसे कुछ बातें करना चाहता हूं’।

अगले दिन मैं उसके विद्यालय गया। शिक्षक महोदय कक्षा में थे, इसलिए मैं प्रतीक्षा कक्ष में बैठ कर इंतजार करने लगा। दिमाग में कई बातें घूमने लगीं। एक समय हम भी बच्चे थे। उस समय हम खेल के मैदान में जाकर क्रिकेट या कबड्डी खेलते थे। साधारणतया उस समय सबके घरों में ही गरीबी का दौर था, इसलिए हम सिगरेट और माचिस की डिब्बी के छिब्बे इकट्ठा कर उनसे खेलते थे। छुट्टी के दिन गिल्ली-डंडा, छुपम-छुपाई, गुलाम-डंडा, भंवरे और सरिया-गडावनी आदि खेल खेलते थे। कितना मजा आता था खुले मैदान में खेलने में। तेज धूप रहती थी, फिर भी पसीने में नहाते हुए मैदान में दौड़ते रहते थे।

हमारे पास उन दिनों पैसे नहीं होते थे और खेलने के साधन भी पर्याप्त नहीं होते थे, फिर भी हम एक दूसरे के साथ मिल कर खेलते और खुश होते थे। जब तीन-चार महीने में एक बार हमारे माता-पिता कोई फिल्म देखने ले जाने की बात करते थे, तो सुबह से ही फिल्म देखने जाने का एक आकर्षण और जिज्ञासा हमारे मन में रहती थी। तब लगता था कि कब शाम होगी और हम फिल्म देखने सिनेमा हॉल में जाएंगे। उन दिनों फिल्म देखने जाना भी किसी बड़े उत्सव से कम आनंददायक नहीं था। हमारा बचपन कितने लड़कपन में गया, मालूम ही नहीं पड़ा। जबकि आज हम अपने बच्चों को सारी सुविधाएं दे रहे है, फिर भी उनके चेहरे से खुुशी नदारद है। कहां गईं उनकी खुशियां? कौन चुरा कर ले गया उनका लड़कपन?

अक्सर लगता है कि उनके प्रथम अपराधी हम पालकगण ही हैं। हमने ही खुद उन्हें मोबाइल और टीवी की दुनिया में धकेल दिया है। हमें दफ्तर जाना है तो बच्चों से कहा- ‘बेटा, हम दफ्तर जा रहे हैं, तुम थोड़ी देर मोबाइल पर खेल खेलना, फिर थोड़ा टीवी देख लेना और उसके बाद पढ़ाई करने बैठ जाना’। या फिर कभी-कभी हमें किसी पार्टी में जाना हुआ तब कहते हैं कि बेटा, तुम पड़ोस के अपने दोस्त को अपने घर बुला लेना और टीवी पर कोई फिल्म देखते रहना।
बहरहाल, बेटे के स्कूल में बुलाने पर मैं उसके शिक्षक के कक्ष में गया तो उन्होंने मेरी जिज्ञासा को भांपते हुए कहा- ‘आपका बच्चा प्रतिभाशाली है। वह विद्यालय की हर एक गतिविधियों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेता है। लेकिन मैंने गौर किया है कि फिर भी उसके चेहरे पर जो खुशी नजर आनी चाहिए, वह मुझे नजर नहीं आती।’

मैंने कहा कि आप उसके क्लास टीचर हैं, इसलिए मैं आपसे ही निवेदन करता हूं। हम क्या करें कि हमारे बच्चे के चेहरे पर सच्चे दिल से उसके खुश होने का नूर हमको भी नजर आ सके! इस पर वे बोले- ‘आज के आपाधापी के दौर में किसी भी माता-पिता के पास अपने बच्चों को देने के लिए ‘क्वालिटी समय’ है ही नहीं। शायद इसीलिए हमारे बच्चे स्वाभाविक रूप से खुश होना भूल गए हैं।

अगर आप अपने बच्चों को खुश देखना चाहते हैं तो पहले हमें खुद यह कला सीखनी होगी। हम बच्चों को भारी-भरकम तोहफे देकर यह सोचते हैं कि शायद उसकी खुशी इसमें छिपी है। लेकिन यह एकदम गलत है, क्योंकि यह एक तरह उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करने का सामान भर है। अगर आप अपने बच्चे के चेहरे पर सच्ची खुशी देखना चाहते हैं तो उन्हें अपना बेहतरीन समय दें। उनके साथ रह कर पिकनिक मनाएं, उन्हें किसी पार्क में ले जाएं। उनके साथ बच्चे बन कर मैदान में खेलें। तब जो खुशी उनको मिलेगी, वही आपके लिए भी खुशी के कीमती पल होंगे। आप जो उन्हें देंगे, वही वे भी आपको लौटाएंगे।’
बेटे के स्कूल से लौटते वक्त उस शिक्षक के सारे शब्द मेरे दिमाग में किसी चलचित्र की तरह चल रहे थे। जब हम आज अपना समय उन्हें देंगे, तभी उनका कल हमें खिलखिलाता नजर आएगा। लगभग यही या इससे मिलती-जुलती बातें ही सब बच्चों पर लागू होती हैं और यही उनके खुश रहने का असली हुनर है।

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