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दुनिया मेरे आगेः बदलाव की बयार

दादी अक्सर बताती हैं कि पहली बार टेलीविजन सेट आया था तो पूरे गांव के लोग उसे देखने आ गए थे। उस समय टीवी पर जब कोई खास कार्यक्रम आने वाला होता था तो बहुत सारे लोग हमारे आंगन में इकट्ठा हो जाते थे।

Author January 18, 2018 3:13 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

तनिष्का वैद्य

दादी अक्सर बताती हैं कि पहली बार टेलीविजन सेट आया था तो पूरे गांव के लोग उसे देखने आ गए थे। उस समय टीवी पर जब कोई खास कार्यक्रम आने वाला होता था तो बहुत सारे लोग हमारे आंगन में इकट्ठा हो जाते थे। रामायण या महाभारत जैसे धारावाहिक टीवी पर प्रसारित होते तो बुजुर्ग महिलाएं टीवी के सामने दीपक और अगरबत्ती लगा कर बैठ जाती थीं। लेकिन उस समय के बारे में हम आज सोचते हैं तो लगता है कि क्या वाकई ऐसा हुआ होगा! आज हमारे हाथों में आधुनिक मोबाइल या स्मार्टफोन है और लगता है कि दुनिया हमारी अंगुलियों पर है। कोई भी जानकारी पाने के लिए या हमारा पसंदीदा कार्यक्रम देखने के लिए हमें बस अंगुलियों से छूने या क्लिक करना पड़ता है।

यह बदलाव कई पीढ़ियों के बाद या सदियों पुराना नहीं है, बल्कि महज पच्चीस-तीस सालों के दौरान हमारे समाज में आया है। इस तरह हम लगातार बदलते जा रहे हैं। अश्वेत पृष्ठभूमि के दार्शनिक हेराक्लीटस ने भी यही बात कही थी कि परिवर्तन ही स्थिर है। परिवर्तन ही जीवन का नियम है। दुनिया रोज बदलती है। हमारा समाज इन बदलावों को अनुभव करता है। आजकल के बुजुर्ग अक्सर यही कहते हैं कि उनके समय का समाज अब पूरी तरह बदल चुका है। मजे की बात यह है कि अलग-अलग आयु वर्ग के लोग भी यही बात दोहराते हैं। जाहिर है, इसका आशय साफ है कि दुनिया हर बार बदलती है। यानी हर कुछ सालों में दुनिया पूरी तरह बदल जाती है। पल-पल बदलता हुआ समय और समाज इसे कुछ ही सालों में पूरी तरह बदल देता है।