ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगेः बचपन का खेल

कट्टी...कट्टी...कट्टी! एक बच्चे ने दूसरे से कहा और उनकी दोस्ती खड़े-खड़े खत्म हो गई। अब दोस्ती हैरान है कि अचानक से यह क्या अबोला हो गया!

Author November 28, 2017 1:47 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

राजेश सेन

कट्टी…कट्टी…कट्टी! एक बच्चे ने दूसरे से कहा और उनकी दोस्ती खड़े-खड़े खत्म हो गई। अब दोस्ती हैरान है कि अचानक से यह क्या अबोला हो गया! एक लम्हे में पक्का याराना रुष्ट हो गया! यह बात है उस सुदूर बचपन की, जब कट्टी कभी दोस्तियों के बीच का खात्मा तो कतई नहीं हुआ करती थी। तब कट्टी के बाद पुच्ची करने का एक व्यावहारिक विकल्प हमेशा मौजूद रहा करता था। कोई भी कट्टी, पुच्ची किए बगैर लंबे अवकाश तक जीवित नहीं रहा करती थी। कल नहीं तो परसों, परस्पर दोस्ती एक बार फिर गांठ ही ली जाती थी। गंभीर से गंभीर अबोला फिर बोलचाल में तब्दील हो जाया करता था। बड़ी से बड़ी नाराजगी तुरंत ही पैच-अप हो जाती था। दरअसल, बचपन की निश्छल और निस्वार्थ यारियां ऐसे ही रफू कर दी जाती थीं। छोटी-मोटी अनबन हो जाती थी, लेकिन दोस्तियों में कभी कोई गंभीर खटास पैदा नहीं हुआ करती थी।

मगर अब जमाना बदल चुका है। बच्चे अब कट्टी-पुच्ची नहीं करते बल्कि वे स्थायी अबोला कर लेते हैं। गुस्सा तो मानो छोटे-छोटे बच्चों तक की नाक पर चौबीसों घंटे विराजमान रहता है। वे अपनी नाराजगी को कभी भूलते नहीं, बल्कि उसे बड़ों की तरह पाल-पोस कर रखते हैं। यह एक अजीब किस्म का बदलाव है, जो हम बच्चों के व्यवहार में अक्सर देखते हैं। छोटे-छोटे बच्चे तमाम किस्म के अपराधों में लिप्त पाए जा रहे हैं। यह बदलाव हमारे बच्चों को असहिष्णुता की ओर ढकेल रहा है। कहीं बच्चों द्वारा हत्या कर देने तो कहीं बलात्कार के किस्से रोज सुनाई दे रहे हैं।

भूमंडलीकरण के बाद बच्चों की दोस्ती सोशल मीडिया पर बढ़ रही है। किसी बच्चे को अपने पड़ोसी के बच्चे से भी बात करनी है तो वह उससे आमने-सामने बात करने के बजाय नेट और मोबाइल पर ही दिन-रात चैट कर लेता है। लेकिन इस तरह की बातचीत कभी दो बच्चों के बीच संवेदनशीलता के तंतुओं को नहीं उभार पाती। अतिशय व्यस्तता, मिलने-जुलने पर लगी पाबंदी, अविश्वास आदि चीजों ने बच्चों को अकेला कर दिया है। ठेठ बचपन में ही उनसे परिपक्वता की उम्मीद की जा रही है। कहना चाहिए कि बचपन में ही हम उन्हें प्रौढ़ बना देना चाहते हैं। इस तरह हम उनसे उनका स्वाभाविक बच्चों वाला व्यवहार छीन ले रहे हैं। बच्चा जितना गंभीर दिखाई देता है, हम समझते हैं कि वह होशियार हो गया है। लेकिन यह ठीक नहीं है। आगे चल कर ऐसे ही बच्चे आक्रामक हो जाते हैं या अवसाद में चले जाते हैं। बच्चों की दोस्तियां अब अपने हम-उम्र दोस्तों के बजाय अपने कोर्स की भारी-भरकम पुस्तकों से भी हो चली हैं। बचा-खुचा समय मोबाइल और लैपटॉप ने उनसे छीन लिया है। वे चौबीसों घंटे जैसे एक बोझ ढोए चले जा रहे हैं। कभी थोड़ी-बहुत फुर्सत मिले भी, तो वे गली-मोहल्ले के बाल-सखाओं के साथ किंचित खेल भर लेते हैं। और खेलते-खेलते अगर थोड़ी-बहुत देर हो जाए तो परिजन आवाज लगा कर अपने नौनिहालों को तुरंत घर बुला लेते हैं कि ‘बेटा दिन भर खेलते ही रहोगे या फिर अपना होमवर्क भी निपटाओगे!’ मानो बच्चे केवल अपने परिजनों की महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए इस धरती पर पैदा हुए हैं।

अपना बचपन खोते बच्चों के साथ एक दिक्कत और भी है। उनके खेलने के मैदान सिमट कर रह गए हैं। शहरों में तो मुहल्लों में चलने भर की जगह नहीं बच रही है, फिर खेल-कूद तो बड़ी बात हो गई है। प्रदूषण, शोर और गंदगी भी शहरी जीवन का हिस्सा बन चुके हैं। अब बच्चे खेलने जाएं तो आखिर कहां जाएं? मैदान ही नहीं रहे तो वे कहां जाकर खेलें। कई बार वे मन मार कर गली-मोहल्लों की सड़कों को ही खेल का मैदान समझकर थोड़ा-बहुत कूद-फांद कर लेते हैं। कहते हैं कि खेल के बगैर बचपन अधूरा है। अब जब बच्चा शारीरिक-श्रम ही नहीं करेगा, तो आगे चल कर उसके शारीरिक रूप से कमजोर होने को भी कोई रोक न सकेगा।

विडंबना यह है कि बच्चों के इस छीजते बचपन को लेकर जिम्मेदार संस्थाएं भी कोई चिंता जाहिर नहीं कर रही हैं। बच्चों का बचपन छीन कर हम जिसे अपना कथित भौतिक विकास समझ रहे हैं, वास्तव में वह आने वाली पीढ़ी के लिए जहर साबित होने वाला है। इस बदलते दौर में बच्चों के मन की कोमलता को बचाने की जरूरत है। इसके लिए जरूरी है कि उसके आंतरिक और बाह्य, दोनों वातावरण ठीक रहे। बच्चे अब अपने हमउम्र मित्रों से आपस में सिर्फ अबोला नहीं करते, बल्कि उन पर बुरी तरह कुपित हो जाते हैं। वे कट्टी-पुच्ची के खेल से दूर जा रहे हैं। वे असमय बड़े हो रहे हैं, यह चिंताजनक है। जरूरी है कि बच्चों को उनके स्वाभाविक खेल उन्हें लौटाए जाएं। बचपन को बचपन ही रहने दिया तो ही अच्छा!

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App