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दुनिया मेरे आगेः मटकी का पानी

यों हर शहर की अपनी परंपरा होती है। उसी परंपरा पर शहर की जिंदगी का एक हिस्सा जीवंत दिखता है।

Author March 31, 2018 2:05 AM
कुछ समय पहले नई मटकी खरीदने के लिए बाजार जाना पड़ा, क्योंकि मेरे शहर में वर्ष में दो बार नई मटकी की पूजा करने का रिवाज है। यह परंपरा कब और क्यों पड़ी, आज तक किसी ने इसका ठोस जवाब नहीं खोजा, लेकिन इतना जरूर है कि नई मटकी की पूजा करना जरूरी माना जाता है, क्योंकि शीतला अष्टमी के उस दिन से ही गरम खाद्य पदार्थों को त्याग कर ठंडा भोजन और ठंडा पानी पीना शुरू कर दिया जाता है, यानी एक दिन पहले बनाए हुए भोजन का ही सेवन करते हैं।

बृजमोहन आचार्य

यों हर शहर की अपनी परंपरा होती है। उसी परंपरा पर शहर की जिंदगी का एक हिस्सा जीवंत दिखता है। लेकिन इस भागदौड़ की जिंदगी और संयुक्त परिवारों के टूटने की वजह से परंपराएं हाशिये पर आ खड़ी हुई हैं। एकल परिवारों की ओर बढ़ते शहरों और महानगरों में किसी को किसी से कोई मतलब नहीं है। फिर भी यह कह सकता हूं कि मेरा शहर बीकानेर आज भी कुछ खास परंपराओं को संभाल और बचा कर रखे हुए है। चाहे किसी भी मजहब का त्योहार हो, उन्हें मनाने के लिए लोगबाग अपना कीमती समय ही निकाल लेते हैं। यानी परंपराओं को समेटे इस शहर में हर त्योहार और पर्व उल्लास के साथ मनाते हैं।

कुछ समय पहले नई मटकी खरीदने के लिए बाजार जाना पड़ा, क्योंकि मेरे शहर में वर्ष में दो बार नई मटकी की पूजा करने का रिवाज है। यह परंपरा कब और क्यों पड़ी, आज तक किसी ने इसका ठोस जवाब नहीं खोजा, लेकिन इतना जरूर है कि नई मटकी की पूजा करना जरूरी माना जाता है, क्योंकि शीतला अष्टमी के उस दिन से ही गरम खाद्य पदार्थों को त्याग कर ठंडा भोजन और ठंडा पानी पीना शुरू कर दिया जाता है, यानी एक दिन पहले बनाए हुए भोजन का ही सेवन करते हैं। कहने का आशय यह है कि सर्दी को उस दिन विदा कर दिया जाता है। जो लोग गरम पानी से स्नान करते हैं, वे उस दिन से ठंडे या सामान्य पानी से स्नान करना शुरू कर देते हैं। मटकी पूजने का दूसरा मौका अक्षय तृतीया के दिन होता है, जिस दिन गरमी को पूरे परवान पर माना जाता है। ऐसे में मटकी का पानी पीने से स्वास्थ्य खराब नहीं होता है।

यानी दोनों ही मौकों पर मटकी पूजन परंपरा के साथ-साथ स्वास्थ्य का सवाल भी जुड़ा हुआ है। इन दो दिनों में जितनी मटकियां बाजार में बिकती हैं, उतनी तो गरमी के पूरे मौसम में नहीं बिकतीं। खैर, जब मैं मटकी खरीदने लगा तो उसकी कीमत सुन कर सिर चकरा गया। जब हम छोटे थे तो अनाज के बदले मिट्टी से बने बर्तन निशुल्क मिल जाया करते थे। लेकिन आज बिना पैसों के कुछ भी नहीं मिलता है। एक मटकी की कीमत सौ रुपए से लेकर ढाई सौ रुपए तक बताई गई। आदत से लाचार होने के कारण मटकी खरीदने के लिए मैं मोलभाव करने लगा। लेकिन साथ में पत्नी थीं और उन्होंने मटकी बेचने वाले मजदूर की मनोदशा को पढ़ लिया था। फिर जितनी कीमत एक मटकी की बताई गई, वह मुझे देनी ही पड़ी।
हालांकि आज के युग में शहरों में ज्यादातर घरों में लोग फ्रिज रखते हैं। गरमी में सूखे हलक को ठंडक पहुंचाने के लिए फ्रिज में रखी बोतल ही काम आती है। उसके बाद भी मटकी का पानी पीने का जो सुख है, वह फ्रिज की बोतल के पानी में कहां! नई मटकी का ठंडा पानी जब हलक से नीचे उतरता है तो उसमें मिट्टी की सोंधी खुशबू से मन तृप्त हो जाता है। इसके अलावा, गरमी की रातों में मकान की मुंडेर पर भी रखी मटकी में भरा पानी भी गले को तर कर एक अलग ही अहसास कराता है। मटकियों को हर रोज साफ पानी से धोना और बच्चों को हाथ नहीं लगाने देना- ये ऐसे नियम थे जो हर घर में सख्ती से लागू होते थे। लेकिन आज ये सब नियम भागमभाग की जिंदगी के बीच हमसे दूर होते जा रहे हैं।

आज बड़ों की तरह बच्चा भी गरमी में कहीं भी बाहर से आने पर सबसे पहले फ्रिज में रखी बोतल का पानी ही पीता है। उसे यह आभास नहीं है कि बोतल के पानी के बजाय मटकी का पानी कितना गुणकारी और स्वास्थ्यवर्द्धक है। लेकिन माता-पिता भी मटकी से लोटा भरने के बजाय सीधे हाथ में बोतल ही पकड़ाते हैं। बच्चा जब छोटा होता है तो मां भी उसे बोतल का दूध पिलाना पसंद करती है। हालांकि महिलाओं का कामकाजी होना वक्त की कमी का एक बड़ा कारण है। लेकिन अब मटकी का अर्थ सीधे-सीधे गरीबी से जोड़ा जाने लगा है। मेरे शहर में तो मटकी को गरीबों का फ्रिज ही कहा जाने लगा है। हालांकि एक गरीब व्यक्ति के लिहाज से इसकी कीमत अब ज्यादा होने लगी है। लेकिन परंपराओं से व्यक्ति का बंधन ऐसा है, जिसके चलते साल में दो बार मटकी खरीदनी पड़ती है, भले ही बाद में उसे एक किनारे रख दिया जाता है। अब तो ऐसा लगता है कि आने वाले कुछ सालों में मटकी केवल पूजने के लिए ही काम आएगी। इसके निर्माण के लिए चाक चलाने और तपती आग के सामने बैठने वाले कर्मकार को अपना पेट पालने के लिए शायद दूसरे काम की तलाश में ही भटकना पड़ेगा!

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