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दुनिया मेरे आगेः भोज के बरक्स

गांव से किसी के देहांत की खबर आई थी। परिजन के जाने से मन दुखी था, लेकिन दुख का एक और कारण भी था और वह था भोज।
Author December 30, 2017 04:14 am
भोजन की बर्बादी देखकर मन में उटथी है कचोट

निशा झा

गांव से किसी के देहांत की खबर आई थी। परिजन के जाने से मन दुखी था, लेकिन दुख का एक और कारण भी था और वह था भोज। उसे भोज नहीं, बल्कि महाभोज कहा जा सकता है। भोज शादी या किसी अन्य खुशी पर आयोजित समारोह के मौके पर हो या फिर किसी की मौत के बाद श्राद्ध पर, गांव और समाज में ज्यादातर लोग उत्साहित दिखते हैं। लेकिन मैं अगर दुखी थी तो इसकी एक खास वजह थी। मैंने अक्सर देखा है कि भोज और शादी में बारात के नाम पर हजारों-लाखों रुपए खर्च कर दिए जाते हैं। धन के साथ-साथ काफी मात्रा में अन्न की भी बर्बादी होती है। अन्न उपजाने के लिए किसानों की मेहनत और अनाज की महत्ता को मैं बखूबी समझती हूं। इसलिए जब किसी स्तर पर इसकी बर्बादी देखती हूं तो मन में कचोट उठती है। हालांकि समाज में अपने आसपास यह एक आम स्थिति है।

दरअसल, कुछ समय पहले मैं एक श्राद्ध के भोज में गांव में थी। वहां देखा कि समाज के लोग चाहते थे कि अधिक से अधिक लोगों को खाने पर आमंत्रित किया जाए और श्राद्ध के भोज का व्यापक आयोजन हो। हालांकि जिनके घर में किसी की मौत हुई थी, उनके परिवार की माली हालत खस्ता थी। ऐसे में वे लोग भोज का दायरा बढ़ाना नहीं चाहते थे। लेकिन समाज के दबाव में आकर उन्हें उनकी थोड़ी बात माननी पड़ी। शर्त रखी गई कि पहले दिन के भोज में सामान्य चावल-दाल का खाना होगा और दूसरे दिन पूरी-सब्जी के साथ रसगुल्ला-गुलाबजामुन की व्यवस्था भी होगी। आजकल के भोज में खाजा-लड्डू और बुंदिया जैसी मिठाइयों का मिलना शायद ही कहीं देखा जाता है। गुलाबजामुन भी कोई नहीं पूछता, इसलिए रसगुल्ला के इंतजाम पर खास जोर था। गांव, समाज, रिश्तेदार, परिवार के सभी लोग खुश हुए। खाना खाने के बाद ज्यादातर पत्तलों यानी पत्तों से बनी थाली में कई-कई रसगुल्ले और बाकी खाना छोड़ दिया गया था। वह सब फेंका गया।

इस तरह अन्न की बर्बादी देख मैं हैरान और दुखी थी कि लोग ऐसा कैसे कर सकते हैं! जिनकी मौत के बाद श्राद्ध के भोज का आयोजन था, वे एक आदर्श व्यक्ति और पेशे से शिक्षक थे। उन्होंने अपना जीवन अपने विद्यार्थियों को पढ़ाने के अलावा लोगों की छोटी-मोटी समस्या सुलझाने और दुख-दर्द बांटने में बिता दिया। वे गरीब, असहाय, बेसहारा महिलाओं की मदद करते थे और गरीब विद्यार्थियों को पढ़ने के लिए भी पैसा देते थे। उन्होंने अपने जीवन में कभी फिजूलखर्ची नहीं की। मैं सोचती रही कि वे अगर आज होते तो निश्चित रूप से यही कहते कि मेरे श्राद्ध पर जो लाख रुपया खर्च करने जा रहे हो, उसका सदुपयोग करो, गांव में एक पुस्तकालय खुलवा दो। इससे गांव में पढ़ने-लिखने की संस्कृति मजबूत होगी, गांव आगे बढ़ेगा और खुशहाल होगा।

इसी तरह, शादी-विवाह के दौरान होने वाले भोज में भी ऐसा देखने को मिलता है। जब तक पत्तल पर या प्लेट में खाना न छूटे तब तक शायद लोगों का मन नहीं भरता। जब तक बाल्टी में भर-भर कर गड्ढे में अन्न नहीं फेंका जाए, तब तक ऊंचे सामाजिक कद का होने का एहसास नहीं होता। मेरे एक परिजन का कहना है कि शादी-विवाह या फिर श्राद्ध सहित अन्य प्रयोजन में जब तक पांच-दस लाख रुपए गला नहीं दिए, तब तक किस बात के ‘बाबू’ हैं आप? लेकिन ‘बाबू’ बनने की होड़ में पता नहीं हमलोग किस ओर जा रहे हैं? लोगों को अपना रुतबा दिखाने या बाबूगिरी साबित करने के लिए जमीन बेचना पड़ता है, कर्ज लेना पड़ता है। जब सब कुछ शांत पड़ जाता है तब शुरू होती है इसे चुकाने की जद्दोजहद। लोग महीनों या सालों के दौरान जी-तोड़ मेहनत करके और एक-एक पाई जोड़ कर पैसा इकट्ठा करते हैं और फिर झटके में बाबू बनने की होड़ में इसे गंवा देते हैं।

दूसरी ओर, हमारे देश में बीच-बीच में आजादी के सत्तर साल के बाद भी लोगों के भूख से मरने की खबरें आती रहती हैं। आज भी देश में एक बड़ी आबादी को बहुत मेहनत-मजदूरी करके दो वक्त की रोटी मयस्सर होती है। ऐसा भी सुनने को मिलता है कि देश में बहुत ऐसे लोग हैं जो एक वक्त खाते हैं तो दूसरे वक्त की सोचते हैं और कुछ लोगों को तो एक समय का ही खाना नसीब हो पाता है। लगता है कि समृद्ध होने के साथ-साथ हम लोग संकुचित भी होते जा रहे हैं। भोज का बहाना विवाह या खुश होने का मौका हो या फिर श्राद्ध जैसे आयोजन, जिस तरह सिर्फ दिखावे के लिए हम लोग खाना बर्बाद करते हैं और झूठी शान के मुगालते में जीते हैं, अगर इस अन्न का उपयोग ऐसे लोगों के लिए किया जाए जो जरूरतमंद हैं तो क्या वह ज्यादा मानवीय नहीं होगा!

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