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दुनिया मेरे आगेः जिम्मेदारी का पाठ

दिल्ली के तमाम व्यावसायिक माने जाने वाले इलाकों में चौराहों, दीवारों, खंभों आदि पर एक विज्ञापन चिपका मिलेगा- ‘सरकारी टीचर बनें।’ इन इलाकों में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए कोंचिंग सेंटर चलते हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर

दिल्ली के तमाम व्यावसायिक माने जाने वाले इलाकों में चौराहों, दीवारों, खंभों आदि पर एक विज्ञापन चिपका मिलेगा- ‘सरकारी टीचर बनें।’ इन इलाकों में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए कोंचिंग सेंटर चलते हैं। जैसे ही दिल्ली सरकार की ओर से किसी पद के लिए आवेदन की घोषणा होती है, वैसे ही इस प्रकार के कोचिंग सेंटर अपने विज्ञापनों से युवाओं को लुभाने लगते हैं। मन में कई सारे सवाल उठने लगे। सरकारी शिक्षक ही क्यों? क्या शिक्षक का यह नया वर्गीकरण समाज और शिक्षाशास्त्रियों ने किया है। सरकारी और गैरसरकारी शिक्षक। क्या सरकारी स्कूलों के शिक्षकों की कोई खास विशेषता होती है जो निजी स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षक से भिन्न होती है। लेकिन यह भी हकीकत है कि हमारे जो युवा शिक्षक बनना चाहते हैं, उनकी संख्या बेहद कम है। प्रो कृष्ण कुमार का मानना है कि आज की जमीनी सच्चाई यही है कि प्राथमिक या उच्च या फिर माध्यमिक स्कूलों में शिक्षण को पहली प्राथमिकता देने वालों की संख्या दिनोंदिन कम ही होती जा रही है।

सरकारी शिक्षक तीन माह में कैसे बनें, इसके तमाम नुस्खे, टोटके, मंत्र आदि सिखाए जाते हैं। काफी हद तक उन्हीं नुस्खों के जरिए परीक्षा भी पास कर जाते हैं। सवाल है कि इन कोचिंग संस्थानों में होता क्या है? कैसे हमारे युवाओं को सरकारी शिक्षक बनने के सपने बेचे जाते हैं? यह जानना भी महत्त्वपूर्ण होगा कि बहुवैकल्पिक सवालों और उनके उत्तर के कंधे पर सवारी कर हजारों युवा शिक्षक बन जाते हैं। रीजनिंग, राजनीति, इतिहास, सामान्य से शिक्षक-शिक्षण अभिरुचि और दर्शन के सवालों को रटे हुए पूर्व स्थापित पा्रमाणिक उत्तरों के आधार पर हमारे नए बने शिक्षक जब कक्षा में जाते हैं तब उन्हें तल्ख हकीकत से रूबरू होना पड़ता है।

आमतौर पर ऐसे ही शिक्षक शायद बच्चों को यह कहते हुए भी पाए जा सकते हैं कि इन्हें कोई नहीं पढ़ा सकता… ये पढ़ कर क्या करेंगे… मेरी कक्षा में बच्चे बहुत शोर करते हैं… बच्चे मेरी बात नहीं सुनते आदि। इतना ही नहीं, जिस प्रकार के शब्द और वाक्य कक्षाओं में शिक्षक इस्तमाल करते हैं, उन्हें सुन कर कुछ देर के लिए हैरानी भी होती है कि क्या इन्होंने शिक्षक प्रशिक्षण के दौरान यही सीखा है! कक्षा में या बाहर बच्चों के मनोबल और उनकी वैयक्तिक पहचान को चोट पहुंचाना उनके बचपन और युवावस्था के साथ खिलवाड़ करने जैसा है। इसी समाज में विभिन्न राज्यों से आने वाली घटनाओं की खबरें हमें ताकीद करती हैं कि शिक्षक-शिक्षण और शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए हमें चयन और प्रशिक्षण प्रक्रिया को और बेहतर बनाने की आवश्यकता है। वरना होमवर्क नहीं करने पर किस्तों में नौ साल की बच्ची को दो सौ अड़सठ थप्पड़ जड़ने के आदेश देने वाले शिक्षक प्राथमिक शिक्षा को गंदला ही करते हैं। जबकि बीएड और बीएलएड या फिर ‘डाइट्स’ की ट्रेनिंग में कभी और कहीं भी प्रशिक्षु को यह नहीं बताया जाता कि बच्चों को थप्पड़ मारो, शौचालय में बंद कर दो… उन्हें भरी कक्षा में नकारो और उनकी निजी पहचान को नजरअंदाज करो। फिर हमारे सरकारी या निजी स्कूलों के शिक्षक यह व्यवहार कहां से सीख कर आते हैं।
युवाओं का सपना अगर शिक्षक बनना होता भी है तो वे सरकारी टीचर ही बनना चाहते हैं। ऐसे कई शिक्षक मिल जाएंगे जो खुल कर बताएंगे कि सरकारी शिक्षक बनने पर भविष्य सुरक्षित हो जाता है। कमजोर तबकों के बच्चों या पढ़ाई में कमजोर बच्चों के प्रति ज्यादातर शिक्षकों का उपेक्षा से भरा बर्ताव आम है। ऐसे शिक्षकों की वजह से भी प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है।

सरकारी और निजी स्कूलों के शिक्षक बनने में दो बुनियादी अंतर हम देख सकते हैं। पहला सरकारी स्कूलों में एक तय मानदंड पर छह या बारह साल में पदोन्नति मिलती है। वह तनख्वाह और पद में भी तब्दीली लाता है। इसके लिए कुछ साल का इंतजार करना होता है। यों यह सभी जानते हैं कि आज की तारीख में शिक्षक दिवस पर किस तरह शिक्षकों को सम्मानित किया जाता है। यह चुनाव के हर स्तर पर कई सवाल खड़े करता है। वहीं निजी स्कूलों में हर दिन हर सप्ताह शिक्षकों के काम का मूल्यांकन होता है। यह इसी आकलन पर निर्भर करता है कि किसी शिक्षक की सेवा को जारी रखना है या नहीं। यह एक ऐसा डर है जिसमें हजारों निजी स्कूलों के शिक्षक जीते हैं और अपने काम को दुरुस्त रखने की कोशिश करते हैं। शायद यह डर भी एक कारण है कि निजी स्कूलों में पढ़ाने वाला शिक्षक चौकन्ना रहता है। जबकि मेरा मानना है कि शिक्षक केवल शिक्षक हों, न कि सरकारी या निजी। इसके लिए सरकारी शिक्षा व्यवस्था को भी ऐसा ढांचा खड़ा करना पड़ेगा जिसमें सरकारी स्कूलों के शिक्षक भी बेहतर शिक्षण के लिए बिना किसी भय और असुरक्षा के अपने स्तर पर सक्रिय हों।

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