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दुनिया मेरे आगेः काम की कड़वाहट

साल की शुरुआत हुई और नए साल के मौके पर होने वाला उत्सव गुजर गया।

Author January 19, 2018 2:41 AM
कड़वे का तिरस्कार शायद हमारी एक भूल है। वह कड़वा ही है जो हमारे भीतर गहरा उतरता है और लंबे समय तक अपना स्वाद और असर कायम रखता है। ठंड के दिनों में तो बुजुर्गों द्वारा कड़वे मेथी दाने के लड्डू खाने की परंपरा-सी ही है।

एकता कानूनगो बक्षी

साल की शुरुआत हुई और नए साल के मौके पर होने वाला उत्सव गुजर गया। लेकिन हर साल के वही बारह महीने और उनमें वैसे ही निर्धारित सारे दिन, सबके लिए। सबको बराबर उपभोग और उपयोग का अवसर। वाह! क्या बेमिसाल प्रबंधन है। यह अलग बात है कि सामाजिक-आर्थिक स्थितियों की वजह से बराबर उपभोग और उपयोग का अवसर सीमित ही रहता है। खासतौर पर हाशिये के लोग अपने लिए अवसर की उम्मीद में ही साल गुजार देते हैं। इसके इतर साल को देखें तो अब जबकि निर्धारित तीन सौ पैंसठ गेंद हमारी पारी में हैं तो उन्हें कैसे खेला जाना है, यह पूरी तरह हम पर निर्भर है। जाहिर है, कोशिश यही रहेगी कि सारी गेंद पर सीमा रेखा के पार जाए, लेकिन यह पूरी तरह से निर्भर करेगा हमारे आत्मविश्वास भरे खेल, सूझबूझ और विवेकपूर्ण बल्लेबाजी पर।

मगर जीत-हार से इतर खेल का आनंद लेना बेहद जरूरी है। साल के सबसे पहले दिन लोग जिन कामों से शुरुआत करते हैं, क्या वह आने वाले दिनों में याद भी रह पाता है? फिर भी नए साल का स्वागत करने का सभी का अपना-अपना तरीका है। इस मसले पर बहुत सारी बातें भी प्रचलित हैं। मसलन, पहले दिन के जश्न में डूबे लोगों के बरक्स कुछ लोगों का जीवन तारीखों और घंटों से नहीं, जरूरतों से आगे बढ़ता है। कई लोग उस समय भी अपना काम कर रहे होते हैं। इस मौके पर मुझे वर्ष प्रतिपदा (गुड़ी पड़वा) का दिन भी याद आया। इस दिन जब हम बड़ों से आशीर्वाद लेते थे, तब दादी मां हमें कड़वा नीम, काली मिर्ची और मिश्री का प्रसाद देती थीं। पता नहीं क्यों, यह मिश्रण स्वाद में बिल्कुल अनोखा होता था।
बीता वक्त बहुत-सी कड़वी, मीठी, तीखी स्मृतियों को छोड़ता हुआ विदा हो जाता है। लेकिन मुझे लगता है कि जीवन में कड़वे की उपस्थिति के कारण ही मिठास का महत्त्व हम जान पाते हैं। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। दोनों के कारण ही जीवन का वास्तविक जायका है।

हम जब एक-दूसरे से खानपान की रुचि के बारे में पूछते हैं तो अक्सर यह सामान्य-सा सवाल आ ही जाता है कि आपको मीठा पसंद है या नमकीन! आज तक किसी ने कभी नहीं पूछा कि क्या आपको कड़वा पसंद है! कड़वे में क्या लेना पसंद करेंगे? आखिर कड़वे का इतना तिरस्कार क्यों? शायद इसलिए कि कड़वा आमतौर पर रुचि से खाया-पीया नहीं जाता। यह अलग बात है कि कभी-कभी मजबूरी में कड़वे घूंट उतारने और निगलने पड़ जाते हैं।
कड़वे का तिरस्कार शायद हमारी एक भूल है। वह कड़वा ही है जो हमारे भीतर गहरा उतरता है और लंबे समय तक अपना स्वाद और असर कायम रखता है। ठंड के दिनों में तो बुजुर्गों द्वारा कड़वे मेथी दाने के लड्डू खाने की परंपरा-सी ही है। कहते हैं कि कैसी भी दुर्बलता क्यों न हो, इनका सेवन किसी को बलवान बना देता है। ऐसे ही कुछ कड़वे बोल भी बड़े कारगर होते हैं जो किसी का पूरा जीवन ही बदल डालते हैं या कहें कि किसी की गाड़ी को सही पटरी पर ला देते हैं।

यह कड़वापन आसानी से तब तक पीछा नहीं छोड़ता, जब तक कि ये आपको पूरी तरह दुरुस्त न कर दे। जो जितना कड़वा है, असल में वह उतना ही हितकर है। ‘करेला और वह भी नीम चढ़ा’- यह केवल कहावत नहीं है, विशेषता है उसकी। दरअसल, कड़वेपन का फायदा उठाने में ही समझदारी है। हालांकि लौकी, गीलकी, तिरोई अगर कड़वी हो जाए तो उनसे बचना ही चाहिए, क्योंकि उसके बाद वे अपने प्राकृतिक गुण से बेराह हो जाती हैं। बेराह हुई कोई भी चीज आखिरकार नुकसानदेह हो जाती है। चाहे वह रेलगाड़ी हो, आचरण हो, सब्जी हो या मनुष्यता- सभी को बेपटरी नहीं होने देना चाहिए। करेला हो, नीम हो या आलोचना- ये सब कड़वाहट के बावजूद गले लगाने योग्य हैं।

अगर अभी आप कड़वा खा रहे हैं या कड़वा अनुभव कर रहे हैं, तो आप भविष्य में मीठे के सेवन को सुनिश्चित कर रहे हैं। अगर कोई आपको कड़वा नहीं बोल रहा तो आपको यह देखना चाहिए कि ऐसा क्यों हो रहा है! क्या आप इस समाज में हैं भी या नहीं! सच यह भी है कि कड़वेपन का सामना करने से हम अधिक शक्तिशाली और सहनशील बनते हैं।
जहर का स्वाद कैसा होता है, पता नहीं! लेकिन निश्चित ही जहर पीने का वास्तविक कारण अनपेक्षित कड़वाहट को स्वीकार न कर पाना ही होता है। अगर जीवन की कड़वाहट को भी एक जरूरी स्वाद समझ कर लुत्फ उठाया जाए तो शायद ही निराशा में किसी जहर की जरूरत पड़े। इसीलिए मिठास के साथ-साथ जीवन और भोजन में थोड़े कड़वे स्वाद का भी सुख उठाते रहना चाहिए।

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