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दुनिया मेरे आगेः शब्दों की धरोहर

शास्त्रों में कहा गया है कि शब्द ही ब्रह्म हैं। यानी शब्द का व्यापक महत्त्व है। हम शब्दों में ही बोलते हैं और लिखते हैं।

Author October 30, 2017 2:12 AM
वाल्टर पेटर ने कितना ठीक कहा था कि एक बात को कहने का एक ही तरीका होता है और एक शब्द ही उसे कह सकता है। इस कथन में शब्द की सार्थकता और औचित्य निहित है।

सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी

शास्त्रों में कहा गया है कि शब्द ही ब्रह्म हैं। यानी शब्द का व्यापक महत्त्व है। हम शब्दों में ही बोलते हैं और लिखते हैं। गोली से भी ज्यादा असरदार बोली होती है। हम शब्दों द्वारा ही औरों को अपना बना सकते हैं और शब्दों द्वारा ही अपनों को पराया बनाकर रख सकते हैं। कौन सा शब्द कब, किस जगह व किस व्यक्ति के लिए बोलना है, इसका ज्ञान होना और ध्यान रखा जाना जरूरी है। यही औचित्य है कि हम सही जगह और सही व्यक्ति के लिए सही शब्द बोलें। औचित्यपूर्ण शब्द सौंदर्य का अहम हिस्सा है।
शब्द का चयन करते वक्त अनेक बातों का ध्यान रखना जरूरी है। शब्दों का सदुपयोग करके ही शब्दों के दुरुपयोग को रोका जा सकता है। लोग अतिउत्साहवश अक्सर अनेक विशेषणों का प्रयोग करते हैं जो कि निरर्थक भी है और हास्यास्पद भी। मसलन ‘मैं विशुद्ध रूप से संपूर्ण और शुद्ध शाकाहारी हूं।’ क्या यह वाक्य गलत नहीं है? इसी प्रकार यह कहना कि ‘आपके, हमारे व सभी के आदरणीय महानुभाव आज हमारे बीच उपस्थित होकर कार्यक्रम की शोभा को चार चांद लगा रहे हैं’, उतना ही अनुुचित है। दरअसल कुछ ही लोग ऐसे होते हैं जिनका शब्द ज्ञान व्यापक होता है। वरना अधिकतर लोग सौ सवा सौ शब्दों में ही जिंदगी गुजार देते हैं।

वाल्टर पेटर ने कितना ठीक कहा था कि एक बात को कहने का एक ही तरीका होता है और एक शब्द ही उसे कह सकता है। इस कथन में शब्द की सार्थकता और औचित्य निहित है। हम अक्सर देखते हैं कि कई लोग एक वाक्य शुरू तो करते हैं पर उसे पूरा नहीं कर पाते और उस वाक्य को पूरा किए बिना दूसरा वाक्य शुरू कर देते हैं और उसे भी पूरा किए बिना तीसरा वाक्य शुरू कर देते हैं, और उसे भी पूरा नहीं करते। ऐसे लोगों में कई बड़े लोग भी शामिल हैं। ऐसा इसीलिए होता है क्योंकि उनके पास प्रभावशाली शब्दों का अभाव है। वे अगर, मगर, मतलब यानी जैसे निरर्थक शब्दों के जाल में ही उलझे रहते हैं।
अंग्रेजी के बीसवीं सदी के महान कवि, नाटककार व आलोचक टीएस इलियट ने कविता की परिभाषा देने के बजाय सिर्फ यही कहा कि ‘पोइट्री इस वडर््स, वडर््स एंड वडर््स’- यानी कविता सिर्फ शब्द ही शब्द है। उनका आशय यही था कि शब्दों का सही प्रयोग ही कविता की एक मात्र शर्त है। शब्द ऐसे होते हैं जो स्वर, अर्थ, भाव और संप्रेषण के लिहाज से सटीक, चुनिंदा और व्यापक पहुंच की क्षमता के हों और उनकी जमावट सुनियोजित हो। तराशे हुए और सोच विचार के बाद चुने हुए शब्द ही तो गहरा असर छोड़ते हैं। तभी तो कहा जाता है कि अच्छी कविता स्याही से नहीं, रक्त से लिखी जाती है। कवि शब्दों को वैसे ही गढ़ता है जैसे कि सुनार गहनों को गढ़ता है। लहू को रोशनाई बनाना एक दुर्लभ काम है, पर जो इस कला में माहिर हैं, सभी उनका लोहा मानते हैं।
आप शब्द कहें, वचन कहें, वाणी कहें या फिर बोल, हैं तो एक दूसरे के पर्याय ही। अपनी बात साफ शब्दों में और सफाई से कह पाना और उसे दूसरों तक पहुंचा पाना किसी तपस्या से कम नहीं है।

हम धन तो कंजूसी से खर्च करते हैं, पर शब्दों के उपयोग के बारे में दरियादिल हो जाते हैं। मानों, जैसे चाहे शब्दों का प्रयोग करने के लिए ही हमें आजादी मिली है। सच तो यह है कि जो लोग कम और नापतौल कर सार्थक और प्रभावशाली तरीके से अपनी बात कहते हैं, उन्हीं की बात ध्यान से सुनी भी जाती है, जो नहीं सुन पाते या कुछ शब्द सुनने या समझाने में चूक जाते हैं लोग उनके बारे में औरों से पूछते हैं तथा अपनी चूक पर पछताते हैं। ऐसा ही अंग्रेजी के निबंधकार फ्रेंसिस बेकन के बोलने पर इंग्लैंड की संसद में हुआ करता था। बेकन कम बोलते थे और कब चुप होकर बैठ जाएंगे, यह कोई नहीं जानता था। सब उन्हें ध्यान से सुनते थे। उनके हर छोटे से वाक्य पर एक बड़ा निबंध लिखा जा सकता है।

शब्दों और नामों के निरर्थक उपयोग के उदाहरण हमें अक्सर विवाह के निमंत्रण पत्र में ही नहीं, शोक संदेश में भी देखने को मिलते हैं। किसका विवाह है और कौन स्वर्गवासी हो गया, यह जानने के लिए हमें दस-पंद्रह नामों और रिश्तों के समूह से गुजरना पड़ता है। प्रश्न किया जा सकता है कि क्या जरूरी है? जवाब में यही कहा जाएगा कि जिसका नाम न दो, वही बुरा मान जाएगा। इसी डर के चलते सब कुछ चल रहा है। जरूरत है कि हम लफ्फाजी से बचें। मसलन डॉक्टर, वकील, शिक्षक, प्रसारणकर्ता और माइक पर बोलने के शौकीन लोगों के लिए तो इसके अलावा कोई विकल्प ही नहीं है। सोच समझ कर और नाप-तोल कर बोले हुए शब्द ही मूल्यवान होते हैं।

चुनिंदा, तराशे हुए और दिल से निकले हुए शब्दों में ही आदमी का व्यक्तित्व झलकता है। और अगर वे एक दूसरे से अच्छी तरह गुंथे हुए हों, करीने से जोड़ दिए जाएं तो सोने में सुहागा जैसा काम करते हैं। शब्द बहुमूल्य हैं। उन्हें निरर्थक मत लुटाइए। अच्छी बात, अच्छे लफ्जों में और अच्छी तरह और खूबसूरती से कही जाए तो बात ही क्या है और कौआ कड़वे बोल के लिए बदनाम है। हम तय करें कि हम कोयल बनना चाहते हैं या कौआ।

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