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दुनिया मेरे आगेः तनाव की परीक्षा

हाल के दिनों में परीक्षाओं के दौर में बच्चों पर पड़ने वाले बोझ को लेकर जताई जाने वाली चिंता बहस के केंद्र में आई है।

प्रतीकात्मक तस्वीर

हाल के दिनों में परीक्षाओं के दौर में बच्चों पर पड़ने वाले बोझ को लेकर जताई जाने वाली चिंता बहस के केंद्र में आई है। बिना किसी बोझ के खुश होकर परीक्षा देने, सफलता के लिए आत्मविश्वास में बढ़ोतरी जैसे सूत्र दिए जा रहे हैं। साथ ही अभिभावकों को भी हिदायत दी जा रही है कि वे अपनी इच्छाएं बच्चों पर न लादें। यह अच्छी बात है। लेकिन प्रश्न उठता है कि क्या वर्तमान शिक्षा प्रणाली में ऐसा अवसर मिलता है कि बच्चे एक-दूसरे से तुलना न करें और माता-पिता अपने बच्चों से अपेक्षा न करें? दूसरे, ध्यान देने योग्य बात यह है कि परीक्षा को लेकर तनाव में रहने वाले बच्चों की स्थिति को क्या उनकी वैयक्तिक कमजोरी माना जाए या मौजूदा शिक्षा व्यवस्था और मूल्यांकन प्रणाली की खामी? यह किसी से छिपा नहीं है कि विद्यार्थी परीक्षा से पहले अधिक अंक अर्जित करने और परीक्षा के बाद अच्छे कॉलेज में दाखिले को लेकर तनाव में रहते हैं।

पिछले वर्ष इंटरनेट पर ‘मिरांडा रिलीज द प्रेशर’ नामक डॉक्यूमेंट्री फिल्म को खूब सराहा गया। निर्देशक सुजीत सरकार द्वारा बनाई गई यह फिल्म बच्चों पर परीक्षा के दबाव को दर्शाती है कि किस तरह परीक्षा के समय बच्चे भय और तनाव महसूस करते हैं। दरअसल, यह फिल्म परीक्षा की तैयारी कर रहे बच्चों द्वारा अपने माता-पिता को लिखे गए पत्रों पर आधारित है। पत्र के माध्यम से बच्चे बताते हैं कि परीक्षा से वे कैसा महसूस कर रहे हैं। मसलन, एक बच्चा रात भर बाथरूम में बंद रहना चाहता है, ताकि कोई उससे बात न कर सके। दूसरा बच्चा माता-पिता द्वारा उसकी तुलना अन्य बच्चों से करने के कारण परेशान है। एक अन्य बच्चा हर आधे-घंटे बाद माता-पिता के कमरे में झांकने से तनाव महसूस करता है और एक बच्चा अपने माता-पिता से कहना चाहता है कि मेरे अंदर सीमित क्षमता है। मैं लगातार दस घंटे तक नहीं पढ़ सकता हूं। इस तरह के कई उदाहरण हैं।

दरअसल, भारत में आजादी के समय से ही परीक्षा चर्चा का विषय रही है। कभी फेल-पास की नीति तो कभी दबाव या तनाव के मनोविज्ञान को लेकर, कभी अंक-श्रेणी प्रणाली, कभी साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक परीक्षण और त्रैमासिक, अर्धवार्षिक, वार्षिक प्रारूप तो कभी गुणवत्ता और योग्यता अर्जित न करने के मापदंड को लेकर। और भी मानक हो सकते हैं।
शिक्षा में सुधार के लिए गठित विभिन्न आयोगों और समितियों ने समय-समय पर परीक्षा प्रणाली में सुधार के लिए अनुशंसाएं दी हैं। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (2005) के लिए गठित समिति ने ‘परीक्षा प्रणाली में सुधार’ पर अपने विचार रखते हुए कहा है कि परीक्षाएं अत्यधिक तनाव और चिंता उत्पन्न करती हैं। दरअसल, हमारा विचार यह है कि दसवीं कक्षा की बोर्ड की परीक्षाओं को शीघ्र ऐच्छिक बनाया जाए। समिति का मानना था कि भारत में विद्यालय बोर्ड की परीक्षाएं इक्कीसवीं सदी के ‘ज्ञान समाज’ और इसके नवाचारी समस्या-समाधानकर्ताओं की आवश्यकताओं के बिल्कुल अनुपयुक्त हैं। इसके अलावा, कक्षा दसवीं और बारहवीं के अंत में ली गई बोर्ड परीक्षाएं नौकरशाही सिद्धांतों पर आधारित हैं, बुनियादी तौर पर स्वरूप में गैर-शैक्षिक रही हैं और मुख्य रूप से भय का स्रोत बनी हुई हैं, क्योंकि इनके कारण बच्चों को अत्यधिक मात्रा में सूचनाएं याद करनी पड़ती हैं, ताकि वे परीक्षा में उन्हें तुरंत लिख सकें।

सच यह है कि शैक्षणिक व्यवस्था में मूल्यांकन की अहम भूमिका होती है। विद्यालय में मूल्यांकन इसलिए भी जरूरी है कि हमें पता चल सके कि हमारा प्रयास सही दिशा में अग्रसर है या नहीं! मूल्यांकन हमें यह समझने में मदद करता है कि बच्चे ने कितना सीखा है और किन चीजों पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। लेकिन वर्तमान समय में मूल्यांकन के नाम पर ली जाने वाली परीक्षा बच्चों के अंदर केवल भय और तनाव पैदा कर रही है। हमें परीक्षा के अलावा अन्य कारकों पर भी ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि परीक्षा में केवल छात्र-छात्राएं फेल नहीं होते हैं, बल्कि उनके साथ पाठ्यक्रम, पाठ्यपुस्तक, शिक्षा प्रणाली, शिक्षा व्यवस्था और अभिभावक भी नाकाम होते हैं।

विद्यार्थियों का तो मूल्यांकन परीक्षा से हो जाता है, जबकि उक्त कारकों का मूल्यांकन होता ही नहीं है और अगर होता भी है तो उसको बच्चों के परिणाम की तरह प्रकट नहीं किया जाता है। गांधीजी का मानना था कि अगर शिक्षक की निगरानी में रहने वाले व्यक्ति का पतन होता है या शिष्य किसी बात का दोषी है तो उसके लिए कुछ हद तक शिक्षक जरूर जिम्मेदार है। दरअसल, विद्यालय में दाखिले के साथ ही बच्चा एक प्रकार की अंधी दौड़ में शामिल हो जाता है। इस अंधी दौड़ का एकमात्र लक्ष्य होता है परीक्षाओं में पास होना। इस दौड़ में पता ही नहीं चलता है कि जीवन को समझने और दुनिया को जानने और सीखने की ललक कब पीछे छूट जाती है और एक डर अंदर घुस जाता है और वह डर है इस प्रतियोगी विश्व में नाकाम होने का।

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