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दुनिया मेरे आगेः सुविधा की बातें

एक बच्चा तब झूठ बोलता है, जब वह अपने बड़ों को झूठ बोलते देखता है। मजे की बात है कि यही बड़े अपने बच्चों को झूठ न बोलने की सीख देते नहीं थकते, जो दिन में रिश्तेदारों से, दफ्तर में, बाजार में, पड़ोसियों से पता नहीं कितने झूठ बोलते होंगे।

Author January 13, 2018 4:52 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

श्रुति शर्मा

एक बच्चा तब झूठ बोलता है, जब वह अपने बड़ों को झूठ बोलते देखता है। मजे की बात है कि यही बड़े अपने बच्चों को झूठ न बोलने की सीख देते नहीं थकते, जो दिन में रिश्तेदारों से, दफ्तर में, बाजार में, पड़ोसियों से पता नहीं कितने झूठ बोलते होंगे। अब इस बीच अगर बच्चा एक झूठ बोल भी दे तो उसके साथ ऐसा सलूक होता है मानो मां-पिता की नाक बच्चे के इसी झूठ से कटेगी! मैं इस विषय पर सोचने पर मजबूर हुई। हाल ही में आसपास के कुछ बच्चों से इस विषय पर चर्चा की, सवाल-जवाब हुए। मसलन, बताओ कौन-कौन झूठ बोलता है? जवाब में हर बच्चे का कहना था कि उनमें से किसी ने भी कभी झूठ नहीं बोला है। मैं इस जवाब पर चौंकी, हालांकि मैं जानती थी कि बच्चे यही जवाब देंगे। जैसे ही बच्चों और मेरे बीच दोस्ती का दायरा बढ़ता गया, सभी बच्चों ने माना कि वे झूठ कभी न कभी तो बोलते ही हैं। फिर मैंने पूछा कि तुम्हें किसने सिखाया है कि झूठ बोलना पाप है? सभी बच्चों ने अपने बड़ों का ही नाम बेझिझक लिया। मेरा सवाल था कि क्या तुम्हारे यही बड़े हमेशा तुम्हें सच बोलते दिखते हैं या कभी-कभार झूठ बोलते हैं? इस बीच बच्चे मेरे इरादे को भांप चुके थे और उन्होंने खुल कर चर्चा करनी शुरू की। किसी ने कहा कि मेरी मां भी झूठ बोलती हैं, लेकिन मैं झूठ बोल दूं तो मुझे खूब मारती हैं। किसी ने कहा कि मेरे पापा इतना झूठ बोलते हैं दीदी की क्या कहूं..!

मैंने बच्चों को मानो अपने बड़ों की शिकायतें करने का मौका दे दिया हो। हालांकि मेरा मकसद यह नहीं था कि वे अपने बड़ों की पोल खोलें, बल्कि गहराई से समझ सकें कि हम आखिर झूठ क्यों बोलना सीखते हैं। लगभग सभी से निजी तौर पर चर्चा हुई कि कोई क्यों झूठ बोलता है और क्या बिना झूठ बोले रहा जा सकता है! और भी कई सवाल-जवाब हुए, तब उन बच्चों में से जो एक जरूरी सवाल निकल कर आया वह था कि जब सभी झूठ बोलते हैं तो फिर हर कोई जब बड़ा हो जाता है तो ये क्यों सिखाने लगता है कि झूठ नहीं बोलना चाहिए!
सचमुच मेरा भी सवाल हम सभी से है कि जब हम खुद भी झूठ बोलते हैं, बल्कि उन बच्चों के सामने ही बोल रहे होते हैं तो फिर उन्हें ये सिखाते रहना कितना सही है कि झूठ मत बोलो या झूठ बोलना पाप है! बच्चों को क्या सिखाना है, यह हमें पता चल जाए तो सबके लिए बेहतर होगा। खैर, बच्चों ने पूछा कि दीदी, क्या आप झूठ बोलती थीं बचपन में? इस पर मैंने उन्हें कहा कि हां, मैं झूठ बोलती थी। जब स्कूल का होमवर्क पूरा नहीं कर पाती थी, तब पेट दर्द का बहाना मैंने भी कई बार बनाया था। एक बच्चे ने पूछा कि क्या आप भी अपनी बेटी को ये सिखाएंगी कि झूठ बोलना पाप है? झूठ कभी मत बोलना!

बच्चे को मेरे जवाब से बहुत उम्मीदें थीं। मैंने कहा- ‘मैं जुगनू को ये कभी नहीं सिखाऊंगी कि झूठ मत बोलो। हां, ये जरूर बताऊंगी कि झूठ किन परिस्थितियों में बोलना ठीक होता है और कहां नहीं। जब लगे कि फंस रहे हैं और कोई विकल्प नहीं है बचने का तब झूठ बोलना।’ बच्चों से मैंने पूछा कि बताओ कि यहां फंसने का मतलब क्या है, कैसे पता चलेगा कि फंस गए हैं और वहां झूठ बोलना है या नहीं? बच्चों ने कहा कि जब लगे कि झूठ बोलने से मेरा फायदा है, लेकिन सामने वाले को नुकसान नहीं पहुंच रहा है तो झूठ बोला जा सकता है। या फिर किसी नियम या कानून का उल्लंघन नहीं हो रहा हो, तो वहां भी।

मैंने उन्हें गांधीजी का वह किस्सा सुनाया जब उन्होंने अपने पिताजी से झूठ बोला था। जब गांधीजी के बड़े भाई कर्ज में फंस गए थे तब उन्होंने अपने हाथ का सोने का कड़ा बेच दिया और पिताजी से डर के मारे बोल दिया कि ‘कड़ा गुम हो गया है!’ तो जरूरत इस बात की है कि बच्चों को बताया जाए कि झूठ का सहारा कम से कम लें। कोई भी झूठ सिर्फ इतना और ऐसा हो जिससे किसी का भी कोई नुकसान नहीं होने वाला हो। ऐसे झूठ न बोले जाएं, जिनसे लोग भरोसा करना करना ही छोड़ दें। झूठ जब आदत में शुमार हो जाता है तो जिंदगी भी झूठ पर टिक जाती है, जो कभी भी भरभरा कर गिर सकती है। ऐसे झूठ कतई नहीं बोले जाने चाहिए कि रिश्ते ही बिगड़ जाएं। बच्चे वही करते हैं जो हमें यानी अपने बड़ों को करते देखते हैं। अगर बच्चों को शिक्षा देनी है तो हमें सोच-समझ कर खुद सच्चाई से अवगत होना पड़ेगा। उनके अच्छे-बुरे हर पहलू पर बच्चे से बात करनी होगी, तभी हम बच्चे को शिक्षा देने के काबिल होंगे।

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