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दुनिया मेरे आगेः चरखे की गति

अंधेरी रातों के भोर में नानी के जिस गीत को सुन कर मेरी नींद खुल जाती थी, उसका मतलब शायद यह होता था कि अब वे चरखे पर सूत कातेंगी, सूत से बनी साड़ी पहनेंगी, भगवान उसकी रक्षा करेंगे।

Author March 10, 2018 02:30 am
(Source: Pixabay)

चंदन कुमार चौधरी

अंधेरी रातों के भोर में नानी के जिस गीत को सुन कर मेरी नींद खुल जाती थी, उसका मतलब शायद यह होता था कि अब वे चरखे पर सूत कातेंगी, सूत से बनी साड़ी पहनेंगी, भगवान उसकी रक्षा करेंगे। नानी महात्मा गांधी की अनुयायी थीं या नहीं, यह तो मुझे कभी पता नहीं चल पाया, लेकिन वे कर्म से जरूर गांधीजी का अनुसरण करती थीं। वे गरीब थीं और अपने चरखे के जरिए गरीबी से लड़ना चाहती थीं। वे चरखा कातने में सिद्धहस्त थीं। बाकी बच्चों का पता नहीं, लेकिन मैं बिस्तर पर पड़ा-पड़ा हर मौसम में चलने वाले नानी के चरखे की आवाज सुनता रहता। मुझे चरखे का वह घर्र-घर्र सुनने में बहुत अच्छा लगता था। फिर हम लोग उठ जाते और खेलने-कूदने, घूमने-फिरने में लग जाते।

जेठ की दुपहरी में जब बच्चे सो जाते, युवा ताश खेलने में मगन रहते, महिलाएं घर-परिवार के काम में मशगूल रहतीं, वहीं नानी चरखे के लिए रूई ठीक करने के काम में लगी रहतीं। बाद में नानी कता हुआ सूत खादी भंडार केंद्र पर भेजती थीं। सूत को खादी भंडार केंद्र तक पहुंचाने का काम जिनके जिम्मे आता, मैं भी कभी-कभार उनके साथ चला जाता। नानी का सूत केंद्र पर ले जाते हुए मौसी उत्साहित रहती थीं, लेकिन लौटते हुए उदास दिखाई पड़ती थीं। वजह उनकी उम्मीद थी कि इस बार सूत के बदले पैसा या कपड़ा ज्यादा मिलेगा। लेकिन आमतौर पर केंद्र का कर्मचारी सूत की कीमत चुकाते हुए बेईमानी कर लेता था।

यह सूत की बेहद कम निर्धारित कीमत के अलावा एक अतिरिक्त नुकसान था, जो अब ज्यादा समझ में आता है। उस दौर में मैं बस इतना सोच पाता कि सूत के बदले कम मिले पैसे या कपड़े को देख कर नानी के मन-मिजाज पर क्या असर पड़ेगा और वे कितनी मायूस होंगी! बाद में पता चला कि ज्यादा मेहनत, कम मेहनताना और बेईमानी से तंग आकर नानी ने धीरे-धीरे चरखा चलाना बंद कर दिया है। उनकी उदासीनता का असर यह भी हुआ कि उनके साथ चरखा चलाने या सूत कातने वाली अन्य महिलाओं ने भी यह काम बंद कर दिया। शायद यही हालात देश के भी रहे हों। आगे चल कर गांव में लघु उद्योग की तरह चलने वाला चरखा उद्योग भी बंद हो गया। इसका सीधा और नकारात्मक असर खादी पर पड़ा। बाद में खादी के प्रति लोगों के मन में भी उतना उत्साह नहीं रहा।

मेरे एक परिचित गांधीवादी हैं, जिनकी उम्र अब अस्सी साल के आसपास हो चुकी है। खादी के प्रति उनका मोह अब भी बरकरार है। लेकिन ढंग का खादी नहीं मिल पाने का उन्हें मलाल रहता है और आजकल बाजार में मिलने वाले खादी को लेकर वे कई शिकायत करते हैं। गांव-समाज का खादी भंडार या तो बंद हो गया है या उसकी हालत बहुत खस्ता है। उन्हें अब पसंद का वह खादी नहीं मिलता, जिनकी उन्हें तलाश रहती है। निराश होकर वे शहर से या किसी और बड़े केंद्र से खादी मंगवाते हैं, पहनते हैं और खादी के पुराने दिनों को याद करते रहते हैं।

गांवों में चरखा चलाने और सूत कातने की परंपरा बंद होने के कई कारण रहे होंगे। सूत खरीदे जाने वाले केंद्रों पर उचित कीमत नहीं मिलने से लेकर कई तरह की गड़बड़ियों के अलावा अपना दैनंदिन खर्च चलाने के लिए नकद के इंतजाम में गांव के लोगों का दूसरे काम में लग जाना मुख्य वजहें रही हैं। लेकिन इसके लिए सरकार की लापरवाही और प्रशासन की घोर उपेक्षा भी कम जिम्मेदार नहीं रही। आज अपने कस्बे और शहर में खादी की हालत देख कर सोचता हूं कि नानी का चरखा क्या बंद हुआ, शायद खादी ही बंद हो गया। चूंकि बहुत सारे लोग चरखा चला कर कुछ अर्जित करने के काम में लगे थे, इसलिए चरखा बंद होने के बाद हमारे गांव की अर्थव्यवस्था पर इसका बुरा प्रभाव पड़ा। महिलाओं की आत्मनिर्भरता और स्वावलंबन की कोशिशें कमजोर हुर्इं।

आज भले ही नए सिरे से खादी को सजाने-संवारने का भरसक प्रयास किया जा रहा हो, दिल्ली जैसे महानगरों में दो-चार चमकते-दमकते खादी भंडार दिख जाएं, खादी मेला लगा लिया जाए, लेकिन इसे अब उसके उस पुराने रंग में लाने में लंबा वक्त लग जाएगा, जो रुतबा इसका वर्षों पहले हुआ करता था। यह बात सभी जानते हैं कि खादी गांधी को बहुत प्रिय थी और वे खुद चरखा चलाते थे।

गुजरा जमाना बार-बार नहीं आता। अगर हमने समय रहते इसे सहेजा होता और खादी की कीमत को समझने वाले लोगों और खासतौर चरखा चलाने वाली महिलाओं की मेहनत की कद्र की होती तो आज खादी इतनी लाचार नहीं दिखाई देती! आज भी अगर इसके उत्पादन में ग्रामीण स्तर पर लोगों की भूमिका को सुनिश्चित किया जाए, तो इससे न सिर्फ खादी की हालत में सुधार होगा, बल्कि ग्रामीण इलाकों की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।

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