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दुनिया मेरे आगेः सिकुड़ती संवेदनाएं

हमारे ज्ञान सागर में संवेदना के आयामों को परिभाषित करते हुए उसे मानव मन की गहराई और सच्चाई के साथ आंका गया है।

Author February 23, 2018 4:14 AM
गांव के बड़े बुजुर्ग अकेले पड़ गए हैं। सच तो यह है कि गांव से रोजगार की तलाश में शहर गई युवा पीढ़ी अपनी तरह के शून्य से भर कर मानसिक रूप से बीमार हो रही है। (Photo-Flickr)

कृष्ण कुमार रत्तू

हमारे ज्ञान सागर में संवेदना के आयामों को परिभाषित करते हुए उसे मानव मन की गहराई और सच्चाई के साथ आंका गया है। वर्तमान समाज के तेजी से बदलते हुए परिदृश्य में संवेदनाओं का शून्य होना हमारे मानवीय मूल्यों के तेजी से होते ह्रास को दिखाता है। असल में मानवीय संवेदनाओं का शून्य होना इंसान के विकास और शून्य सोच की अंतिम रेखा माना जाता है। इन दिनों बढ़ते हुए औद्योगीकरण और बाजार की प्रतिस्पर्धा ने मानवीय संवेदनाओं को सचमुच मृतप्राय कर दिया है। समाज में अक्सर होने वाली घटनाएं भारतीय समाज के समूचे स्वरूप को किस तरह से परिलक्षित कर रही हैं, वह कल्पना से परे है। समाज में लगातार कम हो रहा आपसी भाईचारा कहीं न कहीं जातीयता और क्षेत्रवाद के नए चेहरे को दिखा कर भयभीत कर रहा है। खासतौर पर समाज में वर्चस्वशाली ताकतों का उभार सौहार्द के हालात को सीमित कर रहा है। इसमें सबसे ज्यादा नकारात्मक प्रभाव मानवीय संवेदनाओं पर पड़ रहा है।

हर तरफ आमतौर पर इसका असर देखने में आता है। यह कहीं सामान्य दुर्घटना के रूप में हो सकता है तो कहीं लोगों की वैसी गतिविधियों के रूप में जो स्वार्थों पर आधारित होती हैं। जहां तक हादसों का सवाल है तो उत्तर भारत में सड़क हादसों की संख्या भारत में सबसे ज्यादा है। लेकिन इस संदर्भ में जिस बात पर सबसे ज्यादा शर्म आनी चाहिए, वह यह कि हम इस बिंदु पर इतने संवेदन शून्य हो गए हैं कि सड़क हादसे में किसी घायल और तड़पते व्यक्ति को उठाने से भी परहेज करने लगे हैं।

कुछ समय पहले चंडीगढ़-अंबाला राजमार्ग पर रात के समय एक युवा हादसे के कारण घायल अवस्था में मदद के लिए गुहार लगाता रहा, लेकिन लोग उसके आसपास से निकलते रहे। आखिरकार किसी भी तरह की मदद न मिलने से उसकी मृत्यु हो गई। इसी तरह जालंधर में नेशनल हाइवे पर एक मां और बेटी की तेज रफ्तार गाड़ी से हुई टक्कर के बाद बेटी मदद के लिए गुहार लगाती रही, लेकिन समय से मदद न मिलने पर अपनी मां को आंखों के सामने मरते हुए देखने पर मजबूर रही। ऐसी ही घटनाओं में पड़ोस में संवादहीनता भी संवेदनाओं का आमतौर पर खत्म होना दिखाती है।

हमारे गांव में सद्भाव और भाईचारे की परंपरा सदियों से भारतीय संस्कृति को जिंदा रखती आ रही है। लेकिन बदलती जीवन शैली और भागदौड़ में यह आपसी सद्भाव भी आमतौर पर समाप्त हो रहा है। बंटे हुए समाज में बंटी हुई संवेदनाओं से लेकर रोजगार के अभाव की वजह से गांव उजड़ रहे हैं और शहर भीड़ भरे वातावरण से नारकीय होते जा रहे हैं। हालत यह है कि अपने पड़ोस में रहने वाले शख्स का भी पता नहीं कि वह कौन है। इसके बरक्स बदलती सूचना तकनीक ने भी आदमी को बड़े स्तर पर संवेदना से शून्य और उदासीनता से भर दिया है। अब बधाई और अफसोस के संदेश भी वाट्सऐप और फेसबुक पर भेज दिए जाते हैं और वहां किसी तरह की संवेदना को महसूस करना संभव नहीं है।

बदलते समाज का यह विकृत होता चेहरा कितना भयावह हो गया है, आज समाज की इस तस्वीर से देखा जा सकता है। शून्य से भर रहे लोगों का सामाजिक अलगाव उसे इस निराशा के दौर में ले जा रहा है। गांव के बड़े बुजुर्ग अकेले पड़ गए हैं। सच तो यह है कि गांव से रोजगार की तलाश में शहर गई युवा पीढ़ी अपनी तरह के शून्य से भर कर मानसिक रूप से बीमार हो रही है। सवाल है कि हम आने वाले दिनों में किस निरोग और आशा से भरे नए समाज का सृजन कर रहे हैं!

विज्ञान के इस दौर में सच है कि अकेलापन, उदासीनता और कंप्यूटर पर दुनिया बहुत कुछ को सीमित कर रही है। लेकिन क्या आने वाले दिनों में मानवीय रिश्ते और संवेदनाएं महज कंप्यूटर और मोबाइल की स्क्रीन पर ही दिखाई देंगे? विकास और आगे बढ़ने की चकाचौंध में हम शायद भूल गए हैं कि यह तो इंसान के सहायक वैज्ञानिक उपकरण हैं। असली जिंदगी तो मनुष्य के साथ मनुष्य का संवाद और संवेदना में निहित है। क्या अभी भी समय रहते हम अपने करोड़ों तादाद में राह और दिशा खोज रहे युवाओं को इन मानवीय संवदेनाओं का अहसास कराने में सफल हो पाएंगे। संवेदना से शून्य वर्तमान दौर में यही शायद सबसे बड़ा शेष प्रश्न है।

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