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दुनिया मेरे आगेः संवेदना का समाज

घर के पास एक कुतिया ने पांच पिल्लों को जन्म दिया तो पत्नी के मन में थोड़ी धार्मिक भावना जागृत हो गई।

Author January 27, 2018 5:29 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

घर के पास एक कुतिया ने पांच पिल्लों को जन्म दिया तो पत्नी के मन में थोड़ी धार्मिक भावना जागृत हो गई। यों भी अपने देश में आस्था और धर्म के मामले में महिलाएं थोड़ा ज्यादा संवेदनशील होती हैं। घर में खाना बनाने के दौरान सबसे पहली रोटी वे गाय के लिए अलग से बनाती हैं और इसमें चीनी और घी मिला कर गाय को खिलाती हैं। तो कुतिया के पिल्लों के जन्म देने पर पत्नी के दिल में धार्मिक भावना पैदा हुई और उन्होंने उसके लिए गरम हलवा बनाया। फिर बाजार जाकर नई खाली बोरी खरीद लार्इं, ताकि सर्दी में कुतिया और नवजात पिल्लों को गरमाहट मिल सके। अब महिलाएं भी कामकाजी हो रही हैं, जिसकी वजह से गेहूं बाजार से कौन लाए और फिर चक्की पर जाकर पिसाने की माथापच्ची कौन करे! इसलिए अब घरों में सब कुछ बना-बनाया ही आता है। जब पत्नी ने हलवा बनाया और मुझे कुतिया को दे देने के लिए कहा तो मुझे बचपन के दिन याद आ गए।

हम भी जब छोटे थे और मोहल्ले में कोई कुतिया पिल्लों को जन्म देती तो सबसे पहले कहीं से खाली बोरी की व्यवस्था कर उसके लिए सर्दी में भी गरमी का इंतजाम करते थे। इसके बाद खाली बर्तन लेकर घर-घर आटा, घी, शक्कर और गुड़ मांग कर लाते थे और फिर कुतिया के लिए हलवा बनाते थे। जब तक हलवा पूरी तरह बन नहीं जाता था, तब तक कोई भी बच्चा अपने घर नहीं जाता था। घर-घर सामान मांगने और हलवा बनाने का क्रम तब तक चलता रहता था, जब तक कुतिया अपने पिल्लों को छोड़ कर कहीं भोजन की तलाश में नहीं जाती थी।

इस काम में न मजहब आड़े आता था और न ही जात-पात का झगड़ा था। हाथ में खाली बर्तन लिए मुसलिम के घर की चौखट पर भी जाते थे और हिंदू की दहलीज पर भी कदम रखते थे। हलवा बनाने में सभी को अलग-अलग जिम्मेदारी दी जाती थी। कोई बच्चा चूल्हा जलाने के लिए लकड़ियां चुन कर लाता तो कोई गोबर से बने उपलों की व्यवस्था करने में जुट जाता था।

कहने का आशय यह कि यह सारा काम सामूहिकता की भावना पैदा करता था। साथ ही हम सब किसी भी संप्रदाय में नहीं बंटे हुए थे। उस वक्त न तो मोबाइल हुआ करते थे और न टीवी पर अनगिनत चैनलों की बाढ़ थी। शाम के समय टीवी देखने का भी समय निश्चित होता था। सारा परिवार एक साथ बैठ कर टीवी के कार्यक्रम देखते थे। अब रिमोट और मोबाइल हाथ में आने के बाद परिवार की संयुक्त प्रथा प्रणाली और सामूहिकता की भावना का अंत हो गया है।

मैंने जब अपने बच्चे को बचपन की ये यादें बतार्इं तो वह हंसने लगा और एक मिनट में फिर से अपना ध्यान मोबाइल पर देने लगा। मैंने उसे ये बातें बतार्इं तो उसका मतलब यही था कि उसके मन में ऊंच-नीच, जात-पात और सांप्रदायिकता का बीज किसी प्रकार न पले। लेकिन बच्चा भी क्या करे! बच्चा तो पूरी तरह से मासूम और निर्दोष होता है। पालन-पोषण के दौरान उसके कच्चे मन में शुरू से ही वर्ग भेद और मजहब की बातें भर दी जाती हैं। स्कूल में दाखिला लेने के दौरान उसके आवेदन में धर्म और वर्ग-भेद की तस्वीर रख दी जाती है। स्कूल के आवेदन-पत्र में बच्चे का धर्म, उसकी राष्ट्रीयता दर्ज की जाती है। बच्चे से उसका वर्ग और माता-पिता का काम पूछा जाता है।

जब बच्चे का शुरू से ही ऐसी बातों से परिचय कराया जाएगा तो वह बड़ा होकर क्या सीखेगा। ऐसी बातों से तो उसके भीतर और ज्यादा धार्मिक बातें जड़ पकड़ेंगी और वह वर्ग-भेद को मिटाने की कोशिश भी नहीं करेगा। सच यह है कि इन्हीं वजहों से वर्ग-भेद का कीड़ा उसके मन में ऐसा बैठ जाता है कि वह चाह कर भी उसे निकाल नहीं पाता है। बच्चों के मन में शुरू से ही ‘संस्कारों’ के रूप में ऐसी बातें भर दी जाती हैं। लेकिन ऐसी बातों के बजाय अगर उसे सामूहिकता की भावना से अवगत कराया जाए तो वह भी बड़ा होकर समाज को सही दिशा बताने वाला मार्गदर्शक बन सकता है। आगे बढ़ने के लिए बेहतर इंसान बनने की पगडंडी होना जरूरी है।

हालांकि इसके लिए युवा वर्ग को पूरी तरह दोषी ठहराना ठीक नहीं होगा। समाज में संयुक्त परिवार की परंपरा जब से कमजोर हुई है, एकल परिवार की प्रणाली मजबूत होती गई है। तभी से बच्चों के भीतर बेहतर इंसान बनाने वाली बातों की नींव कमजोर हुई है। एक बच्चा जब संवेदना से लैस होकर पलेगा-बढ़ेगा तो आने वाले वक्त में वह स्वस्थ और संवेदनशील समाज बनाने में भी भागीदार बनेगा..!

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