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दुनिया मेरे आगेः रिश्तों की संवेदना

बिहार में पदस्थापित एक अधिकारी से फोन पर बातचीत के क्रम में मैंने यह जानना चाहा कि क्या आपके मां-पिता भी आपके साथ ही रहते हैं, तो उनका जवाब था- ‘नहीं! मैं अपने मां और पिताजी के साथ रहता हूं।’

Author January 3, 2018 3:02 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

अमित चमड़िया

बिहार में पदस्थापित एक अधिकारी से फोन पर बातचीत के क्रम में मैंने यह जानना चाहा कि क्या आपके मां-पिता भी आपके साथ ही रहते हैं, तो उनका जवाब था- ‘नहीं! मैं अपने मां और पिताजी के साथ रहता हूं।’ साधारण समझ के मुताबिक देखें तो इन दोनों बातों में कोई अंतर नहीं दिखेगा। लेकिन इन दोनों बातों में बेहद महत्त्वपूर्ण और बुनियादी फर्क है। अगर हम कहते हैं कि ‘हमारे माता-पिता हमारे साथ रहते हैं’ तो इससे यह बात निकलती है कि हम आपने मां और पिता को अपने साथ रख कर एक तरह से उन पर अहसान कर रहे हैं। इसके अलावा, परोक्ष रूप से यह भी कह दिया जाता है कि उन्हें साथ रखना हमारी जिम्मेवारी नहीं थी, फिर भी हम इसे सामाजिक दबाव के चलते पूरी कर रहे हैं। लेकिन जब हम कहते हैं कि ‘हम अपने माता-पिता के साथ रहते हैं’ तो इसका मतलब होता है कि आज भी मां और पिता का हमारे जीवन में उतना ही महत्त्व है, जितना हमारे बचपन में था। उनके बिना हमारे जीवन में हमेशा एक खालीपन रहेगा, जिसकी भरपाई नहीं हो सकती है। इस बात में रिश्तों का प्राकृतिक मूल्य नजर आता है, जबकि पहली बात में कृत्रिमता दिखाई देती है।

इस सकारात्मक उदाहरण के बरक्स दूसरी तस्वीर कई बार चिंता पैदा करती है। दरअसल, हमारी भाषा, हमारा व्यवहार संवेदना के कई स्तरों को अभिव्यक्त करता है। वह बताता है कि हम कहां-कहां से इंसानी संवेदनाओं से दूर हो रहे हैं या फिर हमारे भीतर वे बनी हुई हैं। एक घटना कुछ समय पहले की है, लेकिन जब सामने आई थी तो सुर्खियों में थी। अमेरिका में रह रहे एक व्यक्ति को मुंबई में अकेले रहने वाली अपनी विधवा मां से जब फोन पर बात नहीं हो पाई तो वह मुंबई आया। लेकिन वहां घर में पहुंचने के बाद उसने अपनी मां को मृत अवस्था में पाया। उनकी मौत काफी दिन पहले हो चुकी थी और शरीर के रूप में सिर्फ कंकाल था। वह वृद्ध महिला मुंबई के एक धनी-मानी इलाके के एक बड़े अपार्टमेंट में अकेले रहती थीं। उस व्यक्ति की अपनी मां से फोन पर बातचीत कई महीने पहले हुई थी, जिसमें मां ने कई बार अपने बेटे से जिक्र किया था कि उसे अकेले रहने में घुटन महसूस होती है… तुम या तो मुंबई आ जाओ या मुझे अमेरिका अपने पास बुला लो। बेटे ने इस बात पर कोई सकारात्मक जवाब नहीं दिया था। आखिर बेटे के भीतर अपनी अकेले रह रही मां के प्रति इस तरह बर्ताव का कारण क्या रहा होगा!

क्या केवल यह मान कर इस मसले को किनारे कर दिया जाना चाहिए कि बेटे की जिंदगी का स्तर बदल गया होगा? अगर यही है तो बेटे के इस व्यवहार का विस्तार उसकी अगली पीढ़ी में होने को भी इसी दलील के साथ स्वीकार कर लिया जाएगा? अगर ऐसा हो, तो समाज में संवेदना की क्या जगह रहेगी और फिर समाज का क्या स्वरूप बचेगा? इस तरह के वाकये हमारे समाज में हो रहे बदलाव को दर्शा रहे हैं। इससे यह भी पता चलता है कि सबसे करीबी संबंधों तक में कैसे मानवीय मूल्यों का कोई मतलब नहीं रह गया है। कंप्यूटर इंजीनियर चिंटू को अपने मां-पिता के साथ रहने में केवल इस बात से परेशानी है कि इससे उसकी निजता में खलल पैदा होगा। चिंटू दिल्ली में पत्नी और बच्चे के साथ रहता है और उसके माता-पिता बिहार के एक छोटे-से शहर में रहते हैं। दिल्ली में रहने वाले एक मित्र के मकान मालिक उनसे हर महीने किराए का पैसा चेक के जरिए लेते हैं। उनका मानना है कि कम से कम चेक देने के बहाने मेरा मित्र उनसे हर महीने मिलने तो आएगा और वे कुछ पल के लिए ही सही, मुलाकात से अपने अकेलेपन को दूर कर पाएंगे। दरअसल, वे मकान मालिक अपनी पत्नी के साथ रहते हैं। उनका एक बेटा मुंबई और दूसरा कनाडा में रहता है।

इस तरह की स्थितियां बड़े शहरों में आसानी से देखने को मिल जाती हैं, जहां रिश्तों और संवेदनाओं का महत्त्व खत्म होता जा रहा है। सोशल मीडिया की भूमिका भी इन रिश्तों को खत्म करने में कम नहीं रही है। जब कोई व्यक्ति केवल अपनी पत्नी और छोटे बच्चे के साथ अपनी तस्वीर सोशल मीडिया पर साझा करता है तो उसकी सूची में मौजूद लोगों की टिप्पणियां वाहवाही और तारीफों से भरी होती हैं। कोई नहीं पूछता कि इस परिवार में केवल पत्नी और उनके छोटे बच्चे क्यों हैं… बाकी मां-पिता, भाई-भाभी, बहन, भतीजा-भतीजी और अन्य की कोई जगह कहां है! हो सकता है कि लोगों के लिए ये बातें महज किताब के उदाहरण की तरह लगें और इन्हें उसी नजरिये से देखा जाए, लेकिन ये समाज में हमारे रिश्तों में आ रहे परिवर्तन के चेहरे हैं।

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