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दुनिया मेरे आगेः व्हाट्सऐप अब आत्मप्रचार का ऐब बन चुका है

अमूमन रोज सुबह पांच-छह बजे ही मोबाइल बजना शुरू हो जाता है और लगभग आठ-नौ बजे तक जारी रहता है।
Author April 3, 2017 10:36 am
कुछ लोग अपने तमाम देश-दुनिया में फैले मित्रों को सुबह के सुखद होने का पैगाम भेजना शुरू कर देते हैं।

सुनील मिश्र

अमूमन रोज सुबह पांच-छह बजे ही मोबाइल बजना शुरू हो जाता है और लगभग आठ-नौ बजे तक जारी रहता है। जिस वक्त हम कई तरह के जरूरी काम में लगे होते हैं, तभी अभिव्यक्ति के अतिरेक से भरे कुछ लोग अपने तमाम देश-दुनिया में फैले मित्रों को सुबह के सुखद होने का पैगाम भेजना शुरू कर देते हैं। मुझे लगता है कि हम सभी के कम से कम दस ऐसे मित्र जरूर होंगे, जिन्हें हमारी सुबह के अच्छी होने की चिंता रोज सताती है। महान ग्रंथों की पंक्तियों से लेकर, देवी-देवताओं का नाम, अनेक प्रेरणाप्रद कल्याणकारी श्लोक और सूक्तियां, अमृत वचनों से वे सुबह हम जैसे अपने अलसाए और अघाए साथियों की भोर को अच्छा बनाने की कोशिश करते हैं।

अब यह ‘पुनीत’ काम संपन्न होता है एक ऐप के जरिए जिसे वाट्स ऐप कहते हैं। आज इसके बिना जैसे संसार अधूरा है, मोबाइल और मोबाइलधारक अधूरा है। जब वाट्स ऐप नया-नया आया था, तब मित्रों की मेहरबानियों पर मिला करता था। किसी मित्र के पास होगा, फिर वह अपने किसी मित्र को प्रस्ताव भेजेगा। उसके बाद वह ऐप डाउनलोड करेगा और फिर इसमें उलझ जाएंगे। धीरे-धीरे यह रोग बेतरह फैलता चला गया। आज शायद ही ऐसा कोई स्मार्ट फोन रखने वाला व्यक्ति होगा जो वाट्स ऐप की लत में नहीं पड़ा हो। हर रोज सुबह गुड मॉर्निंग के ऐसे संदेशों से पहले मैं इस बात को लेकर मित्रों के प्रति कृतज्ञ होता था कि ये कितने त्यागी हैं जो सुबह अच्छा-खासा आराम छोड़ कर उठ जाते हैं और अपने सभी मित्र की सुबह सुहानी होने की दुआ करना शुरू कर देते हैं। बाद में इसके ज्ञानियों ने बताया कि यह तो ब्रॉडकास्ट मैसेज होता है। एक बार सेट कर दिया तो हर रोज सही समय पर मित्रों के मोबाइल पर जम्हाई लेकर बोलता है। यह जान कर मेरी श्रद्धा उन मित्रों के प्रति यह सोच कर तो कम हुई ही कि वे सुबह जागते होंगे, लेकिन साथ ही यह कोफ्त बढ़ गई कि वे खुद भोर की अच्छी नींद में सोते हैं और सारे जहान को जगा देते हैं!

मोबाइल सिरहाने रख कर सोने के विकिरण संबंधी नुकसानों की बात तो अपनी जगह है, लेकिन इस ध्वनि विकिरण और उससे जाग कर गुड मॉर्निंग की कामनाओं से भरे विविध संदेशों को पढ़ना धीरे-धीरे सहनशीलता की परीक्षा लेने में सफल हुआ। कुछ मित्रों से विनयपूर्वक कामनाधारकों की सूची से अपना नाम हटा देने की पेशकश की तो संबंध खराब होते चले गए। बहुतेरे ने बुरा माना और चिढ़ गए। बाद में ठीक ढंग से बात भी नहीं की।

सच यह है कि वाट्स ऐप अब सचमुच आत्मप्रचार का ऐब बन कर फैल गया है। बहाना होता है अपने पास आई सूचनाओं के प्रसार का, लेकिन मित्रों ने छोटी से छोटी बात पर भी वाट्स ऐप में सचित्र जानकारी देने की जैसे झड़ी ही लगा दी। जन प्रतिनिधि, मंत्री, सितारे, खिलाड़ी और सार्वजनिक जीवन में जाने-पहचाने चेहरों के साथ खड़े होने के सुखद और यादगार क्षणों के छायाचित्र खिंचवा कर मित्रों को अपनी प्रतिभा से इस तरह अवगत कराना शुरू कर दिया कि जिसका जवाब ही नहीं। जितना महत्त्व छायाचित्रों में बोलते हुए दिखने का था, उतना ही न बोलते हुए, बल्कि किंकर्तव्यविमूढ़ की तरह सुनते रहने के लिए भी होने लगा। तभी वे सभी चित्र फैलाने लगे। सेल्फी के चमत्कारिक आयाम भी ऐसे समय की ही देन हैं। साझा करने में लोग सेर पर सवा सेर साबित होने लगे। भाई साहब आप बच नहीं सकते देखे बगैर, किसके साथ खड़ा हूं, मेरे कंधे पर किसने हाथ रखा हुआ है, कौन मुझे गले लगाए हुए है, किसका हाथ पकड़ कर मेरा चेहरा चाशनी हुआ जा रहा है… सब देखिए, देखना ही पड़ेगा!

पता नहीं यह ऐप है या ऐब है! पहले मनुष्य की काया वायरल यानी संक्रमणशील बुखार से ग्रसित होती थी, अब उसकी छवि, अदा और उसका अंदाज भी ‘वायरल’ होने लगा। साल के तीन सौ पैंसठ दिन में आने वाले हर दिन की बधाई और शुभकामना हुई। लिखने-पढ़ने वालों और कवियों ने तो जैसे शाब्दिक ऊर्जा का अंबार ही वाट्स ऐप के माध्यम से सजा दिया। अपने ही लोगों और चाहने वालों के बीच विशिष्ट बना कर इस ऐप ने जितना अपरिचय बढ़ा दिया और अघा दिया, उसका कोई मानक न बचा होगा। संगी अपने ही संगियों के बीच इतने बड़े बन गए कि देखने, जानने, सुनने और समझने वाले लोग वाट्स ऐप को दूरी का दुराग्रही मानने लगे हैं। सोशल मीडिया के दूसरे मंचों की तरह यह भी वही वाट्स ऐप है, जिसकी वजह से आज हर सिर हथेली पर रखे मोबाइल पर झुका रहता है, चाहे सरे राह, चाहे लोगों के बीच, चाहे अपनों के बीच!

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