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दुनिया मेरे आगेः बस्ते का बोझ

केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड की 2005 की रिपोर्ट के मुताबिक निजी स्कूलों में किताबों का चयन स्कूलों के हिसाब से होता है, जो नियमानुसार उस स्कूल के शिक्षक तय करते हैं।

Author July 19, 2019 2:01 AM
केंद्र सरकार ने अदालत के हस्तक्षेप के बाद एक महत्त्वपूर्ण निर्णय लिया, जिसमें बच्चों के बस्तों का बोझ निर्धारित किया गया है और राज्य सरकारों से इस पर दिशा-निर्देश तय करने को कहा गया है।

अनूप कुमार बडोला

यह सिलसिला हर साल चलता रहता है। मौजूदा ढांचे में इससे अलग और होगा भी क्या! रिजल्ट के बाद नंबर के हिसाब से स्कूल, प्रवेश के लिए कई कॉलेजों की विवरणिका फीस, दाखिले के लिए भी प्रवेश परीक्षा, नाम निकल जाने पर स्कूल के हिसाब से किताबों की लंबी-चौड़ी सूची। एक खेल, जो सालों से सरकारों की नाक के नीचे खेला जा रहा है निजी स्कूलों द्वारा तथाकथित गुणवत्तापूर्ण और अच्छी शिक्षा के नाम पर। इस पूरी प्रक्रिया में वह बच्चा मूकदर्शक बना रह जाता है, जिसे शिक्षा प्राप्त करनी है। वह दब जाता है स्कूल, अभिभावक और समाज की अपेक्षाओं के तले।

जो खुद को सबसे अलग दिखाने की कोशिश में वह सब कर डालते हैं जो शिक्षा की कसौटी पर कहीं खरा नहीं उतरता है। ठीक वैसे ही जैसे आजकल के टीवी समाचार चैनल सबसे तेज, सबसे पहले के चक्कर में सभी मर्यादाएं भूल जाते हैं। उन्हीं की तरह इस देश में शिक्षा के भी कुछ गिने-चुने चैनल चलते हैं। सबसे अच्छा कौन है- इसके लिए अच्छे भवन, अच्छी सुविधाएं, अच्छी गाड़ियों के साथ-साथ अच्छी किताबों को भी प्रतिस्पर्धा की कसौटी बना लिया गया है। किताबों की इस होड़ में किसकी किताबों का वजन, रंग, पेपर, लेखक कितना वजनदार होगा, यह तय करता है कि कौन-सा स्कूल कितना अच्छा है।

केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड की 2005 की रिपोर्ट के मुताबिक निजी स्कूलों में किताबों का चयन स्कूलों के हिसाब से होता है, जो नियमानुसार उस स्कूल के शिक्षक तय करते हैं। लेकिन किताबों के मुद्रक स्कूलों को प्रोत्साहन राशि, मूल्य में हिस्सा, कुल किताबों की कीमत का प्रतिशत और स्कूलों में शिक्षकों के लिए सेमिनार और कार्यशालाएं आयोजित करना आदि से किताबों के निर्णय में महत्त्वपूर्ण भागीदारी निभाते हैं।

यों केंद्र सरकार ने अदालत के हस्तक्षेप के बाद एक महत्त्वपूर्ण निर्णय लिया, जिसमें बच्चों के बस्तों का बोझ निर्धारित किया गया है और राज्य सरकारों से इस पर दिशा-निर्देश तय करने को कहा गया है। इस निर्णय के जहां स्वास्थ्य संबंधी संदर्भ हैं, वहीं शिक्षा के उद्देश्य के अनुरूप पाठ्य-पुस्तकें और उनका शिक्षार्थी से संबंध भी एक संदर्भ है। इसे शिक्षा तंत्र से जुड़े लोगों और कुछ हद तक अभिभावकों को भी समझने की आवश्यकता है। बच्चों के बस्तों के वजन का सवाल केवल वजन नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक तौर पर बच्चों को समझने का है। अफसोस है कि खासतौर पर निजी स्कूल इसके लिए सबसे ज्यादा उत्तरदायी हैं।

उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड के वर्तमान निर्देशों को कक्षावार प्रतिदिन की समय-सारिणी में सुधार के साथ बस्ते का वजन हल्का करने की जरूरत को समझना भी आवश्यक है। 1992 में प्रोफेसर यशपाल समिति की रिपोर्ट में मूलत: बच्चे के सायास शिक्षण के लिए आयु, बस्ते का वजन, परीक्षा प्रणाली, आनंददायक शिक्षा, पाठ्यक्रम और उस पर आधारित पाठ्य-पुस्तकों को समग्र रूप में देखने की बात कही गई थी। यशपाल समिति ने अपने विश्लेषण में माना कि अगर पाठ्यक्रम और पाठ्य-पुस्तकें ठीक से और ज्ञान सृजन योग्य न बनाई जाएं तो बच्चों के ऊपर अनावश्यक भार बढ़ता है।

आमतौर पर पाठ्य-पुस्तकों में अवधारणाओं को भारी-भरकम तरीकों से रखा जाता है और उनकी भाषा बच्चों की अवधारणात्मक समझ विकसित करने में मदद नहीं कर पाती है। सरल शब्दों में समझें तो बच्चों की विकासात्मक आवश्यकताओं के अनुसार दुनिया भर में यह महसूस किया गया है कि इस प्रक्रिया में स्कूल अधिक पढ़ा देते हैं, लेकिन बच्चों में समझ नहीं बना पाते। इसका परिणाम बच्चों पर मानसिक रूप से पड़ता है। इसी कारण श्रव्य-दृश्य माध्यम को ज्यादातर देशों में शिक्षण में जगह दी गई है। हालांकि इस प्रक्रिया की भी अपनी सीमाएं हैं।

विशेषज्ञों की राय के बाद मद्रास हाईकोर्ट के न्यायाधीश ने जब अपने निर्णय में कहा कि ‘गृह कार्य जैसी प्रक्रियाओं से बहुत छोटे बच्चों को अलग रखा जाना चाहिए क्योंकि उनकी उम्र में दिशा-निर्देशों का पालन करना, अलग-अलग विषय एक साथ याद रखना कठिन होता है। इसलिए यह अव्यावहारिक भी है।’
लेकिन इन सबमें केवल पुस्तक-पोषक और शिक्षा तंत्र से जुड़े लोग ही दोषी नहीं हैं, बल्कि समाज भी जिम्मेदार है। हम सबने भी अपने बच्चों को कम्प्यूटर की तरह एक यंत्र समझ लिया है। मसलन, हमारे बच्चे को सबसे ज्यादा आना चाहिए, भीड़ में अलग दिखने के लिए उसका कुछ अलग बोलना या करना। बल्कि अब तो पैमाना यह बन गया है कि मेरा बच्चा कितने ट्यूशन जाता है।

हम अभिभावकों ने अपने बच्चों को स्वतंत्र चिंतन, ज्ञान सृजन और उन्हें खुद को बनाने से दूर कर दिया है। हमारे बच्चे एक यांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बनते जा रहे हैं और स्कूल उस प्रक्रिया में एक प्रयोगशाला की तरह काम करने लगे हैं। दुनिया रूपी किताबें उस बच्चे के जीवन का हिस्सा नहीं हैं, जिस दुनिया में उसे अपने आपको संयोजित करना है। सभी के लिए यह पहली घंटी बजी है। जाग सकें तो हम आने वाली पीढ़ी को सूचना भार नहीं, बल्कि सृजित ज्ञान का भंडार दे पाएंगे जो उन्हें मानव यंत्र की जगह जीवंत मानव बना पाएंगे।

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