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दुनिया मेरे आगेः बदलाव की बयार

विकास के नाम पर महानगरों से होड़ करते नगर कई साल पहले ही नए रंग-ढंग में रंगने लगे थे। अपार्टमेंट, सोसाइटी और फ्लैट और फिर मॉल संस्कृति अब नगरों के लिए सामान्य बात हो चुकी है।

Author March 9, 2018 2:34 AM
गांव-गांव में अलख जगाती इस टीम में लड़के भी हैं, जो गांवों में पैड के इस्तेमाल के लिए जागरूकता पैदा कर रहे हैं। (File PHOTO)

रश्मि सिंह

विकास के नाम पर महानगरों से होड़ करते नगर कई साल पहले ही नए रंग-ढंग में रंगने लगे थे। अपार्टमेंट, सोसाइटी और फ्लैट और फिर मॉल संस्कृति अब नगरों के लिए सामान्य बात हो चुकी है। इस बीच पिछले कुछ सालों के दौरान जो सुखद बदलाव देखने को मिल रहे हैं, वह यह है कि नगरों के युवाओं में भी स्त्री सशक्तीकरण की छटपटाहट दिखने लगी है। सोचने-समझने और समाज को देखने का नजरिया बदल रहा है। हाल ही में झारखंड की राजधानी रांची में मेरी मुलाकात नई उम्र की नई पौध से हुई। कॉलेज में पढ़ने वाली लड़कियां केवल बातें ही नहीं कहती-सुनतीं, उसे करने का हौसला भी रखती हैं। मैं कुछ ऐसी छात्राओं से मिली, जो कॉलेज के अन्य छात्रों के साथ मिल कर अभियान चला रही हैं लड़कियों में जागरूकता लाने की। वे लोग गांव की महिलाओं को पैड और पीरियड यानी माहवारी के बारे में जागरूक कर रही हैं। उन्हें स्वास्थ्य के प्रति सचेत करती हैं और बताती हैं कि पीरियड या माहवारी कोई ऐसी चीज नहीं, जिससे घृणा की जाए। अगर पीरियड न हो तो महिला बच्चा पैदा नहीं कर सकती। यह प्राकृतिक प्रक्रिया है।
मेरे लिए यह जानना बेहद सुखद था कि गांव-गांव में अलख जगाती इस टीम में लड़के भी हैं, जो गांवों में पैड के इस्तेमाल के लिए जागरूकता पैदा कर रहे हैं। ये लोग आसपास के लोगों और परिचितों से पैसा मांग कर इकट्ठा करते हैं। आपस में पैसा जमा कर नए पैड खरीदते हैं। फिर गांवों तक पहुंच कर उसे बांटते हैं। उनमें जागरूकता लाने के लिए नुक्कड़ नाटक भी करते हैं, जिसमें शरीर और स्वास्थ्य के बारे में बताने की कोशिश की जाती है। फिलहाल इस काम के लिए इन्होंने गुमला से बहुत अंदर जाकर बसे दो गांवों को चुना है। ये दोनों गांव विकास की रोशनी से अछूते हैं।

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ध्यान देने की बात है कि गुमला और आसपास का क्षेत्र अब भी नक्सल प्रभावित माना जाता है। इसलिए उन इलाकों में काम करना किसी के लिए एक दुस्साहस से कम नहीं है। फिर भी नई पीढ़ी की इन बच्चियों में इतनी हिम्मत है कि वे अपने काम को अंजाम देने से जरा भी नहीं हिचक रहीं, बल्कि पीरियड जैसे अब तक वर्जित, छिपा कर बात करने की इस इलाके की परंपरा तोड़ कर खुली चर्चा कर रही हैं। यह सुखद बदलाव इसलिए भी है कि एक जरूरी विषय पर लोग बात करने और समझने के लिए तैयार हो रहे हैं।
धीरे-धीरे ही सही, हमारा समाज बदल रहा है और महिलाएं सशक्त हो रही हैं। कुछ कर गुजरने का हौसला है और समाज से आंख मिलाने की ताकत। वरना दशक भर पहले माहवारी जैसी बातें इतने धीमे स्वर में की जाती थीं कि यह सब पुरुषों को पता न चले। अपना दर्द सह कर भी मुस्कान सजाए रखने की आदत हो गई थी औरतों को। चाहे वे घरेलू महिला हों या कामकाजी। हालांकि इन बच्चों की राह आसान नहीं। शहर की बात अलग है, मगर गांव के लोगों की मानसिकता इतनी जल्दी नहीं बदल सकती। ऊपर से प्रयोग किया कपड़ा यहां-वहां नहीं फेंकने की हिदायत बुजुर्ग महिलाओं द्वारा दी जाती रही है, क्योंकि इसके साथ जादू-टोना से संबंधित अंधविश्वास भी जोड़ दिया गया है। लड़ाई की एक चुनौती इस तरह के अंधविश्वास भी हैं।

मान सकते हैं कि हमारी सामाजिक व्यवस्था संक्रमण काल में है। अब ऐसे विषयों पर फिल्में बनाई जा रही हैं, जो कुछ साल पहले सोच भी नहीं सकते थे। मगर असल बात यहां लड़कियों के अंदर उपजे साहस और हौसले की है जो उन्हें कुछ अलग हट कर करने को प्रेरित कर रहा है। पढ़ाई और खुद के पहनावे को लेकर घर या बाहर वालों से उलझना कोई बड़ी बात नहीं। ठीक इसके पहले वाली पीढ़ी यह काम करती आई है। अब की लड़कियां समाज बदलने के लिए लड़ रही हैं। इसका अप्रत्यक्ष संदेश यह है कि लोगों की मानसिकता में परिवर्तन आ रहा है। जो बंदिशें हैं, वह समाज के डर से है। बहुत जल्दी ये सब बंदिशें और वर्जनाएं टूटेंगी और महिलाओं को भी एक सामान्य पुरुष इंसान की तरह देखना शुरू करेगा।
यों स्त्री उत्थान के संदेश के साथ इस साल का महिला दिवस गुजर गया। लेकिन उम्मीद है कि आगे बंटवारा स्त्री-पुरुष में नहीं होगा और निस्संदेह हमलोग अब वास्तविक सामाजिक परिवर्तन की ओर आगे बढ़ेंगे। मेरे लिए यह जानना बेहद सुखद था कि एक महिला शरीर के प्राकृतिक चक्र को लेकर समाज में जो अंधविश्वास और दुराग्रह फैले हुए थे और माहवारी के दौरान कई बार महिलाओं को बेहद उपेक्षित और अपमानित करने वाली स्थिति से गुजरना पड़ता था, उस पर नई दृष्टि से सोचने-समझने और बात करने के लिए लोग सहज हो रहे हैं। अगर इसकी दिशा सकारात्मक रहती है तो आने वाले दिनों में स्त्रियों का जीवन थोड़ा आसान होगा।

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