ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगेः उदास नदियां

यह संभव है कि एक दिन हम गहरी नींद से जागेंगे और पाएंगे कि हमारे घर के बर्तन फर्श पर पड़े औंधे मुंह धूल फांक रहे होंगे।

Author January 4, 2018 03:14 am
हिंडन के किनारे बसे गांवों में कैंसर जैसी बीमारी के बढ़ने का कारण लगातार वर्षों तक इकाइयों से निकलने वाले घातक रासायनिक पानी को सीधा नदी में डालने से हुआ है।

राय बहादुर सिंह

यह संभव है कि एक दिन हम गहरी नींद से जागेंगे और पाएंगे कि हमारे घर के बर्तन फर्श पर पड़े औंधे मुंह धूल फांक रहे होंगे। सूखे की ऐसी मार पड़ी होगी कि आरओ और रेफ्रिजरेटर कबाड़ हो जाएंगे। लाख तलाशने पर भी पानी की एक बूंद कहीं से भी नमूदार न होगी। देश की तमाम नदियां अपना रूप-रंग खो चुकी होंगी और हमारे समाज के बदन से बहे मैल को नालियों की शक्ल में पीते-पीते आखिरी सांस ले रही होंगी। तब गंगा किसी मरते को मयस्सर तक न होगी। जो बचा खुचा पानी हमारे पास रह जाएगा, वह जल की सूरत में छोटी-छोटी डिबिया में मिला करेगा। यह वही जल होगा, जिसे आज हम ‘चुल्लू भर पानी’ कहते हैं। उसमें हमारा भविष्य और हमारी संस्कृति सिंधु सभ्यता की तरह जल समाधि ले लेगी।
यह खयाल काफी चुभने और डराने वाला है, लेकिन सच है। पर्यावरण विशेषज्ञ लगातार चेताते आ रहे हैं कि तेजी से बढ़ते प्रदूषण से ग्लेशियर पीले पड़ रहे हैं और लगातार पिघलते जा रहे हैं। इनके पिघलने से बनी नदियां हमारे अंधे विकास के कारण नाला बनती जा रही हैं। यह समस्या किसी सात समंदर पार के देश की नहीं, बल्कि भारत की है। आज यमुना लगभग नाला हो गई है। यह सोचने भर से हैरत होती है कि जिस नदी का भारतीय समाज के लिए धार्मिक सांस्कृतिक और व्यावसायिक महत्त्व बहुत ज्यादा है, वह नाला हो गई। लोग फिर भी बेफिक्र हैं। यही हालत वर्तमान में पवित्र कही जाने वाली गंगा की है।

जिन लोगों ने गंगा का ‘उद्धार’ करने की जिम्मेदारियां उठाई थीं, भावुक अपीलें की थीं, वे सब शायद लंबी नींद में अच्छे दिनों के ख्वाब बुनने में लगे हैं। इसके बावजूद यह भी सच है कि दूसरों पर लानत भेजने से कुछ नहीं होगा। अगर देश की जीवनदायिनी गंगा को हम यों ही नजरअंदाज करते रहेंगे तो वह दिन दूर नहीं है जब हम गंगा के किनारे पर पल भर को रुक कर उसे निहार भी नहीं पाएंगे। उसमें बहता गाद और मैला दूर तक फैला होगा, जिसकी सड़ांध हमारा पीछा करते हुए हमारे घरों तक आ जाएगी।
हाल ही में आई एक खबर के मुताबिक जो गंगा गरमी के दिनों में संकरी होती थी और बालू के टीले दिखाई देते थे, वैसी स्थिति सर्दी के दिनों में नजर आ रही है। गंगा में अब धारा भी बनती नजर नहीं आ रही है। ऐसी स्थिति में गंगा सूख भी सकती है। कैग की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि ‘नमामि गंगे’ के तहत 2600 करोड़ रुपए गंगा की सफाई में इस्तेमाल नहीं हुए। यह स्थिति हम सबके लिए खतरे की घंटी है।

यमुना और गंगा दोनों ही नदियों से मेरा गहरा संबंध रहा है। मेरा गांव गंगा से कुछ मील दूर पर बसा हुआ है। वहीं मेरा जन्म हुआ। मैं एक लंबे समय तक अपने भाई-बहनों और बुजुर्ग लोगों के साथ भी भोर में गंगा में नहाने जाता था। तब से अब तक मैंने हर साल गंगा के पानी को बदलते देखा है। यमुना की हालत इससे भी बदतर है। साल दर साल इसका पानी स्याह होता गया। चूंकि मैं यमुना के पास ही रहता हूं, इसलिए जब-तब यमुना किनारे हो आता हूं। अब ऐसा लगता है जैसे यमुना में तारकोल बह रहा हो। उसकी सड़ांध खुले गटर से भी गंदी हो गई है। यमुना के बारे में जानकार कहते हैं कि यह नदी एक दिन मर जाएगी। पर मुझे लगता है कि वह कब की मर चुकी है। हैरत इस बात पर है कि पूरा जनतंत्र एक नदी की मौत पर खामोश है। यहां व्यक्ति के अधिकार सुरक्षित हैं, पर एक नदी के नहीं!

हमने बेहतर जीवन के लिए 1990 में औद्योगीकरण का दामन थामा था। तब हमें बस उसका लाभ नजर आया था, पर उसके नुकसान देर से सामने आ रहे हैं, विकराल समस्या के रूप में। तब से अब तक लगातार सरकारें बदली हैं और इस दौरान नदियों की स्थिति बद से बदतर हुई है। इसमें यमुना और गंगा को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। ये नदियां हमारे जीवन का मूल आधार हैं। ‘गंगा की क्या बात करूं, गंगा उदास है/ वह जूझ रही है खुद से और बदहवास है।’ यह हालत गंगा की है, मगर यमुना की अलग कहां है!
देश की व्यवस्था को चलाने वाले दिल्ली में रहते हैं। दिल्ली में पीने का पानी दूसरे राज्यों से आता है। एक दिन हमारी बेरुखी की मार से गंगा भी सूख जाएगी। तब हम जीने के लिए जरूरी पानी के लिए शायद तरस रहे होंगे। ऐसी सूरत में खून सस्ता हो जाएगा और पानी महंगा हो जाएगा। तब वे नारे जो आज बस नारे जैसे ही प्रतीत होते हैं, उनकी बहुत याद आएगी। उन नारों को हम स्कूलों की दीवारों पर लिखा पाते हैं, जिनमें कहा गया है कि ‘जल ही जीवन है।’

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App