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दुनिया मेरे आगेः अन्यथा न लें

आज जमाना सीधी बात का है, लेकिन एक समय वह भी था जब किसी नौसिखुए को प्रेम करने के लिए तमाम पापड़ बेलने पड़ते थे।

Author December 13, 2017 3:39 AM
प्रतीकात्नक तस्वीर

अरुणेंद्रनाथ वर्मा

आज जमाना सीधी बात का है, लेकिन एक समय वह भी था जब किसी नौसिखुए को प्रेम करने के लिए तमाम पापड़ बेलने पड़ते थे। प्रेम की राह पर कदम उठाने के इच्छुक को पहले ही बता दिया जाता था कि यह ‘आग का दरिया है और डूब के जाना है।’ इसलिए उचित होगा कि इस राह पर चलने के आकांक्षी सबसे पहले आवश्यक जानकारी इकट्ठा करें। इस प्रारंभिक तैयारी में अनुभवी दोस्तों की सलाह लेने से लेकर प्रेमोपयोगी साहित्य का अध्ययन तक शामिल होते थे। उन दिनों ऐसे साहित्य की प्रतिनिधि पुस्तक थी ‘एक सौ एक तड़पते हुए प्रेमपत्र!’ इसकी विशेष उपलब्धि थी उसमें दिए हुए नमूना प्रेमपत्रों के आरंभ और अंत में दिए हुए खास शेर। उदाहरण के लिए एक प्रेमपत्र की शुरुआत इस धमकी से हुई थी कि लेखक अपनी अल्हड़ प्रेमिका के कजरारे नैनों के कटाक्ष से आहत होने की शिकायत किसी हाकिम से करेगा तो एक अतिरिक्त आरोप यह भी लगाएगा कि वह कत्ल तो करती है, पर उसके लिए हाथों में तलवार भी नहीं उठाती। उसके पुरुष लेखक को शायद स्त्रियों की शिकायत का खयाल रखना जरूरी नहीं लगा! जाहिर है, प्रेमपत्र वाली किताब में दिए शेरों को पढ़ कर लगा था कि जो भी दर्द का दौरा आदि प्रेमरोग में होता है, अधिकांशत: लड़कों को ही होता है।

प्रेम निवेदन के तरीके भले बदल गए हों, प्रेम की तड़प की एकतरफा स्थिति आज भी नहीं बदली है। आज ‘कत्ल’ करने के बाद प्रेमिका या प्रेमी न तो परेशान होते हैं, न किसी अपराध बोध से ग्रस्त होते हैं। वे सारा काम बस इतना कह कर चला लेते है कि ‘मैंने तो आपको दोस्त समझा, कृपया इसे अन्यथा मत लीजिएगा।’ स्थिति इतनी बिगड़ गई है कि ‘कत्ल’ तो बाद में होता है, ‘कृपया इसे अन्यथा मत लीजिएगा’ पहले ही कह दिया जाता है। लेकिन ‘अन्यथा न लेने’ का तथाकथित कामयाब नुस्खा भी अब अशक्त होता जा रहा है। कुछ समय पहले तक आप जब चाहें किसी को जी भर कर कोस सकते थे, किसी के चरित्रहनन का मन बने तो आराम से ऐसा कर सकते थे। हिंसा पर उतारू होने का मन करे तो धारा एक सौ चौवालीस वाले क्षेत्र में जमा बेशुमार भीड़ की तरह खुल कर पत्थरबाजी, आगजनी, कुछ भी कर सकते थे। बस इतनी सावधानी बरतने की जरूरत थी कि ऐसा कुछ करने से पहले अपनी हरकतों के भावी शिकारों से ‘अन्यथा न लेने’ का अनुरोध कर लें।

लेकिन आजकल एक बीमारी का इलाज निकलता है तो दूसरी नई बीमारी पैदा हो जाती है। कुकुरखांसी का उपचार निकला तो स्वाइन फ्लू आ गया। उससे टक्कर लेने के तरीके निकले तो पागल गाय रोग (मैड काउ डिजीज) ने हमला कर दिया। उसका भी तोड़ खोज लिया गया तो चिकेनगुनिया पैदा हो गया। तुम डाल-डाल, हम पात-पात के इस खेल में ‘अन्यथा न लेने’ वाले अनुरोध का भी तोड़ निकल आया है। अब ‘अन्यथा न लेने’ का अनुरोध किए जाने के पहले ही लोगों की भावनाएं आहत हो जाती हैं।
आहत भावनाओं के इस युग में सांस्कृतिक-साहित्यिक रचनाशीलता आहत भावनाओं के नाम से ही थरथर कांपने लगी है। पत्र-पत्रिकाएं इसीलिए व्यंग्य की विधा से दूरी बरत रही हैं। जिन इक्का-दुक्का ने अभी तक व्यंग्य-विधा को बनाए रखा है, उन्होंने दरबारी संगीतकार और फैमिली डॉक्टर की परंपरा में अपना निजी व्यंग्यकार स्थायी रूप से नियुक्त कर लिया है। व्यंग्यकार उनके मिजाज से और वे व्यंग्यकार के मिजाज से परिचित होते हैं। इसलिए उन्हें कोई डर नहीं रहता। घर का व्यंग्यकार उन संस्थाओं से परिचित होता है, जो आय के स्रोत होते हैं। उन नेताओं को जानता है जो दफ्तर पर पत्थरबाजी से लेकर आग लगाने तक का ठेका दे सकते हैं! उन गुंडों को पहचानता है जो ये ‘पवित्र’ काम संभाल सकते हैं।

भावनाओं के आहत होने पर आंधी-तूफान संभावित क्षेत्रों में वह व्यंग्यकार ‘अन्यथा न लेने’ की छतरी लगा कर भी नहीं जाता। मासिक-द्वैमासिक या त्रैमासिक पत्रिकाएं इस मामले में सौभाग्यशाली हैं। जब तक उनमें कोई ज्वलनशील सामग्री छपती है, आमतौर पर लोगों की भावनाएं आहत होते-होते थक चुकी होती हैं! इसलिए आहत भावनाजन्य तोड़फोड़ भी काबू में आ चुकी होती है। भावनाएं हैं कि एक की नहीं तो किसी दूसरे की, हर दूसरे दिन आहत हो जाती हैं। उनका खमियाजा अप्रत्यक्ष रूप से आमदनी में गिरावट से लेकर प्रत्यक्ष तोड़फोड़ तक के रूप मे भरना पड़ता है। आने वाले समय में सफल नेतृत्व उसे माना जाएगा जो हमेशा सही-सही भांप सके कि दो सशक्त गुटों की लड़ाई में किस पक्ष की भावना कम आहत होगी, किसकी ज्यादा। कौन पक्ष घटना से पहले ‘कृपया अन्यथा न लें’ बता देने भर से संतुष्ट हो जाएगा और किस पक्ष की भावनाएं कुछ भी पढ़ने से पहले ही आहत हो जाएंगी!

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