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दुनिया मेरे आगेः विश्वास की डोर

हाल ही में आई एक खबर के मुताबिक किसी बस के यात्रियों ने नशे में धुत्त ड्राइवर की पिटाई की। ऐसा इसलिए हुआ कि उस चालक ने यात्रियों के विश्वास को ठेस पहुंचाई।

Author December 28, 2017 3:26 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

महेश परिमल

हाल ही में आई एक खबर के मुताबिक किसी बस के यात्रियों ने नशे में धुत्त ड्राइवर की पिटाई की। ऐसा इसलिए हुआ कि उस चालक ने यात्रियों के विश्वास को ठेस पहुंचाई। किसी भी वाहन में यात्रियों का मानना होता है कि चालक अपनी जिम्मेदारी निभाएगा। इसी विश्वास के बल पर वे अपना जीवन उसके हवाले करके चैन की नींद भी लेते हैं। ऐसे में उन्हें पता चले कि जिसके भरोसे उन्होंने अपना जीवन छोड़ दिया है, वह नशे में है तो डरना और क्रोध आना स्वाभाविक है। ऐसा जीवन में कई बार होता है, जब हम विश्वास की पराकाष्ठा से परे जाकर सोचते हैं। अगर हो तो विश्वास बहुत बड़ी चीज होती है, जिसके बल पर बड़े-बड़े काम हो जाते हैं। घर-गृहस्थी की गाड़ी विश्वास के दो पहियों पर चलती है। विदेश जाते हुए बेटे से मां केवल इतना कह दे कि ‘मुझे तुम पर विश्वास है मेरे बेटे, तुम कोई गलत काम नहीं करोगे’ तो यही शब्द बेटे को लगातार प्रेरणा देते रहते हैं। वह पूरी शिद्दत से अपने काम पर लग जाता है। कभी हताशा के भंवर में फंस कर वह कुछ गलत करना भी चाहता है, तो उसे मां के शब्द याद आ जाते हैं। यही है विश्वास मां का, जो बेटे पर कुछ शब्दों के कारण टिका रहता है।
विश्वास पर बाइबिल में कहा गया है कि सच्चा विश्वास ठोस सबूतों पर आधारित होता है।

दूसरे शब्दों में विश्वास का मतलब है पूरे भरोसे के साथ इंतजार करना। इसे अन्य तरीके से समझने के लिए विश्वास को ‘अधिकार-पत्र’ से भी जोड़ा जा सकता है। मान लीजिए कि किसी ने आपको एक मकान देने का फैसला किया है। मगर इसका यकीन तभी होगा, जब वह आपको मकान का अधिकार-पत्र देगा। उसी तरह अगर हमारे भीतर विश्वास है, तो यह ऐसा है, मानो हम जिन बातों पर विश्वास करते हैं उन्हें देख चुके हैं। विश्वास हृदय से उठने वाली वह तरंग है जो परस्पर बंधी होती है। सफर के दौरान दो अनजाने लोग धीरे-धीरे एक-दूसरे से भावनात्मक स्तर पर भी जुड़ जा सकते हैं। कई बार सफर खत्म होने पर वे एक प्रगाढ़ रिश्ते में भी बंध जाते हैं। यही हैं विश्वास की वे तरंगें, जिसने दोनों को एक सूत्र में बांध दिया।

लेकिन जीवन की आपाधापी में अक्सर हम अपनों पर भी विश्वास नहीं कर पाते और कई बार किसी अनजाने पर भी पूरा भरोसा कर लेते हैं। बेटी के रिश्ते के लिए किसी रिश्तेदार ने बात की। हमें उस पर विश्वास नहीं होता। हम अपने स्तर पर लड़के के बारे में पूछताछ करते हैं। इस बीच कहीं छोटा-सा भी खटका लगा, तो हम रिश्ता नहीं जोड़ पाते। बेटी को किसी प्रकार का दुख न हो, इसलिए हम तमाम जुगत करते हैं। लड़का भला हो बस। दूसरी ओर, लड़की के ही रिश्ते के लिए या किसी और वजह से पूरे परिवार समेत कहीं जाते हुए ट्रेन पर सवार हो जाते हैं। ऐसी यात्राओं में केवल हमारा ही नहीं, ट्रेन में सवार सभी लोगों का परिवार केवल एक ड्राइवर के भरोसे पर आश्रित हो जाता है। उस वक्त हम ड्राइवर के किसी भी नकारात्मक पहलू के बारे में नहीं सोचते। यहां हम सशंकित नहीं होते, क्योंकि हम विश्वास के रथ पर सवार हैं।

इस विश्वास को क्या कहें? मानव ऐसा जीव है जो एक तो विश्वास नहीं करता, लेकिन जब करता है तो पूरी आश्वस्ति भाव से। हम कितने भी आधुनिक हो जाएं, लेकिन विश्वास के मामले पर हम अपने बचपन से बने मानस पर निर्भर होते हैं। घर के बुजुर्गों के किस्से-कहानियों में कहीं किसी व्यक्ति विशेष के बारे में कुछ किंवदंती हो सकती है, लेकिन अपने जीवन में वही किंवदंती हम दोहराना नहीं चाहेंगे। जिसने हमारे बुजुर्गों के साथ विश्वासघात किया, उनकी अगली पीढ़ियों पर भी विश्वास करने में हमें बहुत वक्त लग जाता है। विश्वास एक छोटा-सा शब्द है, जिसे पढ़ने में एक सेकेंड लगता है, सोचें तो मिनट लगता है, समझें तो दिन लगता है, लेकिन साबित करने में सारी जिंदगी लग जाती है। मनुष्य को विश्वासी होना चाहिए, ‘विष-वासी’ कभी नहीं।

हम सबने देखा होगा कि पिता के कंधे पर बच्चा कितने विश्वास के साथ बैठा खिलखिलाता रहता है! बंदरिया कितने विश्वास के साथ अपने बच्चे को पेट या पीठ से चिपकाए एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर छलांग लगाती है! नट एक रस्सी पर कितने विश्वास से सधे कदमों के साथ आगे बढ़ता है! अधिक दूर जाने क्या जाएं। हम अपनी घड़ी को ही देखें। उसे पट्टे के साथ जोड़ने वाली एक छोटी-सी सूईनुमा चीज कितनी महत्त्वपूर्ण है! हमारी कीमती से कीमती घड़ी को वही छोटी-सी सूईनुमा चीज संभालती है। किन्हीं वजहों से रुक जाती है तो हम आशंकित हो जाते हैं कि कहीं वक्त आगे न निकल जाए!

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