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दुनिया मेरे आगेः कुदरत के संग-संग

सभी मनुष्यों में सद्भावनाएं होती हैं, लेकिन वे दबी रहती हैं। उनका सदुपयोग नहीं हो पाता। लेकिन फाल्गुन मनुष्य की इन सद्भावनाओं को विचलित करता है।

Author March 2, 2018 3:01 AM
सभी मनुष्यों में सद्भावनाएं होती हैं, लेकिन वे दबी रहती हैं। उनका सदुपयोग नहीं हो पाता

विकेश कुमार बढ़ोला

सभी मनुष्यों में सद्भावनाएं होती हैं, लेकिन वे दबी रहती हैं। उनका सदुपयोग नहीं हो पाता। लेकिन फाल्गुन मनुष्य की इन सद्भावनाओं को विचलित करता है। आमतौर पर सभी लोगों का व्यक्तित्व तरह-तरह की भावनाओं का जंजाल बन चुका है। उनकी स्थिर, सद और प्रेम से भरी भावनाएं भी जंजाल में उलझी हुई हैं। शायद यह इस दौर और इसके मानवीय जीवन का प्रभाव या दुष्प्रभाव है। लोगों के विचारों और भावनाओं में पारस्परिक प्रेम और सहयोग नहीं रहा। जो कुछ बचा है, वह बाहरी आकर्षण और तात्कालिक लगन। दीर्घकालीन कुछ भी नहीं। बस एक-दो-तीन दिन या ज्यादा से ज्यादा एक महीने तक ही मनुष्य किसी घटना, दुर्घटना या व्यक्ति, प्रकृति से प्रभावित होता है। इसके बाद सब सामान्य हो जाता है। बल्कि सामान्य भी नहीं, अनदेखा, अरुचिकर और कुंठा बढ़ाने वाला हो जाता है। जीवन में हम इसी पुरानी स्थिति से न घिरे रहें और हमारा सोचना-समझना पुराना ही न पड़ा रहे, इसके लिए ऋतुएं हमें सचेत करती रहती हैं।

मौसम में बदलाव अनेक सुंदर माध्यमों से होता है। फाल्गुन, बसंत और होली ऐसे ही माध्यम हैं। जलवायु में यह नया बदलाव जीवन को जीवंत कर देता है। पिछले मौसमों के जरिए दी गई मानसिक-शारीरिक व्याधियां इस समय दर्द में होते हुए भी आनंद का अहसास कराने वाले परिवर्तन से गुजर रही होती हैं। आत्मिक और मानसिक रूप से इस दुनिया से अलग कई लोग केवल फाल्गुन के कारण वापस जुड़ जाते हैं। वरना सामाजिक, मानवीय रूप में यह जगत बेहद असहज और प्रतिकूल हो चुका है। पिछले एक-डेढ़ दशक में मनुष्यों का मशीनों से बढ़ा बेलगाम लगाव उन्हें कृत्रिम मानव बना चुका है। मानव जीवन का प्राकृतिक, ग्रामीण और सामाजिक स्वभाव तिरोहित हो चुका है। मानवीय जीवन में मनुष्यों के लिए जो कुछ बचा है, वह धन-संसाधन संपन्न होने की उत्कट इच्छा ही है। हमारा उद्धार इसी इच्छा के सहारे तो नहीं हो सकता।

इतना होने के बाद भी व्यक्ति का जो मूल स्वरूप है, वह उसे यह सोचने के लिए मजबूर करता है कि उसका जीवन दरअसल वह नहीं, जैसा वह भौतिक दुनिया के कर्ताधर्ताओं के लिए बन रहा है। जीवन के सच का अहसास मनुष्य को तब होता है, जब वह प्राकृतिक बातों, घटनाओं और बदलावों को खुद देखता-समझता करता है। होली का उत्सव मौसम में हो रहे बदलावों में से एक अद्भुत परिवर्तन है। अगर हम पौराणिक संदर्भों को छोड़ कर केवल मौसम के बदलते सौंदर्य के अनुसार होली के त्योहार को अनुभव करें तो हमें एक से बढ़ कर एक बेहतरीन अनुभूतियां होंगी। और यह सब होता है प्रकृति की खूबसूरती के आकर्षण के कारण।

प्रकृति इन दिनों विविध सौंदर्य रूपकों से सजी-संवरी रहती है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक सूर्य की रोशनी में सभी प्राकृतिक घटक कितने भोले सौंदर्य से चमक रहे होते हैं! जहां देखो, वहां प्रकृति का नया चेहरा सामना आ रहा होता है। वृक्ष, शाखाएं, लताएं, आकाश, क्षितिज, रंग-रंगीले फूल, पृथ्वी की हरियाली, मनुष्य और पशु-पक्षी- सभी इस मौसम में विचित्र, मनमोहक बन जाते हैं। सूर्योदय के समय समूची धरा जिस सौंदर्य का बोध कराती है, वह निश्चित रूप में मानवीय जीवन के लिए अमृत होता है। दिन-दोपहर के बढ़ते रहने से प्रकृति की छटा जो रूप, वेश, सौंदर्य, रंग बदलती है, उससे मनुष्य का मन क्लेश से मुक्त हो जाता है। शाम को बासंती मौसम का प्रौढ़ रूप ढलते सूर्य की किरणों के साथ जगमग-जगमग करता हुआ मनुष्य के सभी विकार हर लेता है। पूर्णिमा का चांद और इसका प्रकाश दिन भर के बासंती सौंदर्य को और ज्यादा मुग्ध करने वाला बना देता है। ऐसे मौसम में कृत्रिम मदिरा पान की जरूरत क्या, जब मनुष्य प्रकृति के मादक रूप से मदन बन कर चारों ओर रंग-रंगीला बन कर बिखर जाता है।

साल भर हमारे जीवन में देश-दुनिया की जिन-जिन घटनाओं ने बुरा प्रभाव डाला, उन घटनाओं की विसंगतियों की वजह से हमारे भीतर जो कलुष इकट्ठा हुआ और जिसके चलते हमारी मानसिक-शारीरिक अवस्था कुंठित हुई, बसंत के फाल्गुन महीने में होली के रंगों में वह सब धूल-धूसरित होकर धुल जाता है। हमारा तन-मन नई चेतना, ऊर्जा और नई उमंग से भर कर जीवन से नई लगन लगाता है। इस तरह मनुष्य जीवन को प्राकृतिक, बासंती अपनत्व प्राप्त होता है।
इस दुनिया में उन्नति की अहमियत रूप में ही है। भौतिक उन्नति को प्राकृतिक उन्नति के सामने नहीं रखा जा सकता। आधुनिकता का ज्यादा आनंद हासिल कर लेने के बाद भी देश-दुनिया के अधिकतर विद्वानों को प्रकृति के बारे में जो कड़वे अनुभव हुए या हो रहे हैं, उनका निष्कर्ष यही है कि हमें पुराना प्राकृतिक मानवीय जीवन ही आधुनिकता की नृशंस आपदाओं से बचा सकता है। इसलिए प्रकृति के संरक्षण की दिशा में क्रांतिकारी काम किए जाने की तुरंत जरूरत है। इसके बिना या इसमें देरी करने पर दुनिया दिनोंदिन मारक जलवायु परिवर्तन से गुजरती रहेगी!

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