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दुनिया मेरे आगेः सुबह की सैर

भोपाल से तबादले के बाद इंदौर आने पर मैं वरिष्ठ नागरिकों के एक समूह में शामिल हो गया। सुबह की सैर की आदत पहले से थी।

Author January 6, 2018 2:52 AM
(प्रतीकात्मक तस्वीर)

विलास जोशी

भोपाल से तबादले के बाद इंदौर आने पर मैं वरिष्ठ नागरिकों के एक समूह में शामिल हो गया। सुबह की सैर की आदत पहले से थी। हमारे समूह में ज्यादातर साठ से पैंसठ साल के बीच के लोग हैं। सुबह की सैर में कुछ लोगों के साथ उनकी पत्नी भी होती हैं। कुछ दिनों के दौरान मैंने देखा कि अधिकतर वरिष्ठ लोग रोजाना सैर के समय चलते हुए अपने बहू-बेटों के बारे में ही बातें करते हैं। एक दिन सुबह की सैर के बारे में बातचीत चल रही थी, तब मैंने बताया कि भोपाल में मेरे साथ एक दंपति रोजाना सैर के लिए आते थे। एक दिन बुखार की वजह से नहीं जा सका। लेकिन वे सुबह छह बजे निकले। जब वे न्यू मार्केट इलाके से गुजर रहे थे, तभी उनकी नजर रास्ते पर पड़े पांच सौ के नोट पर पड़़ी। पति महाशय ने वह नोट उठाया और अपनी जेब में रख लिया। सुबह-सुबह ‘लक्ष्मी’ का मिलना ‘शुभ’ माना जाता है। इसलिए वे बहुत खुश हो हुए।

लेकिन इसका असर यह हुआ कि अगले दिन से मैं उनके साथ सैर के लिए न आ सकूं, इसलिए उन्होंने मुझे कहा- ‘भाई साहब, आप रोजाना गार्डन की तरफ सैर पर चलने के लिए कहते हैं। लेकिन अब हमने सोचा है कि रोजाना न्यू मार्केट रोड से सीधे लाल घाटी की तरफ जाने वाली सड़क पर सैर के लिए जाएंगे।’ अब मैं उन्हें क्या कहता! सो मैंने कह दिया कि आपको जहां उचित लगे, वहां सैर के लिए जाएं।

मैं पुराने रास्ते से ही सैर के लिए जाया करूंगा। एक दिन सुबह दस बजे के करीब मुझे उनकी पत्नी का फोन आया। उन्होंने कहा कि आप जल्दी से हमारे घर आ जाइए। कोई आशंका साथ लिए जब मैं उनके घर पहुंचा, तब उन्होंने बताया कि आज सुबह सैर के दौरान जब हम न्यू मार्केट रोड से गुजर रहे थे, तभी एक काले कुत्ते ने इनको (पति को) काट लिया। लगे हाथ उन्होंने पांच सौ रुपए मिलने के लालच में ही उस रास्ते जाने की बात भी स्वीकार कर ली।

कई बार बातें और उनके आशय कैसे एक दूसरे से जुड़े होते हैं! जब मैंने इंदौर में सुबह की सैर के अपने साथियों को लगातार अपने बहू-बेटों की उनके बुरे व्यवहार के लिए आलोचना करते सुना तो मैं सोच में पड़ गया कि आखिर हम सुबह की सैर के लिए क्यों आते हैं! विश्व स्वास्थ्य संगठन की परिभाषा में अच्छा स्वास्थ्य उसे माना गया है जो शारीरिक रूप से स्वस्थ होने के साथ-साथ मानसिक रूप से भी स्वस्थ हो। मेरे वरिष्ठ साथी सुबह की सैर से शारीरिक रूप से तो स्वस्थ हैं, लेकिन मुझे लगा कि वे मानसिक रूप से भी सुखी और स्वस्थ रहें, इसके लिए मुझे कोई कदम उठाना चाहिए।

अगले दिन जब हम सैर के दौरान एक जगह बैठ कर बात कर रहे थे, तब एक महोदय ने कहा कि मेरी बहू नहीं चाहती कि मैं उनके साथ रहूं। वह कंटीले शब्दों में मुझे कहती है कि आप अपने बड़े बेटे के पास जाकर मुंबई में रहिए या किसी दूसरी कॉलोनी में कमरा ले लीजिए। उनकी बात सुन कर मैंने उनसे पूछा- ‘अंकल, क्या आपको पेंशन मिलती है?’ जवाब में वे बोले- ‘बेटा, अगर मुझे पेंशन मिल रही होती तो क्या मेरी बहू मुझे ऐसी विषभरी चुभती बातें सुनाती? पेंशन पाने वालों को तो ‘दूध देती गाय’ माना जाता है न!’
इस प्रकार रोजाना सैर के दौरान इसी तरह की बातें सुनते-सुनते मेरे दिल-दिमाग पर बुरा असर पड़ने लगा। एक दिन मैंने सबको कहना शुरू किया- ‘मैं आज आप सबसे कुछ बातें कहना चाहता हूं जो मुझे एक बुजुर्ग व्यक्ति ने ही बताई थीं। मित्रो, अपने बच्चों के पास बहुत पैसा है, ऊंची तनख्वाहें भी हैं। कुछ लोगों के बच्चे अपने माता-पिता को अपने साथ नहीं रखना चाहते, लेकिन उन्होंने उनको अपने घर के बाहर निकाला भी नहीं है। हममें से कुछ लोगों की पत्नी का निधन हो चुका है तो कुछ के पति का। मुझे उन बुजुर्ग ने जो बात बताई थी, वह इस तरह है- ‘हमारा जन्म सिर्फ अपनी अपेक्षाओं की पूर्ति करने भर के लिए नहीं हुआ है, बल्कि वह कुछ ‘कर्ज’ की वापसी करने के लिए भी हुआ है।
अब बेटा और बहू आपसे बात नहीं करते हैं या कभी अपमानित करते हैं तो इसे आप किसी एक ‘कर्ज’ की वापसी समझ लीजिए। इसी प्रकार, अपने जीवन की हर एक छोटी-बड़ी घटना को देखने का नजरिया बनाइए। अपने अतीत को याद कीजिए, जब आप अपने बेटे-बहू के जीवन के दौर में थे।’ अतीत के जिक्र का आशय शायद उन सबको समझ में आ रहा था। लेकिन सवाल यह है कि मौजूदा पीढ़ी को अपने भविष्य के बारे में कैसे समझ में आए!

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