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दुनिया मेरे आगेः सुबह का सुख

सर्दी अब अपने पूरे रंग में है। समय से पहले शाम होने लगी है। जिस आश्वस्ति के साथ दिन में घर से निकलते हैं, शाम होते-होते वह हारती-सी महसूस होती है।

Author Published on: December 9, 2017 3:30 AM

सुनील मिश्र

सर्दी अब अपने पूरे रंग में है। समय से पहले शाम होने लगी है। जिस आश्वस्ति के साथ दिन में घर से निकलते हैं, शाम होते-होते वह हारती-सी महसूस होती है। इस बात का मलाल होने लगता है कि कपड़े जरूरत से कम पहने हैं। सिहरन, कंपकंपी और फिर ठिठुरन- यह सब सूरज की ओर पीठ फेरते ही महसूस होने लगता है। रात को घर जल्दी चले जाने का मन होता है। दोस्तियां नजरअंदाज होने लगती हैं। घर और घर का बंद कमरा सुहाने लगता है। समय से पहले ओढ़ कर पसर जाना और विभिन्न फरमाइशों के साथ खाना-पीना सर्दी के मौसम का अलहदा आकर्षण है, जिससे कोई बचना नहीं चाहता है। सोना जैसे सबसे बड़ा सुख और वरदान हो जाता है। जितना सुखकारी है सोना, उतना ही मुश्किलों से भरा है सुबह उठना। देर तक सोते रहना या जाग कर भी लिहाफ में पड़े रहना सुबह का सबसे बड़ा सुख!

लेकिन कल्पना कीजिए, समूचा जगत ऐसी मानसिकता से भरा है, आपके चारों ओर इसी तरह आलस्य की अराजकता छाई है और इसके विपरीत उसी समय आपके घर रोज की तरह अखबार फेंक कर जा रहा है हॉकर। हर घर में अखबार पटके जाने का समय सधा हुआ है। शायद ही कभी आगे-पीछे होता हो। चाहे सर्दी हो या गरमी या फिर बरसात, अखबार हर घर को या किसी आसक्त सदस्य को उठते ही चाहिए या उसकी आहट या आवाज, जिससे वह चेतन होता है। लोग जो सुबह जाग जाते हैं या बिस्तर पर जागे हुए आंखें मूंदे सोए रहने पर विश्वास करते हैं, उन्हें भी अखबार गिरने की फट्ट या फटाक की आदत लग चुकी होती है। अखबार अगर समय पर नहीं मिला तो मन खराब हो जाता है।
बरसात में अखबार का भीग जाना, फट जाना, कुत्तों द्वारा फाड़ दिया जाना, किन्हीं वजहों से कोई दूसरा अखबार आ जाना- ये सब ऐसी घटनाएं हैं जो मनुष्य की सुबह बिगाड़ने का बड़ा काम करती हैं। आंगन में अखबार फेंक दिया गया है या बाहर किवाड़ पर हॉकर फंसा कर चला गया है और घर के मुखिया को कोई सदस्य वह मुहैया करवाने में विलंब कर बैठा हो तो क्रोध आने से कोई रोक नहीं सकता- ‘अखबार कब का आया पड़ा है, कोई लाकर नहीं दे सकता है क्या’ की चीख घर भर को हिला कर रख देती है। शायद इसी तरह की चीख के बूते घर में उनकी सत्ता बनी रहती है!

अखबार बांटने वाले हॉकरों का दिन हर सुबह अंधेरे से पहले शुरू होता है। जितने बरसों की याद है, तब से जानता हूं कि घर-घर जाकर अखबार देने के लिए सबसे सहूलियत का वाहन साइकिल है। हो सकता है कि कुछ हॉकर समय के साथ हल्की मोटर साइकिल का इस्तेमाल करने लगे हैं, लेकिन ज्यादातर लोग अब भी साइकिल पर निर्भर हैं और उसी में बांध-कस कर अखबार बांटने निकलते हैं। सर्दी के मौसम में उनका हाल बस वही जान सकते हैं। अखबार बांटने का काम एक-डेढ़ घंटे में खत्म करना होता है। हॉकरों में गजब की फुर्ती देखने को मिलती है। घर से निकल कर सीधे अपने अखबार उठाने के ठिकाने पर जाना, अखबार की गिनती करना, जिस क्रम से घरों में जाएंगे, उस क्रम में तह लगाना, साइकिल या गाड़ी में उन्हें बांधना। इसके बाद जरा-सा वक्त निकल सका तो ठेले पर बन रही गरम चाय का लुत्फ लेना और बाकी साथियों से हाथ मिला कर साइकिल उठा कर चल पड़ना। इसके बाद सबसे मुलाकात अगले दिन ही। इस काम में कई बार बाधाएं और देर हो जाने की शिकायतें। स्वेटर, मफलर, जैकेट कसे सुबह-सुबह जिन हाथों से हम अखबार प्राप्त करते हैं, उन्हें सलाम है!

बचपन की याद आती है। हमारे मुहल्ले में करीम चाचा अखबार डालने आते थे। मुहल्ले के अनेक घरों में वही अखबार दिया करते थे। करीम चाचा कौतूहल से भरे करतबी आदमी थे। दो हाथ से साइकिल चलाते हुए जोर-जोर से मुहल्ले के बच्चों के नाम बुलाते हुए वे जैसे ही हमारी लाइन में आते, एक छोर से दूसरे छोर तक को पता चल जाता। आमतौर पर लोग बाहर निकल कर उनके हाथ से अखबार ले लेते थे, अन्यथा वे निशाना बांध कर बरामदे में फेंक देते थे। साइकिल चलाते हुए एक हाथ से बंधे तहों में से अखबार खींचना, उसे छाती से सटा कर गोल करना और ऐसा उछालना कि घर के भीतर ही गिरे। खास बात यह कि ऐसा करते हुए वे साइकिल रोकते भी नहीं थे। नंदन, चम्पक, पराग, लोटपोट, चंदामामा, धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, मनोरमा, सरिता आदि पत्रिकाओं से उनकी साइकिल का अगला हिस्सा सजा होता था। सफेद कुर्ता-पायजामा पहने करीम चाचा मानो हम बच्चों और मुहल्ले के ब्रांड एम्बेसेडर होते थे। अब ये सारे व्यावहारिक सरोकार देखने में नहीं आते, लेकिन हॉकरों का हौसला मुझे आज भी उनके प्रति आदर से भर देता है।

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