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दुनिया मेरे आगेः एक शहर के चेहरे

उस दिन एक ट्राम सामने से गुजरी, जिसमें सवारियां कम थीं। हम उसे संग्रहालय की किसी प्राचीन वस्तु की तरह निहार रहे थे, जिसका अस्तित्व मिटने के कगार पर है।
Author April 4, 2018 03:07 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

सुधीर विद्यार्थी

उस दिन एक ट्राम सामने से गुजरी, जिसमें सवारियां कम थीं। हम उसे संग्रहालय की किसी प्राचीन वस्तु की तरह निहार रहे थे, जिसका अस्तित्व मिटने के कगार पर है। शायद कुछ समय बाद कोलकाता की यह ट्राम सिर्फ हमारी स्मृृतियों में ही जीवित बचेगी। यहां भीड़ भरे दो स्थानों पर हाथ से खींचे जाने वाले रिक्शे भी सड़क पर दिखाई दिए, जिन्हें चलाने वाले नंगे पांव दौड़ रहे थे। कभी हो-ची-मिन्ह ने शोषण के प्रतीक ऐसे रिक्शा मजदूर का एक रेखांकन बनाया था जो हो-ची-मिन्ह संग्रहालय हनोई में सुरक्षित है। अब कोई स्त्री बंगाली साड़ी में नहीं दिखाई दे रही। पुरुष भी धोती-कुर्ता पहनना छोड़ चुके हैं। शहर अब अपनी निजता खोते जा रहे हैं। आज के दौर में स्थानीयता का लुप्त होना सांस्कृतिक संकट भी है। इस क्षति की भरपाई संभव नहीं। न्यू टाउन बस स्टॉप के छज्जे के भीतर पीछे की तरफ बोर्ड पर एक बड़े चित्र के साथ दोनों ओर बांग्ला कविताएं लिखी देख कर अच्छा लग रहा था। लगा कि सचमुच कोलकाता एक सांस्कृतिक शहर है। कविता के इस सम्मान की हम उत्तर भारत में कल्पना भी नहीं कर सकते। बांग्ला भाषा को छोड़ दें तो अब कोलकाता की सड़कों का परिदृश्य भी दूसरे शहरों से बहुत अलग नहीं है। तांत की साड़ियों का चलन खत्म होता लग रहा है। फिर भी ‘तांती-सांथी’ योजना के तहत तांत शिल्पियों के विकास और उनकी सामाजिक सुरक्षा के लिए सरकार यहां कुछ काम कर रही है।

यहां आकर मुझे मूड़ी खाने का बहुत मन होता है। अलका सरावगी के उपन्यास ‘कलिकथा: वाया बाइपास’ में बंगाल के एक लोकगीत की पंक्तियां याद आती हैं- ‘चिड़आ, मूड़ी, गुड़/ ओ बोन्धु, आइयो आमार बाड़ी/ तोमार लाइका भाइजा तोइरी/ आउस धानेर मूड़ी।’ यानी ओ बंधु, मेरे घर आ जाना। तुम्हारे लिए भूंज कर तैयार है आउस धान की मूड़ी।
सुन कर पीड़ा हो रही है कि यह राज्य छोटे बच्चों, खासकर लड़कियों की तस्करी के मामले में देश भर में आज सबसे आगे है। यह बहुत अफसोसनाक है। इधर ऐसी घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। खासकर राज्य के ग्रामीण इलाकों में लड़कियां और बच्चे बड़ी संख्या में गायब हो रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट बताती है कि बच्चों की तस्करी में यह राज्य शीर्ष पर है। अनेक मां-बाप लोकलाज के भय से इस तरह की शिकायत न लिखवा कर पहले निजी स्तर पर खोजबीन को कोशिश करते हैं और कुछ हाथ न आने पर निराश होकर बैठ जाते हैं।

चिंताजनक पहलू यह भी है कि महिला तस्कर कम उम्र की लड़कियों को अपने जाल में फंसा कर इस धंधे को चला रही हैं। सोनागाछी अब भी एशिया का सबसे बड़ा रेडलाइट इलाका है। नागार्जुन के उपन्यास ‘कुम्भीपाक’ में भी यह जगह चित्रित हुई है। कोलकाता की इस चर्चित जगह में अच्छी-खासी तादाद में प्रवासी मैथिली भाषी रहते हैं। ऐसे ही एक मकान में बाबा नागार्जुन साल भर से कुछ अधिक रहे और यहां उनका देह व्यापार में झोंक दी गई कई महिलाओं और दलालों से संपर्क हुआ। वक्त निकाल कर वे उनसे घुल-मिल कर बातें करते, उनकी आपबीती सुनते कि किस तरह बहला-फुसला कर दूरदराज के गांव-देहातों से लड़कियां लाकर देह व्यापार का धंधा चलाने वालों को बेच दी जाती थीं। एक मित्र ने बताया कि यह सब कुछ बाबा ने उन्हीं के जरिए जाना था जो इस धंधे में लिप्त थे। मैं रवींद्र सरणी के भीड़ भरे इलाके में तारा सुंदरी पार्क में नागार्जुन की सफेद आवक्ष प्रतिमा के सम्मुख था, जिसे मिथिला विकास परिषद ने 20 दिसंबर 2000 को स्थापित किया था।

उस दिन कोलकाता की सड़कों-चौराहों को जी भर कर देखा तो पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ का कहा बार-बार याद आता रहा- ‘बधिक होना जहां पुण्य, बकरा होना जहां पाप, माता काली के कलकत्ते को मैं सन 1920 के दिसंबर से जानता हूं।’ अज्ञेय ने भी इस महानगर को अपनी तरह से दर्ज किया है- ‘कलकत्ता: भारत का सबसे बड़ा शहर, क्रूर, नृशंस और सांस्कृतिक संवेदन का शहर, सुंदरता और कुरूपता का शहर, श्लील और अश्लील, सुगंध और सड़ांध, गहरी साधना और तत्त्व-चिंतन और त्याग का शहर, ढोंगियों, धर्मध्वजियों, कर्मकांडियों और कठमुल्लों का शहर, साहसिकों और क्रांतिकारियों का शहर, जान देने और खून पीने वाला शहर।’ अज्ञेय के पास कोलकाता के संस्मरणों की मानो एक मेले की भीड़ थी। उनके पास इस महानगर की एक अबूूझ पहेली-सी थी, जिसकी वे एक झांकी भर प्रस्तुत कर पाए। इसे लेकर ही उन्होंने एक कहानी लिखी थी ‘पुरुष का भाग्य।’ एक मित्र कहते हैं कि इसी महानगर से बाबा नागार्जुन रूढ़िग्रस्त परंपरा से दो-दो हाथ करने और अपने नाम ‘यात्री’ को सार्थक बनाने के लिए निकले थे। इसके लिए कितना कुछ करना पड़ा यह उनका साहित्य ही बताता है।

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