ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगेः बेलगाम बाजार

क्रिकेट एक खेल है और आइपीएल बाजार का उपक्रम। बाजार की नजर में मुनाफे के अलावा कुछ दूसरा न तो महत्त्वपूर्ण होता है और न वर्जित।

Author February 7, 2018 4:27 AM
मेरे छोटे शहर के एक परिवार में किसी मुद्दे को लेकर दो भाइयों में इतना मनमुटाव हुआ कि एक भाई ने न केवल दूसरे भाई पर, बल्कि पिता पर भी हाथ उठा दिया और घर छोड़ कर अलग हो गया।

अशोक गुप्ता

क्रिकेट एक खेल है और आइपीएल बाजार का उपक्रम। बाजार की नजर में मुनाफे के अलावा कुछ दूसरा न तो महत्त्वपूर्ण होता है और न वर्जित। संकट यहीं है। यों, खेल देखते समय नजर केवल गेंद और बल्ले की कलाबाजी पर रहती है या खिलाड़ियों की फुर्तीली फील्डिंग पर, लेकिन अभी इसके अलावा भी देखने में आया जो चिंता का विषय है। मैंने खिलाड़ियों की जर्सी पर ‘किंग फिशर’ का लोगो छपा देखा। किंगफिशर विजय माल्या का प्रकल्प है और देश-काल के संदर्भ में विजय माल्या की छवि सकारात्मक नहीं है। ऐसे में कमाऊ पाए जाने पर यह सौदा मंजूर कर लेना मुझे अनैतिक लग रहा है और यह इस बात का संकेत भी है कि बाजार पर देश की किसी व्यवस्था का अंकुश नहीं है।

मेरे छोटे शहर के एक परिवार में किसी मुद्दे को लेकर दो भाइयों में इतना मनमुटाव हुआ कि एक भाई ने न केवल दूसरे भाई पर, बल्कि पिता पर भी हाथ उठा दिया और घर छोड़ कर अलग हो गया। कुछ समय बाद उसी परिवार में बहन के विवाह का अवसर आया। उस आयोजन में घर से अलग हुआ भाई भी पहुंचा। कुछ हलचल तो हुई, लेकिन अनदेखी भी की गई। आगे जब उस भाई ने बहनोई की ओर शगुन का लिफाफा बढ़ाया तो दुल्हन बनी बैठी बहन ने ललकार कर शगुन लेने से इनकार कर दिया और वह लिफाफा स्वीकार नहीं किया गया। जाहिर है, वह एक पारिवारिक पर्व था और वहां बाजार की दखलंदाजी न होने के कारण यह अस्वीकृति संभव हो पाई। यहां आइपीएल के आयोजन को भी देश के एक पारिवारिक पर्व की तरह क्यों नहीं देखा जा सकता?

अगर बात हाथ से इतनी निकल चुकी है तो वह दिन दूर नहीं जब स्वाधीनता दिवस और गणतंत्र दिवस के राष्ट्रीय आयोजनों में भी बाजार अपनी मनमानी करता नजर आएगा। ऐसा नहीं है कि मैं बाजार के एकदम खिलाफ हूं, लेकिन मेरा मानना है कि किन्हीं विवेकजन्य तर्कों की मांग पर बाजार की लगाम थामी जाने की स्थिति संभव बनी रहनी चाहिए। आखिर मैच के बीच में ‘ब्रेक’ के दौरान भी तो किंगफिशर का विज्ञापन होता है, लेकिन मैच के मैदान में खिलाड़ियों की जर्सी के माध्यम से विजय माल्या को निरंतर नजर में बनाए रहने देना या तो राष्ट्रीय विवेक की चेतना पर सवाल उठाता है या हमारी राष्ट्रीय व्यवस्था बेबस है। ये दोनों ही स्थितियां चिंताजनक हैं।

इसी तरह एक और विज्ञापन नजर में आया। खिलाड़ियों की जर्सी पर ‘मैन फोर्स’ का भी छापा उसी गौरवशाली ढंग से ज्ञापित देखा गया। ‘मैन फोर्स’ यौन संबंध के प्रसंग में पुरुषों के लिए एक दैहिक उद््दीपन को बढ़ाने वाली औषधि है। इस तरह उस स्टेडियम में लगातार एक ऐसे उत्पाद का घोषनाद हो रहा था, जिसे नैतिक दृष्टि से ‘गोपन धर्म’ का निर्वाह करना चाहिए। मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि गोपनीयता का अर्थ वर्जना नहीं होता। स्त्री-पुरुष के बीच देह संबंध एक नैसर्गिक क्रिया है और मानव समाज का उद्भव इसी से है। लेकिन इसकी गोपनीयता की भी एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक अनिवार्यता है। मैं ऐसे कई दृष्टांत उजागर कर सकता हूं, जब पूर्ण वयस्क युवक सिगरेट पीते समय अगर अपने पिता के सामने पड़ जाता है तो वह अपनी सिगरेट छिपाने का उपक्रम करता है, जबकि उसके पिता भी धूम्रपान करते हैं और वे अपने बेटे की सिगरेट पीने की आदत से भी अवगत हैं।

यह दृष्टांत ऐसी परिस्थिति का उदाहरण है, जिसमें अगर नैतिकता का पालन न हो तो यह कोई बड़ी अनहोनी का आधार नहीं बनता। लेकिन देश-काल के ऐसे दौर में, जहां कोई भी नर मनुष्य किसी भी मादा के लिए यौन संदर्भ में समरूपता से आक्रामक है, बलात्कार की घटनाओं से जुड़ी पीड़िता की निर्मम हत्या के प्रसंग भी आम हैं, ‘मैन फोर्स’ जैसे उत्पादों का विज्ञापन कोई बहुत सुरक्षित परिवेश नहीं रचता, नैतिकता की बात तो जाने ही दीजिए। स्टेडियम की दर्शक दीर्घा में स्त्रियां और बालिकाएं भी होती हैं और विविध मानसिकता में पगे युवक और पुरुष भी। ‘चीयर गर्ल्स’ की भी अपनी स्वतंत्र भूमिका है। ऐसे में शराब और पौरुष उद््दीपन के बाजार का शंखनाद, समाज के समकालीन परिवेश के लिए घातक ही कहा जाएगा।

बाजार का संबंध अर्थव्यवस्था से है। साथ ही बाजार उपभोक्ता की जरूरत समझ कर उसकी आपूर्ति का उपक्रम रचता है। लेकिन अगर बाजार अपने उत्पाद को उपभोक्ताओं पर थोपता है, उन्हें सम्मोहित करके अपने उत्पाद थमाता है, उपभोक्ताओं के घर में घुस कर अपने उत्पाद रख आता है और इस तरह उनकी अर्थव्यवस्था को ध्वस्त करता है तो हस्तक्षेप की जरूरत पड़ती है। साथ ही हस्तक्षेप की जरूरत तब भी पड़ती है जब बाजार सत्ता और व्यवस्था को भी सम्मोहित करके, खरीद कर या बेबस करके अपना आसन बना लेने में कामयाब हो जाता है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App