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दुनिया मेरे आगेः जुबान में जादू

उन दिनों गांव में जेठ की दोपहरी किसी रात से कम नहीं होती थी। भरी दोपहर में जब लू के थपेड़े बाहर अपना आतंक फैला रहे होते थे तो गांव का किसान भरपेट भोजन करके दालान में गहरी नींद मार रहा होता था।
Author December 12, 2017 02:35 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

दीना नाथ मौर्य

उन दिनों गांव में जेठ की दोपहरी किसी रात से कम नहीं होती थी। भरी दोपहर में जब लू के थपेड़े बाहर अपना आतंक फैला रहे होते थे तो गांव का किसान भरपेट भोजन करके दालान में गहरी नींद मार रहा होता था। ताश और जुए के शौकीन लोगों की भीड़ इस दौरान आम और महुए के बगीचों में हुआ करती थी। ग्रामीण इलाकों में यह समय फेरी वालों के लिए सबसे मुफीद होता था। जादूगर और तमाशे वाले या हींग और मसाले वाले भी इसी समय घूमते थे। लोक की नब्ज को ये फेरी और तमाशे वाले बखूबी समझते थे। उनके वाद्ययंत्र और साथ की सामग्री, सब बता देती थी। भालू और बंदर वाले तो हर किसी की पहचान में आ जाते थे, पर कुछ करतबी ऐसे भी होते थे कि उनकी क्रियाएं ही उनके परिचय का स्रोत थीं। उनके लिए भाषा सिर्फ संप्रेषण का माध्यम नहीं होती थी, वह जीवन के अनुभवों का पिटारा होती थी।

भाषा और कर्म की एकता उनके कार्य में होती थी, जिसके जरिये वे अपने दर्शकों को एक अदृश्य दुनिया में ले जाते थे। एक ऐसी दुनिया, जहां जाकर हम भूल जाते थे कि वह सामने वाले को कबूतर बना रहा है या फिर सांप! वे कई तरह के करतब दिखाते थे। लेकिन इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण होती थी उनकी भाषा। कभी किसी अपने ही साथी का भरी भीड़ में ‘खून’ कर देना और फिर चादर के अंदर हाथ डाल कर खून से रंगा खंजर निकाल कर यह कहना कि ‘जल्दी-जल्दी कुछ जमा करिए नहीं तो मेरा साथी दम तोड़ देगा!’ फिर हम भागते हुए घर से पैसे लाते थे। इसके लिए हमने कितनी बार अपनी उन गुल्लकों को तोड़ दिया, जिन्हें घर में हम किसी को हाथ भी नहीं लगाने देते थे।

यह उनकी भाषा ही थी जो हमारे नन्हे दिलों को सयानेपन से भर देती थी। इस पूरी प्रक्रिया में वह कई अन्य काम भी करता था। मसलन, ताबीज और यंत्र बेचना, किसी का हाथ देखकर नसीब बांच देना आदि। उनका लहजा ऐसा होता था कि हम उनकी भाषा को ‘जादूगरी की भाषा’ कहते थे। डमरू की धुन और भाषा के लहजे से जिस तरह वे लोग ‘हिप्नोटिज्म’ यानी वशीभूत कर लेने की दुनिया रचते थे, अब जाकर समझ में आता है कि वह उनके लिए ‘पापी पेट का सवाल’ रही होगी। मगर हमारे लिए वह अनुभव और ज्ञान की एक नई दुनिया होती थी। इन श्रमजीवी लोगों की भाषा हमें आकर्षित करती थी, लेकिन घर में उन जैसा बोलने पर हमें इसलिए मना किया जाता था कि वे लोग एक ऐसी संस्कृति से आते हैं जो हमसे कथित रूप से कमतर होते हैं।

श्रम के साथ भाषा कैसे अपना आकार ग्रहण करती है और व्यवसाय की भाषा कैसे पनपती और जिंदा रहती है, अपने कई बदलावों के बावजूद यह हमने इन जादूगरों से सीखा। भाषा की लय और उसका मनोविज्ञान इतना सटीक होता था कि जब वे बात करते थे तो हमारी चेतना शून्य हो जाती थी। हम विचार करने की अपनी शक्ति को खो बैठते थे। फिर वे वक्ता होते थे और हमारी भूमिका एक श्रोता और दर्शक भर की रह जाती थी।

एक बार गांव में आए जादूगर ने खेल शुरू करने से पहले अपने झोले से एक मानव खोपड़ी निकाली और उसे चटाई के एक कोने पर रखा। खेल खत्म होने के बाद उसने खोपड़ी को अपने हाथ में लिया और बताया कि यह महाराजा रणजीत सिंह की खोपड़ी है। इस पर सभी लोग आंखें फाड़ कर उस खोपड़ी को देखने लगे। तभी अचानक पहुंचे एक सज्जन ने कहा कि ‘महाराजा रणजीत सिंह का सिर तो काफी बड़ा था!’ जादूगर जरा भी विचलित नहीं हुआ। उसने कहा- ‘हुजूर, यह उनके बचपन की खोपड़ी है, आपने जवानी की खोपड़ी देखी होगी!’ हम उसकी भाषा के जादू और मोहपाश में इतने खो गए थे कि यह खयाल भी नहीं आया कि बचपन और जवानी की खोपड़ी एक ही होती है।

इस तरह के कुछ ‘जादूगर’ किसी तरह के वाद्ययंत्र लेकर नहीं आते थे। वे किसी कंकड़ या खपरैल के दो टुकड़ों से मधुर ध्वनि निकालते थे और साथ में गीत भी गाते थे। इन धुनों की एक जुबान होती थी, जिसे हम सब समझते थे। यह लोक की धुन थी, जहां स्वर शब्दों का निर्माण करते थे। नए-नए शब्द और ध्वनियां हमारे शब्दकोश का हिस्सा बनती थीं। अब उन सब स्थितियों पर सोचता हूं तो लगता है कि आज भी वह किसी न किसी रूप में हमारे आसपास मौजूद है। किसान और मजदूर के जीवन में लोक की यह शक्ति हमेशा से विस्तार पाती रही है। इनके बीच श्रम के सौंदर्य का ऐसा आख्यान आज भी बनता है। लोक में जीवन का यह रूप नई भाषा को निरंतर गढ़ता रहता है। वह हमें सिर्फ शब्दों का भंडार नहीं देता है, बल्कि शब्द और भाषा को गढ़ने की शक्ति भी देता है।

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