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दुनिया मेरे आगेः नाम की पहचान

अपने नाम से मेरा असल वास्ता स्कूल में दाखिला लेने के बाद ही पड़ा। वरना उसका इस्तेमाल आमतौर पर मुझे पुकारने के लिए ही घर के या बाहर के लोग करते थे।
Author April 28, 2017 03:26 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

मीतू माथुर बधवार

अपने नाम से मेरा असल वास्ता स्कूल में दाखिला लेने के बाद ही पड़ा। वरना उसका इस्तेमाल आमतौर पर मुझे पुकारने के लिए ही घर के या बाहर के लोग करते थे। उस पर भी हर हिंदुस्तानी बच्चे की तरह मेरे भी लाड़-प्यार में पगे अनेक नाम थे। लेकिन अब घर की चारदिवारी से बाहर मेरा औपचारिक नाम मेरी पहचान बनने जा रहा था। मेरी क्लास में लड़कियों के नाम कुछ यों थे- नेहा, शिखा, दीपिका। वर्णों के लिहाज से व्यवस्थित और अर्थ के लिहाज से सार्थक लगने वाले इन नामों के बीच मुझे अपना नाम ‘मीतू’ कुछ अटपटा लगता था, क्योंकि सहपाठी अक्सर मुझे ‘नीतू’ कह कर पुकारने लगते थे। छुटपन में मैं इसे उनका कर्णदोष मानती रही, पर बड़ी हुई तो लगने लगा यह जरूर मेरे ही नाम का ध्वनिदोष है। अन्यथा इतने लोग भला सुनने में एक-सी गलती कैसे करते! मेरा नाम केवल अजीब नहीं, शायद अधूरा भी है। इसका अहसास मुझे तब हुआ जब कुछ शिक्षिकाएं मुझे ‘मीता’ बुलाने लगीं। गनीमत थी कि नाम छोटा था, इसलिए लोगों को पुकारने में ज्यादा समस्या नहीं आती थी। लेकिन असल समस्या तब आई जब एक दिन मैं एक बुद्धिजीवी से टकरा गई और उन्होंने मेरे नाम का अर्थ पूछ डाला। अपनी सीमित बुद्धि से मैंने इसे ‘मीत’ यानी ‘प्रेमी’ से जोड़ कर उनको तो जवाब दे दिया, लेकिन अपने नाम को लेकर मैं खुद ज्यादा बेचैन हो गई।

इधर भाषाओं में मेरी दिलचस्पी बढ़नी शुरू हो गई थी। कोई भी शब्द सुनती तो ध्यान पहले उसकी व्युत्पत्ति पर चला जाता। कोई भी नाम कान में पड़ता तो पहला विचार उसकी सार्थकता-निरर्थकता का आता। तब मैंने जाना कि हमारे समाज में ऐसे अनेक नाम बिखरे पड़े हैं जो पुकारे जाने पर अपनी अलग छटा बिखेरते हैं। जैसे, ‘मीनाक्षी’ नाम सुन कर मछली जैसे आकार की सुंदर आंखों वाली लड़की की छवि मन में उभरती है तो ‘विक्रम’ नाम मन में किसी पराक्रमी व्यक्ति का चित्र उकेरता है। यानी शब्द भी बिंब बनाते हैं। मैंने यह भी जाना कि किस प्रकार साहित्य में पात्रों के नाम उनके चरित्र के अनुरूप रखे जाते हैं। फिर चाहे वे देवकीनंदन खत्री के तिलस्मी उपन्यास ‘चंद्रकांता’ की अप्रतिम सुंदरी चंद्रकांता हो या घिसट-घिसट कर संसार का प्रथम अनुभव प्राप्त करने वाला महादेवी वर्मा का ‘घीसा।’ इस तरह नाम की संवेदनशीलता मेरे मन में गहरे समाती गई।

एक समय मैंने ठान लिया था कि अपना नाम बदल कर रहूंगी। आखिरकार मैंने एक साहित्यिक नाम चुन कर पिताजी के सामने अपनी बात रखी। लेकिन उन्होंने कानूनी पेचीदगियों का हवाला देकर उसे खारिज कर दिया। मेरी हर दलील खाली गई। जब रो-बिसूर कर भी कुछ नहीं हुआ तो मैंने नाम बदलने की जिद छोड़ दी। लेकिन अखबारों में दिखने वाले विज्ञापन ‘मैं फलां फलां एतद् द्वारा यह घोषणा करती हूं कि शादी के बाद मुझे फलां नाम से जाना और पुकारा जाएगा’ अब भी मेरी आखिरी आस बनी हुई थी। आखिर मेरी शादी एक ऐसे परिवार में तय हुई जहां शादी के बाद वधू का नाम बदले जाने की परंपरा थी। मन नए रिश्तों से जुड़ी आशाओं, आकांक्षाओं और आशंकाओं के बीच गोते खाने लगा। इस सबके बीच नाम का सवाल बहुत पीछे छूट गया था कि इसी बीच एक दिन पता चला कि ससुराल पक्ष में मेरे नए नाम के लिए विकल्पों पर विचार चल रहा है। मुझसे भी मेरी राय और पसंद पूछी गई।

मैंने हर नाम विकल्प से खुद को जोड़ कर देखा, लेकिन हर बार एक अजनबीपन का अहसास हुआ। लगने लगा जैसे कोई मेरी पहचान में सेंधमारी कर रहा है। मैं अपनी पहचान छोड़ कर किसी और की पहचान उधार ले रही हूं। अपना नाम भले ही मुझे कम पसंद हो, लेकिन यह मेरा अपना था जिसने जन्म से लेकर आज तक मुझे मेरे अस्तित्व का अहसास करवाया था। मुझे अब तक मिले प्रशस्ति-पत्र, ढेरों लेख जिन पर मेरा नाम छपा था, अचानक ही मेरी आंखों के आगे तैर गए। मैं कल्पना करने लगी कि अगर मेरे नए नाते-रिश्तेदार मुझे किसी और नाम से पुकारेंगे तो क्या मैं उनके प्रेम और स्नेह में वही ऊष्मा महसूस कर पाऊंगी जो आज तक करती आई हूं! मेरा नाम मेरे माता-पिता के प्यार की वह अनमोल सौगात थी जो उन्होंने मुझे जन्म के साथ दी थी और उनके दिए हर भौतिक उपहार से बढ़ कर आजीवन मेरे साथ रहने वाली थी। अचानक ही मैंने महसूस किया कि अपना अजीब-अधूरा नाम मुझे बहुत प्यारा लगा था। नाम बदलने की जद्दोजहद अब उसे बनाए रखने में तब्दील हो गई थी। यह भी अच्छा रहा कि मेरे निर्णय का पूरा सम्मान किया गया और मेरी खुशी को प्राथमिकता देते हुए कहा गया कि नाम में क्या रखा है! हालांकि मैं बहुत अच्छी तरह समझ चुकी थी कि ‘नाम में क्या रखा है!’

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