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दुनिया मेरे आगेः सिसखते दरख्त

हमारे गांव के पास महुआ के दो बड़े दरख्त थे। उम्र कोई दो सौ वर्ष। उन्हीं के बगल से गांव जाने का रास्ता गुजरता था।

Author March 14, 2018 02:49 am
हमारे देश में विकास ऐसा ही रोबोटिक है। न कोई संवेदना, न किसी रिश्ते की परवाह, न दर्द, न करुणा। विकास के आड़े जो भी आएगा, मारा जाएगा। जीडीपी और विकास दर बढ़ाने के लिए यही शर्त है, जिसके चलते हरे-भरे पुराने दरख्तों का विकास दर में तब तक कोई योगदान नहीं, जब तक उन्हें काट कर आरा मिल न भेज दिया जाए।

हमारे गांव के पास महुआ के दो बड़े दरख्त थे। उम्र कोई दो सौ वर्ष। उन्हीं के बगल से गांव जाने का रास्ता गुजरता था। पहले ढर्रा था, फिर मुरम वाली सड़क से पक्की डामर सड़क होते हुए तरक्की ऐसी हुई कि अब शानदार दो लेन वाली कंक्रीट की सड़क मेरे गांव से गुजरते हुए आगे जाकर इलाहाबाद और बनारस जाने वाले राष्ट्रीय राज मार्ग से मिल जाती है। पर इस तरक्की में दो सौ सालों से आंधी, तूफान, अकाल, सुकाल झेलते तने रहने वाले ये पुरखे-से वृक्ष शहीद कर दिए गए। हम लोग जब जबलपुर से रीवा अपने गांव जाते थे तो अम्मा की सख्त हिदायत रहती थी कि जब वहां पहुंचें तो रुक कर महुए के उन दोनों पेड़ों को प्रणाम कर लिया करें। उनमें ग्राम देवता निवास करते हैं जो हमारे गांव की रक्षा करते हैं। शादी-ब्याह या संतान होने के बाद गांव में प्रवेश के पहले इनकी पूजा होती थी। मैं बचपन से ही इन पेड़ों को बुजुर्ग से भाव से देखता था। इन हरे-भरे पेड़ों के फड़फड़ाते पत्ते गांव का कुशल-मंगल प्रवेश करते ही बता देते थे। लेकिन ये सरकार की अधोसंरचना विकास के आड़े आ गए और बिना गवाह, बिना सुनवाई के ‘कत्ल’ कर दिए गए! यही हश्र गांव में घुसते ही तालाब के किनारे खड़े उस पीपल का भी हुआ। कोई दो-ढाई सौ साल का इतिहास अपने में जज्ब किए पीपल को वहीं आरे से काट कर ‘मृत्युदंड’ दे दिया गया। हाथ-पांव आरियों से काट कर अलग कर दिए गए। जब गांव जाता हूं तो कुल्हाड़ी की खटाक और आरा मशीन की खरखराहट अवचेतन मन में गूंजती है।

हमारे देश में विकास ऐसा ही रोबोटिक है। न कोई संवेदना, न किसी रिश्ते की परवाह, न दर्द, न करुणा। विकास के आड़े जो भी आएगा, मारा जाएगा। जीडीपी और विकास दर बढ़ाने के लिए यही शर्त है, जिसके चलते हरे-भरे पुराने दरख्तों का विकास दर में तब तक कोई योगदान नहीं, जब तक उन्हें काट कर आरा मिल न भेज दिया जाए। हरहराती नदियों का बांधा जाना और गांव के गांव को डुबो देना विकास दर के लिए अनिवार्य है। सीधी खड़ी पहाड़ियों को जब तक सड़कों में न बदल दिया जाए, तब तक ये निरर्थक है। विकास का यह नए जमाने का फलसफा है। यही समूचे देश में चौतरफा चल रहा है। एक मित्र ने संदेश के साथ फोटो भेजी कि भोपाल के हवाई अड्डा रोड के सुंदर हरे-भरे दरख्तों को काटने की तैयारी की जा रही है। जो बन पड़े इसके लिए, कुछ करिए। हम-आप क्या कर सकते हैं। अब अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बनाना है तो इन बेचारे वृक्षों को अपनी जान देनी ही पड़ेगी! जीडीपी और विकास दर का मामला है।

हालांकि बड़े जीडीपी और भारी विकास दर वाले यूरोपीय देशों के बारे में सुना है कि कोई पेड़ सड़क के आड़े आ जाए तो इंजीनियर उसका नक्शा बदल देते हैं, क्योंकि वे खुद भी संवेदनशील होते हैं और इसके लिए जनता भी सड़क पर आ जाती है। अगर पेड़ या कोई प्राकृतिक संरचना हटाना जरूरी हुआ भी तो काटने की बजाय उनकी ‘लिफ्टिंग’ की जाती है, यानी एक जगह से दूसरी जगह पर लगा दिया जाता है। हमारे यहां तो सड़क की योजना बाद में बनती है, कुल्हाड़ी पहले चलनी शुरू हो जाती है। ताक में बैठे रहते हैं टाल, पल्प, पेपर, प्लाई उद्योग वाले।

हमारे रीवा जिले से पांच राष्ट्रीय राज मार्ग गुजरते हैं। सभी का विस्तारीकरण हो रहा है। चारों तरफ दरख्तों का कत्लेआम हो रहा है। दो या तीन सौ साल तक के आम, इमली, जामुन, पीपल, नीम के पेड़ लाखों की संख्या में काट डाले गए। जो बचे हैं, काट डाले जाएंगे। इन बेजुबानों की कौन सुने! ये वोट नहीं हैं! कंठी-माला लेकर धर्म का जाप करने और संस्कृति बचाने वाले कहां गए? रीवा से देश का सबसे पुराना राष्ट्रीय राजमार्ग गुजरता है। कहते हैं इसे शेरशाह सूरी ने उत्तर और दक्षिण को जोड़ने के लिए बनवाया था। पहले इसे ही ग्रांड ट्रंक रोड कहा जाता था। अब यह कश्मीर को कन्याकुमारी से जोड़ता है। अंगे्रजों के जमाने में तैयार किए गए रीवा स्टेट गजेटियर में एक ब्रिटिश यात्री लेकी की डायरी का जिक्र है। सत्रहवीं सदी के उत्तरार्ध में रीवा के राजा अजीत सिंह के समय मिस्टर लेकी ने इस राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे घने फलदार वृक्षों और निश्चित दूरी पर कुओं और बावड़ियों का खूबसूरती से ब्योरा दिया है। बनारस और इलाहाबाद से आने वाले साहित्यकारों ने सड़क के किनारे के आम्रकुंजों का अपनी रचनाओं में वर्णन किया है। ये सब काट डाले गए कोई डेढ़-दो सौ वर्ष पुराने वृक्ष लाखों की संख्या में। इन्हें बचाया जा सकता था। लेकिन इसके बारे में कौन सोचता, जिसकी आंखों का पानी बचा हो। विकास की हवस ने आंखों का पानी सोख कर संवेदनाओं को मरुभूमि में बदल दिया है। कौन याचना सुने, कौन इंसाफ करे!

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