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दुनिया मेरे आगेः फूलों की सुगंध

फूल नेताओं के गले में माला की तरह भी हैं। घरों की साज-सज्जा में हैं। समारोहों-उत्सवों में भी उनकी अनिवार्यता महसूस की जाती है।

Author December 14, 2017 03:40 am

फूल नेताओं के गले में माला की तरह भी हैं। घरों की साज-सज्जा में हैं। समारोहों-उत्सवों में भी उनकी अनिवार्यता महसूस की जाती है। वे रोजमर्रा के जीवन, स्कूलों-कॉलेजों के परिसर, उद्यानों, गमलों और फुलवारियों में हैं फूल। फिर भी ऐसा क्यों महसूस होता है कि उनकी ‘सुगंध’ हमारे बीच उतनी नहीं है, जितनी होनी चाहिए! वह कोमलता कम ही है, जो फूल शब्द का उच्चारण करते ही हम तक चली आनी चाहिए। वह चर्चा भी कम है जो हम पहले सुना करते थे कि किस फूल के गुण क्या हैं, वह कब खिलता है, किस ऋतु में, उसमें सुगंध होती है या नहीं, उसके औषधीय गुण क्या हैं, वह किस-किस काम में आता है वगैरह। फूलों से रंग बनाए जाते थे। उनकी पंखुड़ियों को खाद्य पदार्थों के ऊपर भी सजाया जाता था। प्रतीक के रूप में भी उनका खूब इस्तेमाल होता था। वह कविता का विषय बनते थे। उनमें जीवन के अलग-अलग प्रसंग दर्ज किए जाते थे। माखनलाल चतुर्वेदी की कविता ‘चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊं’ और निराला की ‘जूही की कली’ की याद सहज ही हो आती है। दो-तीन दशक पहले तक फूल कविता की दुनिया में कभी सीधे ही, कभी सेंध लगा कर प्रवेश कर जाते थे। पर अब उतना नहीं दिखते।

फूलों को सुबह भोर में ही चुनने की एक परंपरा रही है। इस काम के लिए बड़ी सुंदर डोलनियां-टोकरियां भी बना करती थीं, काठ, धातु या बांस की। उनमें हरसिंगार के फूल विशेष रूप से चुने जाते थे। झर-झर झरने वाले हरसिंगार के। यह उन्हीं का मौसम है। पर अब कहां दिखते हैं पहले जितने हरसिंगार के फूल। उनके लिए वैसी ललक भी कहां दिखती है! इन दिनों दिल्ली सहित एनसीआर की बात करूं तो चंपा और सप्तपर्णी के पेड़ खूब हैं। वे खिलते और सुगंध भी फैलाते हैं, पर उनको लेकर किसी चर्चा का उत्साह नहीं दिखता। वे हैं, बस। जैसे कि बहुमंजिली इमारतों की गाड़ियां, अन्य साज-सामान, पर वे फूल हैं और किसी विशिष्टता की मांग कर रहे हैं, यह नहीं दिखता। गाड़ियों, उनकी बनावट और उनके रंगों की ओर बहुतों का ध्यान जाता है। अगर फूलों की ओर ध्यान जाता, मन में फूल बसे होते, तो ‘रोड रेज’ यानी सड़क पर झगड़े और हिंसा की घटनाएं शायद इतनी न होती। छोटी बच्चियों तक के यौन-शोषण या बलात्कार की खबरें आती हैं। मामूली बहसें और झड़पें किसी की हत्या तक में बदल जाती हैं।

ऐसे में ही लगता है कि वे फूल वाले मानस कहां हैं अब जो रसखान की कविता में वर्णित हुए थे- ‘जो खग हों तो बसेरो करौं मिलि कालिंदी-कूल कदम्ब की डारन।’ नागार्जुन ने भी लिखी थी कविता- ‘फूले कदम्ब।’ नई पीढ़ियां अब कहां जानती हैं कदम्ब या बेला, जूही, चमेली, मोतिया को भी। कितने हैं नई पीढ़ियों में जो पहचान लेंगे फूलों को उनके नामों से? कितने हैं जिन्होंने देखे हैं कमल ताल, देखी हैं कोंकाबेली? कितना जुड़े रहे हैं फूलों के साथ पाखी, मधुमाखी, तितलियां और भौंरे भी? इनकी गुंजार के बीच ही तो खिलते रहे हैं फूल।
उपहार या बधाई में दिए जाने वाले गुलदस्ते हैं। फिर भी क्यों लगता है कि फूलों में वह बात नहीं है, जो होती थी! क्यों असली फूलों को भी बहुतों ने मानो वही दर्जा दे रखा है, जो प्लास्टिक और कागज के फूलों का है! जो भी हो, फूल जीवन से जाने वाले नहीं हैं। हां, अब राजनीतिक दुनिया में वैसे लोग कम ही दिखते हैं कि वे जब बोलें तो लगे कि उनके मुंह से शब्द, फूलों की-सी कोमलता के साथ झर रहे हैं। सामाजिक जीवन में भी बोली-बानी की वह मिठास काफी कुछ गायब हुई है।

संबंधों में भी ‘सुगंध’ कम होने की शिकायत करते हुए बहुतेरे मिलेंगे। मह-मह महकते फूल जो तन-मन को आप्लावित करते थे और छा जाते थे इस तरह कि किसी ऐश्वर्य पर भी वे भारी पड़ते थे, वे अपने पुराने दिनों को जरूर तरसते होंगे, क्योंकि फूलों के हार की जगह हमने रुपयों की माला को जगह बनाते देखा है और पुष्पवर्षा की जगह धन-वर्षा देखी है। ‘पंचवटी’ में मैथिली शरण जी ने लिखा था ‘क्या ही स्वच्छ चांदनी है यह/ है क्या ही निस्तब्ध निशा’! पर अब बहुतेरी दिशाएं, आनंद नहीं, आशंकाओं से भरी हुई है और सब खैर मनाते रहते हैं कि शाम तक सब सकुशल घर लौटें। हां, राहें फूलों से नहीं, कांटों से भरी हुई अधिक लगती हैं। ऐसे में क्यों न आए सुधि फूलों की! जब भी देखता हूं फूल, मैं उनकी ओर खिंचा चला जाता हूं। जब भी पढ़ता हूं कविता और कथा में कोई फूल प्रसंग, मेरा मन भी सरसता है। भर जाता है थोड़ी देर के लिए उछाह से! लगता है, ‘फूल खिला तो दिन खिला।’ कामना करने लगता हूं फूलों के और अधिक फूलने-खिलने की। गुहार-सी लगाता हूं मन ही मन, ‘लौट आओ फूलों, हमारे जीवन में और अधिक सुगंध के साथ लौट आओ!’ यह सब लिख कर वही कामना, वही आकांक्षा तो कर रहा हूं!

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