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दुनिया मेरे आगेः नेपथ्य पर पर्दा

उच्च शिक्षा में अध्ययन-अध्यापन को लगभग दस साल होने को आए। अपना अनुभव यही कहता है कि भारत में आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के केंद्र के रूप में कॉलेज-विश्वविद्यालय की स्थापना का कुछ श्रेय अंग्रेजों को जाता है।

Author January 9, 2018 02:18 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

बृजराज सिंह

उच्च शिक्षा में अध्ययन-अध्यापन को लगभग दस साल होने को आए। अपना अनुभव यही कहता है कि भारत में आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के केंद्र के रूप में कॉलेज-विश्वविद्यालय की स्थापना का कुछ श्रेय अंग्रेजों को जाता है। कुछ भारतीय युगद्रष्टा महापुरुषों ने भी इसमें योगदान दिया, लेकिन ज्यादातर जनता ने इसे बहुत गंभीरता से नहीं लिया। अंग्रेजों ने इन केंद्रों की स्थापना अपने फायदे के लिहाज से की थी, न कि उनकी मंशा भारतीय लोगों को शिक्षित करने की थी। वे अपने शासन-प्रशासन में पढ़े-लिखे लोगों की मदद लेना चाहते थे। वे भारतीयों की एक ऐसी जमात तैयार करना चाहते थे जो नकली आधुनिकता और औपनिवेशिकता के भ्रम जाल में फंस कर अंग्रेज सरकार और उसके कामकाज के तरीकों का बचाव कर सके।

लेकिन इन स्कूलों और कॉलेजों से निकले लोग अंग्रेजों के काम तो नहीं ही आए, बल्कि उन्हें सत्ता से बेदखल करने में उनका योगदान जरूर रहा। नवशिक्षित युवाओं ने भारत में अंग्रेजी राज की दमनकारी और शोषण आधारित सत्ता के खिलाफ भारतीय लोगों में स्वातंत्र्य चेतना और समाजवाद के प्रति रुझान पैदा करने का काम किया। तभी से सत्ता ने यह जान लिया कि पढ़ा-लिखा व्यक्ति उसके लिए फायदेमंद नहीं हो सकता। वह सत्ता चाहे देशी हो या विदेशी, अपनी हो या विरोधी।

हालांकि लोकतंत्र और स्वाधीनता का भ्रम बना रहे और लोगों का विश्वास न टूटे, इसलिए सरकारें जनता को यह भरोसा दिलाती रहती हैं कि उन्हें लोगों के पढ़ने-लिखने की बड़ी चिंता रहती है। इसीलिए एक निश्चित अंतराल पर कहीं कोई कॉलेज या विश्वविद्यालय खोल दिया जाता है। नहीं तो किसी कॉलेज में कोई नया विभाग खोल दिया जाएगा, कोई नई इमारत दे दी जाएगी। अलीगढ़ और बनारस विश्वविद्यालय को उनके शताब्दी वर्ष के लिए अलग से सौ-सौ करोड़ रुपए का अनुदान दे दिया गया। और कुछ नहीं, तो किसी कार्यक्रम के उद्घाटन या दीक्षांत समारोहों के मुख्य अतिथि बन कर सरकार का कोई प्रतिनिधि चला जाएगा और लोक-लुभावन भाषण दे आएगा।

यह इसलिए जरूरी होता है कि इससे लोगों का भ्रम नहीं टूटता। लोगों को लगता रहता है कि कुछ हो रहा है। जबकि यह सिर्फ एक बहुत उम्दा नाटक मात्र होता है। इस नाटक के कुछ अंक पूरे हो चुके हैं, लेकिन दर्शकों को यह पता ही नहीं चल पाया। वे महज ताली बजाते रहे। ऐसा लगता है कि सत्ता ने प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था को खत्म करने का अपना मिशन पूरा कर लिया है। इस नाटक को ‘शिक्षा का अधिकार’ या ‘मिड दे मील’ जैसे जुमलों से ताजा और सुरक्षित रखने का प्रयास किया जाता है। यह सब भी उस विशाल नाटक का हिस्सा है। अब शायद अगला निशाना उच्च शिक्षा के केंद्रों को नष्ट कर देना है। आज की सत्ता विदेशी शासकों की तरह बेवकूफ नहीं है जो नालंदा और तक्षशिला पर सैनिक आक्रमण करेगी। उसे घुन की तरह खोखला कर देने की कोशिश है। इसीलिए जड़ में कई दिनों का सड़ा मट्ठा चोरी-छिपे डालते रहते हैं। नरेश सक्सेना की एक कविता है- ‘दीमकें पढ़ना नहीं जानतीं, लेकिन चाट जातीं हैं पूरी किताब।’ सत्तानशीं इन केंद्रों को चाट जाएंगे।

उच्च शिक्षा के केंद्रों को भी बर्बाद करने में सत्ता ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के खाली पदों का आंकड़ा पूरी कहानी बयान करता है। बड़ी दादाद में शिक्षकों के खाली पद इसके पीछे छिपी मंशा को जग जाहिर कर देते हैं। शिक्षा के बजट में दो तिहाई तक की कटौती इसी योजना का हिस्सा है। एक खास अंतराल पर आप भरपूर विज्ञापन देखेंगे, ताकि आपको लगता रहे कि काम चल रहा है। कॉलेज और विश्वविद्यालय भ्रष्टाचार के प्रशिक्षण केंद्र की तरह काम कर रहे हैं। फिर भी नाटक निर्बाध रूप से चल रहा है। पठन-पाठन ठप है। जो हैं वे बर्बाद हैं, लेकिन बीस विश्वस्तरीय विश्वविद्यालयों का स्वप्न लोगों की आंखों में जबर्दस्ती ठूंस दिया गया, ताकि नाटक की ताजगी बनी रहे। दृश्य बदलते रहेंगे तो दर्शक ऊबेगा नहीं। ताली बजाता रहेगा। इससे जुड़े महकमे और संस्थाएं उस नाटक में अपना-अपना योगदान दे रही हैं। कोई मंच व्यवस्था देखता है तो कोई वस्त्र विन्यास।

कोई संवाद लिखता है तो कोई पात्रों की भर्ती का काम देखता है। यह सब मिल कर सिर्फ एक नाटक की तरह चल रहा है, जिसमें हमारे पास ताली बजाने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है। यह मत जानिए कि देश बहुत बड़ा है तो व्यवस्था ऐसी ही चलती रहेगी या फिर अभी लोकतंत्र नया है तो सब ठीक होने में समय लगेगा। बल्कि यह समझने की जरूरत है कि यह सब एक सोची-समझी नीति का हिस्सा है। सत्ता ने तय कर रखा है कि चाहे जो हो जाए, नाटक नहीं रुकना चाहिए।

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