Opinion about discrimination between girls & boys In Education - Jansatta
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दुनिया मेरे आगेः बदलाव के वरक्स

प्राथमिक शिक्षा से जुड़े एक सर्वेक्षण के दौरान मुझे राजस्थान के टोंक जिले के एक राजकीय विद्यालय में पांचवीं कक्षा के बच्चों से बातचीत का मौका मिला।

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्राथमिक शिक्षा से जुड़े एक सर्वेक्षण के दौरान मुझे राजस्थान के टोंक जिले के एक राजकीय विद्यालय में पांचवीं कक्षा के बच्चों से बातचीत का मौका मिला। यह देख कर खुशी हुई कि कक्षा में पढ़ने वाले कुल तैंतीस विद्यार्थियों में अट्ठाईस लड़कियां हैं और स्कूल में पढ़ने वाले कुल एक सौ इकसठ विद्यार्थियों में से एक सौ तीन लड़कियां हैं। उस समय मैंने सोचा कि गांव के लोग शिक्षा के प्रति जागरूक हैं, इसलिए सभी लोग लड़कियों को पढ़ा रहे हैं।

कक्षा में पहुंचने पर मैं असमंजस में पड़ गया कि बच्चों से बातचीत की शुरुआत कहां से करूं- पाठ्यपुस्तक से या किसी और विषय से! आखिर मैंने पहल की और सभी बच्चों से उनका नाम और उनके मनपसंद विषय के बारे में पूछा। सभी बच्चे उत्साह के साथ अपना नाम और पसंद का विषय बताने लगे। जैसे ‘मेरा नाम सुनीता है और मुझे हिंदी विषय पढ़ना अच्छा लगता है, आदि। लेकिन परिचय के दौरान दो छात्राओं का नाम सुन कर मैं सोचने पर मजबूर हो गया। उनके नाम थे ‘फालतू’ और ‘अंतिमा’। जब मैंने छात्राओं से उनके नाम का मतलब पूछा तो मेरा प्रश्न सुनते ही उनका सारा उत्साह एकदम खत्म हो गया और वे शांत होकर इधर-उधर देखने लगीं और कक्षा के अन्य बच्चे जोर-जोर से हंसने लगे। मैंने स्थिति को भांपते हुए अपना प्रश्न बदला और बच्चों से उनके मनपसंद विषय पर बातचीत की।

कक्षा के बाद मैंने विद्यालय में पढ़ाने वाले शिक्षकों से इन लड़कियों के नामों को लेकर चर्चा की। शिक्षकों ने बताया कि जिन परिवारों में लड़कियां अधिक जन्म लेती हैं, लेकिन परिवार के लोगों को लड़के की कामना होती है तो उन परिवारों में माता-पिता इस प्रकार के नाम रख देते हैं। उनकी धारणा यह होती है कि ऐसा नाम रखने से जन्म लेने वाली अगली संतान लड़का पैदा होगी। सर्वेक्षण के दौरान मुझे दस विद्यालयों में जाने का मौका मिला। इन विद्यालयों में मुझे अपने परिवार द्वारा अनपेक्षित लड़कियों के इस प्रकार के नाम सुनने को मिले जैसे ‘फालतू’, ‘अंतिमा’, ‘आचुकी’, ‘रामभतेरी’, ‘रामघणी’ और ‘इतिश्री’ आदि। इनका मतलब होता है- ‘यह अंतिम है, लड़की आ चुकी है, राम लड़कियां बहुत हो चुकी है और यह आखिरी है’।

जब मैंने शिक्षकों से विद्यालय में लड़कों के मुकाबले लड़कियों के अधिक नामांकन के बारे में पूछा तब शिक्षकों ने मुझे बताया कि अधिकतर माता-पिता लड़कों को निजी विद्यालयों में और लड़कियों को राजकीय विद्यालयों में पढ़ने के लिए भेजते हैं। शिक्षक ने पड़ोस के एक निजी विद्यालय का उदाहरण दिया। उस निजी विद्यालय में पढ़ने वाले कुल तीन सौ पचास विद्यार्थियों में लड़कियों की कुल संख्या तिहत्तर है। सर्वेक्षण के दौरान मैंने भी देखा कि राजकीय विद्यालयों में प्राथमिक स्तर पर लड़कों की अपेक्षा लड़कियों का नामांकन अधिक है, जबकि आसपास के निजी विद्यालयों में लड़कियों की अपेक्षा लड़कों का नामांकन ज्यादा है।

दरअसल, वर्तमान समय में बच्चे की शिक्षा में खर्च होने वाले रुपए को निवेश के तौर पर देखा जाता है। इसलिए सभी लोग सुरक्षित निवेश करना चाहते हैं। समाज में आम धारणा प्रचलित है कि लड़का हमेशा माता-पिता के साथ रहता है और लड़की पराये घर की अमानत होती है। इसलिए लड़के को लड़की के मुकाबले अधिक तवज्जो दी जाती है। हालांकि शिक्षित और आर्थिक रूप से मजबूत परिवारों में लड़की को भी लड़के के बराबर पढ़ने के मौके दिए जाते हैं। लेकिन उन परिवारों में भी उच्च शिक्षा में लड़कियों को लड़कों के मुकाबले कम अवसर दिए जाते हैं।

समाज में लड़कियों को लेकर कई प्रकार की धारणाएं प्रचलित हैं, जैसे लड़कियां पराये घर की अमानत होती हैं, लड़कियों को पढ़-लिख कर नौकरी नहीं करनी है, लड़कियों को सभी घरेलू काम आने चाहिए और लड़कियां परिवार की इज्जत होती हैं आदि। इस प्रकार की धारणाओं के चलते अनेक लड़कियां शिक्षा हासिल करने से वंचित रह जाती हैं, क्योंकि घर-परिवार में लड़कियों से अधिक कार्य करवाए जाते हैं और उनकी जल्दी शादी कर दी जाती है। इसका प्रभाव लड़कियों की शिक्षा पर पड़ता है। ग्रामीण भारत के इलाकों में अक्सर देखने को मिलता है कि घरेलू कार्यों और खेतीबाड़ी की वजह से लड़कियों को उनके माता-पिता विद्यालय जाने से रोक लेते हैं। इसकी वजह से उनके सीखने का स्तर प्रभावित होता है। अधिकतर लड़कियां प्राथमिक स्तर के बाद स्कूल छोड़ देती हैं। पूरे भारत में लड़कियों के स्कूल छोड़ने की दर लड़कों की अपेक्षा अधिक है।

यह सच है कि शिक्षा के प्रचार-प्रसार के साथ लोगों में लड़कियों की शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ी है, लेकिन लोगों की सोच में लड़कियों के प्रति बहुत ज्यादा बदलाव नहीं दिखाई देता है। इस स्थिति का समाधान समाज की मानसिकता में व्यापक सकारात्मक बदलाव लाने पर ही संभव है। इसलिए ग्रामीण भारत के इलाकों में स्कूली स्तर पर समुदाय के साथ मिल कर अधिक प्रयास करने की जरूरत है, ताकि लोगों में लड़कियों और उनकी शिक्षा के प्रति जागरूकता फैल सके।

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