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दुनिया मर आगेः पूर्वग्रह की परतें

बचपन में जो बातें दृश्य और सोच में बैठ जाती हैं या बैठा दी जाती हैं वे आजीवन दिमाग से नहीं निकलतीं या फिर बहुत मुश्किल से निकलती हैं।

Author February 22, 2018 4:25 AM
बचपन से मैंने देखा है कि किन्नर समुदाय को किस तरह लोग हेय दृष्टि से देखते आ रहे हैं। उन्हें ऊपरी तौर पर सम्मान देने के लिए हम किन्नर या थर्ड जेंडर का नाम तो दे देते हैं, लेकिन नाम बदलने से सोच में बदलाव आ जाए, जरूरी नहीं हैं।

चांद खां रहमानी

बचपन में जो बातें दृश्य और सोच में बैठ जाती हैं या बैठा दी जाती हैं वे आजीवन दिमाग से नहीं निकलतीं या फिर बहुत मुश्किल से निकलती हैं। ये बातें हमें अपने घर के संस्कारों से मिलती हैं या हम अपने आसपास जो देखते हैं उससे सीखते हैं या फिर इस मामले में सामाजिक परिवेश हमारा गुरु बनता है। तीन बातें मेरे दिमाग में आज तक मौजूद हैं। एक किन्नरों के बारे में, दूसरी दलितों और तीसरी अपने एक शिक्षक के बारे में।

खैर, आठवीं कक्षा में हमारे अंग्रेजी के शिक्षक थे। वे शिक्षक क्या, विद्यार्थियों के बीच चलता-फिरता खौफ थे। बेंत से नीचे वे शायद ही कभी बात करते थे। कक्षा में उनके घुसते ही सन्नाटा छा जाता था। जिससे उन्होंने अंग्रेजी का कोई शब्द पूछ लिया और उसका सही उत्तर नहीं मिला तो बेंत से पिटाई तय थी। तब शिक्षक के हाथों किसी छात्र की पिटाई पर मां-पिता कुछ नहीं कहते थे। कक्षा में एक दिन उन्होंने मुझसे कहा- ‘आओ और ‘कंट्री’ शब्द की स्पेलिंग ब्लैक बोर्ड पर लिखो।’ मैं डर के मारे पत्ते की तरह कांपते हाथ से स्पेलिंग लिखने लगा तो वे बोले- ‘कंट्री लिख रहे हो या भारत का नक्शा बना रहे हो?’ मैंने कंट्री की स्पेलिंग किसी तरह लिख दी। डंडे का खौफ आज भी याद है और सोचता हूं कि बच्चों को शिक्षित करने में डंडा आज सहायक है या बाधक!

दूसरी घटना के तहत मुझे याद है कि हमारे गांव में पहले दलित तबके को लेकर कई तरह के पूर्वग्रह थे, जो आमतौर पर अमानवीय थे। तब अगर इससे संबंधित जाति की पृष्ठभूमि वाला कोई व्यक्ति हमारे घर में काम करने आता था तो उसके जाने के बाद हमारी मां पानी के छींटे मार कर घर को ‘पवित्र’ करती थीं। बल्कि कुछ घरों में तो लोग खुद को ‘पवित्र’ करने के लिए नहाना जरूरी मानते थे। तब मैं अगर घर को ‘पवित्र’ करने की वजह पूछता था, तो मां कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पाती थी। जब मैं कहता कि अम्मा हमारा ‘नाड़’ भी तो उन्होंने ही काटा है तो क्या हम भी वही नहीं हुए, तो इस पर मां बात को टाल देतीं। इस तरह की अमानवीयता बने रहने की वजह भी यही है कि हम सबसे जरूरी सवालों से लड़ने के बजाय उन्हें टाल देते हैं। जब दिल्ली जैसे शहर में भी कई बार ऐसा ही देखता हूं तो तब मां से किया सवाल जेहन में घूमने लगता है। सोचने लगता हूं कि आज इक्कीसवीं सदी का सफर तय करते हुए भी हम कितने मनुष्य हो सके हैं!

इसके अलावा, बचपन से मैंने देखा है कि किन्नर समुदाय को किस तरह लोग हेय दृष्टि से देखते आ रहे हैं। उन्हें ऊपरी तौर पर सम्मान देने के लिए हम किन्नर या थर्ड जेंडर का नाम तो दे देते हैं, लेकिन नाम बदलने से सोच में बदलाव आ जाए, जरूरी नहीं हैं। आज भी उनकी उपेक्षा का आलम यह है कि लोग उनसे मिलते हुए कतराते हैं। उनके बारे में तरह-तरह की धारणाएं आज तक बनी हुई हैं, जिनका कोई आधार नहीं होता, लेकिन वे उनके प्रति हमारे उपेक्षित व्यवहार और सोच को निर्धारित करती हैं। कुछ महीने पहले हमारी गली में एक मकान बिका, जिसे किन्नर समुदाय के एक व्यक्ति ने खरीदा। लेकिन इससे पहले ही पूरी गली में इसे लेकर आपत्तियां जताई जाने लगीं। लोग एक दूसरे से चुटकी लेकर कई तरह की खिल्ली उड़ाने वाली बातें कहते। कोई उनके गली में आकर रहने को अशुभ बताता तो कोई कुछ और दुराग्रह परोसता। लेकिन किन्नर समुदाय के उस व्यक्ति ने घर खरीद लिया और वहीं रहने लगा।

मेरे मन में उन्हें लेकर बचपन में ही भरे गए कई सवाल थे, लेकिन मैंने किन्नर कहे जाने वाले किसी व्यक्ति से पूछने की हिम्मत नहीं की, क्योंकि लोगों ने डरा रखा था। गली में रह रहे उस व्यक्ति से मैं जब भी मिलता, वह पूरे सम्मान के साथ दुआ-सलाम करता। एक दिन मैंने कुछ सवाल कर दिए। वह पहले हंसा और कहने लगा कि आपने जो सुना है, वह किसने कैसे तय किया, पता नहीं। ये बातें सच नहीं हैं। वह उपेक्षा की बात पर द्रवित हो उठा। कहने लगा कि हमें घोर उपेक्षा और अपमान का सामना अब भी करना पड़ता है।

मैंने लोगों के बीच जो धारणाएं देखी थीं, उनके विपरीत ये लोग बहुत अनुशासित होते हैं। अपने गुरु की आज्ञा का पालन करना परम कर्तव्य होता है। ऐसे अनुशासनहीन व्यक्ति को बिरादरी से निकाल दिया जाता है जो बाद में कहीं का नहीं रहता। हाड़-मांस का हमारी तरह ही एक मनुष्य होने के बावजूद न समाज इनके प्रति सहज रहता है, न सरकार की ओर से इन्हें कोई मदद मिलती है। बचपन की बहुत सारी बातों का अब आकर जवाब मिल पाया है। लेकिन घर ‘पवित्र’ किए जाने का सवाल अभी तक कायम है।

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