ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगेः पढ़ाई की मुश्किल

विद्यालय वह प्राथमिक इकाई है जहां हमारे बच्चे दिन का अधिकांश वक्त गुजारते हैं। आज अन्य क्षेत्रों की तरह शिक्षा के क्षेत्र में भी तेजी से निजीकरण की प्रक्रिया जारी है।

Author January 11, 2018 03:39 am
(प्रतीकात्मक तस्वीर)

अनीता यादव

विद्यालय वह प्राथमिक इकाई है जहां हमारे बच्चे दिन का अधिकांश वक्त गुजारते हैं। आज अन्य क्षेत्रों की तरह शिक्षा के क्षेत्र में भी तेजी से निजीकरण की प्रक्रिया जारी है। बल्कि अब उच्च शिक्षा के मामले में बढ़ते निजीकरण का प्रभाव साफ देखा जा सकता है। ऐसा लगता है कि सरकारों ने निजीकरण को ही विकास का अकेला पैमाना मान लिया है। जबकि निजीकरण के नतीजों से हम सब अब अच्छी तरह से वाकिफ हैं कि कैसे यह सामान्य से लेकर जनकल्याण तक के सभी क्षेत्रों तक लोगों की पहुंच को सीमित करके छोड़ देता है। पूरी तरह आर्थिक हैसियत की बुनियाद पर चलने वाली निजीकरण की दुनिया में वही लोग या सामाजिक समूह सहजता से टिके रह पाते हैं, जो आर्थिक रूप से सक्षम हैं।

ऐसे में अगर शिक्षा के क्षेत्र की बात करें तो निजी, सरकारी या अर्धसरकारी के नाम पर चलने वाले स्कूलों की हालत अब सभी जानते हैं। किसी की आर्थिक हैसियत जरा-सी भी अच्छी है या खर्च वहन कर सकने लायक है तो वह अपने बच्चों को सरकारी विद्यालय में नहीं पढ़ाना चाहता। हाल ही में मैं एक मजदूर से बातचीत कर रही थी तो उस क्रम में पता चला कि उनके दो बच्चे हैं- एक लड़का और एक लड़की। वे दोनों को अच्छे स्कूल में पढ़ाना चाहते हैं। अच्छे स्कूल से उनका आशय निजी स्कूल था। लेकिन उनकी आमदनी और आर्थिक हालात ऐसे थे कि उन्होंने लड़की को निजी और लड़के को सरकारी विद्यालय में दाखिला दिलवा दिया। लड़का पढ़ना चाहता है, लेकिन उसका कहना है कि सरकारी स्कूलों में कक्षाएं नियमित नहीं होती हैं। कई बार शिक्षक छुट्टी पर रहते हैं या फिर रहने पर भी कक्षा में पढ़ाने के प्रति बहुत गंभीर नहीं रहते हैं।

कई बार तो शिक्षकों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि लड़के विद्यालय परिसर के बाहर कहां घूम रहे हैं और क्या कर रहे हैं। आपसी बातचीत में गालियों का इस्तेमाल एक आम प्रवृत्ति है, लेकिन स्कूल में उन्हें ऐसे बर्ताव और भाषा से बचने के लिए कोई माहौल नहीं मुहैया कराया जाता। शिक्षण के स्तर से लेकर बुनियादी सुविधाओं के अभाव के चलते पहले ही बहुत सारे बच्चे बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। दोपहर के भोजन की योजना कई कमजोर तबकों के लोगों को अपने बच्चों को स्कूल भेजने की ओर आकर्षित करती है। लेकिन जब तक स्तरीय शिक्षा का स्तर बेहतर नहीं होगा, किस तरह की उम्मीद की जाएगी! जबकि आज जिस तरह समूचा युग एक तरह से प्रतियोगिता आधारित हो गया है, उसमें इस तरह के बच्चे कैसे आगे बढ़ने का रास्ता खोज पाएंगे?

यह केवल किसी एक नहीं, बल्कि हर उस पिता का दर्द है, जिसका बच्चा सरकारी स्कूल में पढ़ता है। दूसरी ओर निजी विद्यालयों का पूरा तंत्र एक तरह से ‘दुकान’ में तब्दील हो चुका है। कभी स्कूल के विकास और दूसरी कई तरह की गतिविधियों के नाम पर अनेक तरह के ‘फंड’ की वसूली होती है तो कभी किताब और स्कूली परिधान के नाम पर विद्यार्थियों को स्कूल से ही खरीदारी के लिए बाध्य कर दिया जाता है। इसका मतलब सभी अभिभावक जानते हैं, लेकिन कुछ कर नहीं सकते। किताबों के भारी बस्ते में जितनी काम की चीजें होती हैं, उनसे ज्यादा गैरजरूरी होती हैं। कई चीजें तो साल भर काम में नहीं आतीं। बच्चे के परिवार की आर्थिक स्थिति कैसी है, इससे स्कूल को कोई मतलब नहीं होता। अगर उसे कोई विद्यार्थी लेने से मना कर दे तो स्कूल का व्यवहार सख्त हो जाता है। ऐसे में अभिभावकों की चिंता वाजिब है। लेकिन मुश्किल यह है कि इस तरह की शिकायतों की कोई सुनवाई नहीं होती।

मगर सवाल है कि निजी स्कूलों का इतना बड़ा तंत्र आखिर किस तरह समाज और लोगों की निर्भरता का मामला बन गया है? आखिर सरकारी स्कूलों का तंत्र किन वजहों से इतना कमजोर हो चुका है कि निजी स्कूलों को इतने बड़े स्तर पर फलने-फूलने का मौका मिला? सरकारी शिक्षा तंत्र के कमजोर होने की जिम्मेदारी किस पर आनी चाहिए?
कुछ समय पहले निजी स्कूलों में फीस बढ़ोतरी के मामले में उठे विवाद के बाद जब पहले वसूली गई अतिरिक्त फीस की वापसी के आदेश जारी हुए तो उस पर स्कूलों का रवैया हैरान करने वाला था। कितने स्कूलों ने फीस वापस की या फिर कितनों ने उससे बचने के लिए क्या रास्ता निकाला, इसकी सच्चाई उन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावक ही बता सकते हैं। लेकिन इन सब गतिविधियों के आधार पर यही कहा जा सकता है कि आज शिक्षा को पूरी तरह व्यापार बना दिया गया है। इसमें जो आर्थिक रूप से सक्षम है, अपनी अगली पीढ़ी को शिक्षित कर पाएगा और जो कमजोर है, वह बस सपने देखता रह जाएगा! एक परिपक्व लोकतंत्र में क्या हम शिक्षा की ऐसी बंटी हुई व्यवस्था को न्यायपूर्ण कह सकेंगे?

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App