Opinion about Deteriorating language in Tv Debate and Politics - Jansatta
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दुनिया मेरे आगेः बिगड़ती भाषा

ऐसा लगता है कि अब भाषा की दुर्दशा का कोई अंत नहीं है। वह राजनीति की दुनिया से लेकर सामाजिक आचार-व्यवहार में और उसके बरतने के ढंग में भी कई जगहों पर हो रही है।

Author January 26, 2018 3:26 AM
महात्मा गांधी के सार्वजनिक-राजनीतिक या पारिवारिक जीवन को भी इस संदर्भ में एक मिसाल मान सकते हैं, जिसमें न तो शब्दों का अपव्यय दिखता है, न ही शब्दों के प्रति कोई ‘दुर्व्यवहार।’ और न ही उनसे विरोधी को ‘ध्वस्त’ करने का कोई उपक्रम है।

ऐसा लगता है कि अब भाषा की दुर्दशा का कोई अंत नहीं है। वह राजनीति की दुनिया से लेकर सामाजिक आचार-व्यवहार में और उसके बरतने के ढंग में भी कई जगहों पर हो रही है। अशुद्धियों और अपशब्दों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। भाषा आपसी संवाद और अपनी बात दूसरों तक अच्छी तरह पहुंचाने, संबंधों और अभिव्यक्ति में सरसता लाने के लिए बनी है, लेकिन उसकी लगातार अनदेखी हो रही है। सार्वजनिक मंचों से राजनेता हों या कार्यकर्ता, कभी भाषा को मात्र धमकी देने की चीज मान रहे हैं, कभी विरोधी को कुछ भी कह कर धराशायी करने का औजार समझ रहे हैं। टीवी चैनलों की बहसों में तो भाषा की दुर्दशा कई बार अपने चरम पर होती है, जब यह मान लिया जाता है कि भाषा का काम ऐसा शोर करना है, जिसमें असली बात ही दबी-ढकी रह जाए।

‘अच्छी हिंदी’ के लेखक रामचंद्र वर्मा ने कभी ‘शब्द का महत्त्व और महिमा’ में लिखा था- ‘संसार के सभी लोग सदा आपस में बातचीत करते और सैकड़ों-हजारों शब्दों का व्यवहार करते हैं। पर उनमें से कितने ऐसे हैं जो अपने नित्य व्यवहार में शब्दों का ठीक-ठीक अर्थ और महत्त्व समझते हों। बोलना-चालना हम लोगों के लिए उठने-बैठने, खाने-पीने आदि की तरह इतना सामान्य हो गया है कि शब्दों के महत्त्व पर हम जल्दी ध्यान देने की आवश्यकता ही नहीं समझते।’ रामचंद्र वर्मा की बरसों पहले लिखी गर्इं पंक्तियां आज और अधिक प्रासंगिक हो गई हैं।

महात्मा गांधी के सार्वजनिक-राजनीतिक या पारिवारिक जीवन को भी इस संदर्भ में एक मिसाल मान सकते हैं, जिसमें न तो शब्दों का अपव्यय दिखता है, न ही शब्दों के प्रति कोई ‘दुर्व्यवहार।’ और न ही उनसे विरोधी को ‘ध्वस्त’ करने का कोई उपक्रम है। जो है वह यही है कि संवाद, मानवीय रूप से दिया गया संदेश, (प्रवचन वाले अर्थों में नहीं) और है विमर्श के लिए एक खुला आमंत्रण! अपनी बात असरदार ढंग से बिना व्यंग्योक्ति और ‘हिंसा’ के कही जा सकती है, यह भी गांधी से हर क्षेत्र का व्यक्ति सीख सकता है। दरअसल, शब्दों के अर्थ, संदर्भ के हिसाब से बदल जाते हैं, अब यह बात भी भुलाई जा रही है। कोई यह कहे कि मैं अमुक को बस एक ‘गुंडा’ मानता हूं तो जाहिर है वह एक ऐसा अर्थ देगा जो अप्रिय होगा। अगर कोई यह कहे कि ‘जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘गुंडा’ एक अद्भुत कहानी है’ तो इससे एक दूसरा अर्थ प्रकट होगा। पर अब शब्द-अर्थ पर तो ध्यान कम दिया जाता है और इस ओर ध्यान भी शायद ही रहता है कि उसका व्यवहार किस संदर्भ में किया जा रहा है!

हिंदी को हिंग्लिश एक गैरजरूरी ढंग से क्षति पहुंचा ही रही है, पर सोशल मीडिया से लेकर, सामाजिक जीवन तक में भाषा कई बार एक प्रकार की हिंसा का शिकार हो रही है। कई स्कूलों में हिंदी बोलने पर डांट पड़ती है और आग्रह किया जाता है बच्चों से कि वे अंग्रेजी ही बोलें। जब हम भाषा को प्रेम और उचित सावधानी के साथ नहीं बरतते और उसे ‘प्रतिबंधित’ तक करने लगते हैं और उससे मानो गाली जैसा ही एक काम लेने लगते हैं, तो इसे एक प्रकार की हिंसा ही कहेंगे।

भाषा और उसका शब्द-भंडार एक आनंद की चीज है। जितने अधिक शब्द हमारे पास होंगे, हमारा व्यक्तित्व भी उतना ही संपन्न होगा, क्योंकि तब हम अपनी बात को अवसर के अनुकूल अधिक अच्छी तरह संप्रेषित कर पाएंगे, यह एक तय-सी बात है। यही काम साहित्य और कविता विशेष रूप से करते आए हैं। लेकिन भाषा या हिंदी की बात करें तो अब युवा पीढ़ी के पास शब्दों की कमी हो रही है। जिन्हें पर्यायवाची शब्द कहा जाता है, वे स्कूली पढ़ाई में थोड़ा-बहुत अब भी रट लिए जाते हैं, लेकिन उसके बाद सामाजिक-पारिवारिक जीवन में हम क्षणिक आनंद के लिए भी उनका इस्तेमाल नहीं करते हैं। मसलन, आकाश अब आकाश या ‘स्काई’ भर है, अब वह गगन या नभ आदि नहीं रहा। बहुतेरे शब्द बस अब कोश में बंद होते जा रहे हैं।

शब्द-चर्चा में एक बार महात्मा गांधी की ओर फिर लौटें। महात्मा गांधी ने 18 मार्च, 1935 के एक पत्र में अपने बेटे मणिलाल और पुत्रवधू सुशीला को लिखा था- ‘तुमने एजेंट का वर्णन ठीक किया है। मुझे उनका खयाल आ रहा है। …विवाह के समय तुम दोनों को जो बारहवां अध्याय रटाया गया था, उसका पाठ करता हो और इन सबका मनन करता हो, तो उससे तेरा हृदय कोमल हो जाए और तेरे शब्दों से नम्रता, प्रेम, सत्य झरा करे।’ रोडरेज के समय और मामूली चीजों पर झगड़ों और कलह के दौर में यह पंक्ति कितनी मिठास और कैसा आग्रह लिए हुए है- ‘शब्दों से नम्रता, प्रेम, सत्य झरा करे।’ हां, शब्द इसी के लिए तो बने हैं!

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