ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगेः तहजीब की तंगी

पिछले दिनों एक बैंक की शाखा में कुछ काम से जाना हुआ। काउंटर पर एक महिला बैंक खाता खुलवाने के बारे में पूछताछ कर रही थी।

Author April 7, 2018 05:33 am
प्रतीकात्तक तस्वीर

प्रदीप उपाध्याय

पिछले दिनों एक बैंक की शाखा में कुछ काम से जाना हुआ। काउंटर पर एक महिला बैंक खाता खुलवाने के बारे में पूछताछ कर रही थी। वह खुद और उसके साथ आई महिला ग्रामीण परिवेश की और कम पढ़ी-लिखी लग रही थी। उसने बैंक कर्मचारी से विनम्रतापूर्वक कुछ जानकारी मांगी तो कर्मचारी ने बड़े ही रूखे तरीके से उसे टका-सा जवाब दे दिया। महिला उसके जवाब से कुछ असहज-सी हो गई। जवाब सलीके से भी दिया जा सकता था। मैंने हस्तक्षेप करते हुए उस महिला को सहजता से वही बात समझा दी। इसी तरह एक दिन बैंक के एटीएम कक्ष से अपना काम करा कर निकल रहा था तब एक बुजुर्ग वहीं तैनात गार्ड से पासबुक प्रविष्टि के लिए मशीन में लगाने की प्रक्रिया जानना चाह रहे थे। गार्ड ने कड़वी भाषा में जवाब दिया कि आप पढ़े-लिखे समझदार हैं, खुद देख लें। मुझे उसका यह व्यवहार भी ठीक नहीं लगा। मैंने बुजुर्ग को प्रक्रिया समझा दी। उनके चेहरे पर संतोष का भाव था और उन्होंने मुझे धन्यवाद दिया।

अक्सर मुझे लगता है कि हम अपने कार्य और व्यवहार में सामान्य शिष्टाचार और सदाशयता भूलते जा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि सभी लोग एक जैसे होते हैं, लेकिन यह भी सही है कि अधिकतर लोगों की कार्यप्रणाली और व्यवहार इसी तरह का होता जा रहा है। सरकारी दफ्तरों में शासकीय सेवकों के प्रति आम धारणा बिल्कुल अच्छी नहीं है। अफसर, बाबू, चपरासी जनसामान्य से तहजीब से पेश नहीं आते हैं। कई बार तो आम जन को दुत्कार भी देते हैं। कई लोग सरकारी दफ्तरों से कर्मचारियों के व्यवहार के मामले में कटु अनुभव लेकर लौटते हैं।

संभव है कि इस तरह के व्यवहार का कारण वहां के किसी कर्मचारी या अधिकारी की अपनी व्यस्तताएं और प्राथमिकता हों या फिर कार्यस्थल का दूषित वातावरण ही हो। लेकिन क्या यह उचित है कि वे एक सामान्य शिष्टाचार भी नहीं निभा सकें? क्या इतनी व्यावहारिकता की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए कि औपचारिकता निभाते हुए वे संयमित और नीति-सम्मत व्यवहार करें। मैंने ऐसे अधिकारी और कर्मचारी भी देखे हैं जो नियम, कानून-कायदों की वजह से किसी व्यक्ति का काम करने में असमर्थ रहते हैं, लेकिन अपनी व्यवहार कुशलता, सदाशयता और मधुर वाणी के बलबूते लोगों का दिल जीत लेते हैं। आमतौर पर साधारण लोग सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाना पसंद भी नहीं करते हैं, क्योंकि उनके बीच यह धारणा बन चुकी है कि बिना रिश्वत दिए कोई काम नहीं होता है। इस धारणा के बीच अगर किसी के साथ रूखा व्यवहार हो, उसे दुत्कारा जाए तो उसकी धारणा की पुष्टि ही होती है।

शासकीय, अर्द्ध शासकीय दफ्तरों, अस्पतालों, निगमों में आम आदमी के साथ अलग दोयम दर्जे का व्यवहार होता है और खास लोगों के साथ अलग विशिष्टतापूर्ण व्यवहार। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह स्थिति ठीक नहीं है और जन-आस्था को भी प्रभावित करती है। इसलिए सभी के साथ समान व्यवहार की दरकार है। जनसामान्य के साथ शिष्टाचारपूर्ण व्यवहार हो तो सरकार के प्रति भी जनता का विश्वास बढ़ेगा। मेरे संपर्क में एक ऐसे उच्च पदस्थ अधिकारी भी आए, जिनका स्वभाव और व्यवहार इतना सौम्य और मृदुल था कि अधीनस्थ अमला तो उनके साथ कार्य करने में बहुत सहज अनुभव करता ही था, साथ ही कभी दिन-रात, छुट्टी आदि की भी परवाह नहीं करता था। बल्कि खुशी-खुशी काम करता था। जनसामान्य में भी वे अपने व्यवहार के कारण लोकप्रिय थे। कितना ही जरूरी काम हो या मीटिंग चल रही हो, वे आगंतुक के लिए समय निकाल लेते थे और बड़े ही आदर भाव से मुलाकात करते या फिर समय न होने पर शिष्टाचारपूर्वक बाद में मिलने के लिए अनुरोध कर लेते थे। उनके संवेदनशील व्यवहार का हर कोई कायल रहा।

क्या हरेक जनसेवक को ऐसा नहीं होना चाहिए या क्या वह ऐसा नहीं हो सकता? क्यों अधिकार और शक्तियां प्राप्त होते ही व्यक्ति धरातल छोड़ देता है? ये अधिकार, शक्तियां जनसामान्य की सेवा करने के लिए ही तो मिलते हैं। लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में शासक और शासित की मानसिकता के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। जनप्रतिनिधियों को भी इस बात को समझना होगा। हमारे देश के जनप्रतिनिधियों और जनसेवकों को विदेश भ्रमण के दौरान विकसित लोकतांत्रिक देशों में स्थापित व्यवस्था का भी अवलोकन और अध्ययन करना चाहिए, ताकि उन्हें समझ आ सके कि वे शासक के रूप में प्रतिस्थापित नहीं हुए हैं। सामंती सोच और सामंती व्यवस्था की मानसिकता से बाहर निकल कर इस बात को स्वीकार करना होगा कि हम सभी एक स्वतंत्र देश के नागरिक हैं। सभी समान हैं और हम सभी अपने देश के लिए ही कार्य कर रहे हैं। अगर जनसेवकों और जनप्रतिनिधियों में यह सोच विकसित हो जाए तो कोई कारण नहीं कि सभी सरकारी कार्यालयों, अस्पतालों, निगम, बैंक आदि में सामान्य शिष्टाचार का पालन न हो और संवेदनशील व्यवहार और सदाशयता देखने को न मिले। अगर यह मानसिकता घर कर ले तो जनसामान्य को भी लगने लगेगा कि वे अपने देश में हैं और अपनों के बीच हैं।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App