ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगेः रोने का रंग

लोक की भाषा में रोना अपवाद स्परूप ही अकेला होता है। वह धोना साथ लेकर आता है। इसीलिये लोग रोने की घटनाओं के बारे में बात करते हुए कहते हैं कि ‘रोना-धोना चल रहा है।’

Author January 23, 2018 3:48 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

अतुल कनक

लोक की भाषा में रोना अपवाद स्परूप ही अकेला होता है। वह धोना साथ लेकर आता है। इसीलिये लोग रोने की घटनाओं के बारे में बात करते हुए कहते हैं कि ‘रोना-धोना चल रहा है।’ रोने के साथ धोने का होना रो-रोकर किसी को धो डालने की कोशिशों की तरफ इशारा करता है या इस बात की तरफ कि रोने वाला भीतर से धुल गया है या फिर ये कि जितना रोना था, उतना हो चुका है और अब निचुड़ने के लिए अपने आंसू बहा रहा है। इनमें से अंतिम सच क्या है, यह तय करना फिलहाल मुश्किल प्रतीत होता है।

यों अपने भाव के अर्थ में रोना दुख का ही परिचायक है। रोने की प्रक्रिया में आंसू निकलते हैं। लेकिन प्राकृतिक बनावट में सामाजिक बुनावट कुछ ऐसी घुली हुई है कि कई बार लोग खुशी के अतिरेक में पहुंचने पर भी आंसू बहाने लगते हैं। इसकी वजह शायद यह होती है कि इस तरह अचानक मिली खुशी पर उनके लिए भरोसा हो पाना मुश्किल होता है। इसलिए आंखों से आंसू निकलने लगते हैं। यही कारण है कि आंसुओं को लेकर अंतिम तौर पर कुछ भी कह पाना मुश्किल होता है। जानकार लोगों का कहना है कि मगरमच्छ के जो आंसू होते हैं, वे एक छलावा होते हैं।

यों छलावा तो लकड़बग्घे की हंसी भी होती है। चंद्रकांत देवताले की एक कविता का शीर्षक है- ‘सावधान! लकड़बग्घा हंस रहा है।’ अब आप इसे लोकतंत्र की खुशकिस्मती कहें या बदकिस्मती कि जहां कवि लगातार लकड़बग्घों की हंसी के खतरों से आगाह करने के लिए कविताएं लिख रहे हैं, वहीं इंसान की खाल ओढ़ कर समाज में घुस आए कुछ ‘लकड़बग्घे’ लगातार हंस रहे हैं। लेकिन फिलहाल बात हंसी की नहीं, रोने की, क्योंकि कोई भी संवेदनशील और समझदार यह जानता है कि किसी लकड़बग्घे की हंसी दरअसल बहुतों के रोने की वजह बन सकती है।

दरअसल, हंसना और रोना अन्योन्याश्रित प्रक्रिया है। यानी एक का होना दूसरे की प्रस्तावना लिख ही देता है। अपने लिए नहीं तो दूसरों के लिए सही। यह सच है कि कई लोग तो सिर्फ इसीलिए रोते हैं कि उन्हें दूसरों की हंसी सताती है। यह दूसरों के सुख से दुखी होने का मामला है। मुझे लगता है मगरमच्छों के आंसुओं के पीछे लकड़बग्घों की हंसी का दर्द होता है। लोकतंत्र में जब दूसरों को छलने की ही प्रतियोगिता हो तो रोने-धोने वाले हंसी-ठट्ठा करने वालों से पीछे क्यों रहें!

हालांकि रोना एक सांस्कृतिक परंपरा भी है। ससुराल के लिए विदा होते समय मां-पिता, भाई-बहन और परिवार के बाकी लोगों से बिछड़ती हुई लड़कियों का रोना इसका एक उदाहरण है। अपने नजदीकी किसी की मौत पर रोना-धोना भी एक सामान्य और स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन राजस्थान के कुछ सामंती परिवारों में रोना कमजोरी की निशानी समझा जाता है, इसलिए वे नहीं रोते हैं। लेकिन किसी की मौत पर रोना जरूरी भी माना जाता है। इसीलिए वहां अपने हिस्से का रोना रुलाने के लिये ‘रूदालियों’ को निमंत्रित किया जाता है। यानी यह तस्वीर है कि समाज में सामर्थ्यवान लोग अपने हिस्से का रोना भी दूसरों को सौंप सकते हैं। शायद इसीलिये मुहावरे की भाषा में ‘अपना रोना रोने’ को अनर्गल प्रलाप से जोड़ा जाता है। व्याकरण भी कई बार आभिजात्यों के रंग में रंगा नजर आता है। विदा बेटी की ससुराल के लिए हो या परिवार के किसी सदस्य की अनंत यात्रा के लिए- बिछोह का दुख रुलाता ही है। जयशंकर प्रसाद ने लिखा था कि ‘वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान।’ यह गान रोने-धोने की सर्जनात्मक परिणति है। लेकिन कई बार कुछ लोग इतना बेसुरा भी गाते हैं कि तय करना मुश्किल हो जाता है कि वे रोना चाहते हैं या श्रोताओं को रुलाना चाहते हैं।

फिल्मों में अभिनेत्रियां या अभिनेता रोने यानी आंखों से आंसू निकलने का अभिनय करने के लिए ग्लिसरीन का इस्तेमाल करते हैं। कई बार पर्दे पर महिलाओं को रोता हुआ देख कर पुरुष का कठोर हृदय भी पिघल जाता है और इसीलिए समाज में रोने-धोने को महिलाओं के बड़े हथियार के तौर पर देखा जाता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि रोने पर केवल महिलाओं का एकाधिकार है। पुरुषों को भी रोते हुए देखा गया है। जो सचमुच संवेदनशील और ईमानदार होते हैं, वे वास्तव में रोते हैं और जिन्हें दूसरों को बरगलाना होता है, धोखा देना होता है, वे बस आंसू गिराते हैं। आजकल तो भाषण देते या संवाददाता सम्मेलन करते हुए भी रोने का चलन बढ़ गया है। ऐसे में अगर कोई यह कहता है कि उसे लोकतंत्र की हालत पर रोना आ रहा है तो यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि रोने की बात करने वाला सचमुच रोना चाहता है या अपने रोने के बहाने किसी को धोना चाहता है!

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App