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राजनीतिः स्वच्छता के नायक

स्वच्छ भारत अभियान की जोरदार शुरुआत से लगा था कि देश स्वच्छ होगा। नई स्वच्छता नीति का निर्माण करते हुए सफाई के बुनियादी ढांचे में परिवर्तन होगा।

Author December 1, 2017 03:19 am
फाइल फोटो

जेपी चौधरी

स्वच्छ भारत अभियान की जोरदार शुरुआत से लगा था कि देश स्वच्छ होगा। नई स्वच्छता नीति का निर्माण करते हुए सफाई के बुनियादी ढांचे में परिवर्तन होगा। सफाई कार्यों का बड़े पैमाने पर मशीनीकरण होगा और सफाई कामगारों को मैला ढोने से निजात मिलेगी। लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात रहा। न तो सफाई के परंपरागत तरीकों में कोई परिवर्तन आया और न ही सफाई कामगारों को मैला ढोने से निजात मिली। स्वच्छ भारत अभियान में भारत को 2019 तक स्वच्छ राष्ट्र बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। बेशक यह एक अच्छा अभियान है और इसे राजनीति की नजर से देखना बेमानी होगा। इस अभियान में प्रत्येक भारतीय की भागीदारी की अपेक्षा की गई थी।

इस अभियान का मुख्य उद्देश्य खुले में शौच से मुक्ति, घर-घर से कूड़ा इकट्ठा करना, स्वच्छता के प्रति लोगों में जागरूकता आदि है। ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालयों के निर्माण को अभियान की सफलता मान कर खूब प्रचारित किया गया। इस साल 2 अक्तूबर को स्वच्छ भारत अभियान की तीसरी वर्षगांठ मनाई गई। स्वच्छता सप्ताह, स्वच्छता पखवाड़ा, स्वच्छता माह के आयोजन बैनर-पोस्टरों पर खूब दिखाई दिए। इस दौरान नेताओं-अभिनेताओं और अधिकारियों ने भी झाड़ू उठाई और मीडिया में अधिकारी, सभासद, मेयर, विधायक, सांसद, मंत्री और मुख्यमंत्री के रूप में ‘स्वच्छता-नायक’ और ‘स्वच्छता-दूत’ सामने आए। कई लोग पुरस्कृत भी हुए। स्वच्छता की शपथें ली गर्इं। असल में हम भूल जाते हैं कि स्वच्छता पखवाड़ा या माह तक नहीं, बल्कि निरंतर चलने वाला कार्य है।

विडंबना है कि एक तरफ स्वच्छ भारत का ढिंढोरा पीटा जा रहा है, दूसरी तरफ मैनहोलों और नालों में सफाईकर्मी अपनी जान गंवा रहे हैं। ‘प्रिक्सस इंडिया’ की ‘डाउन दि ड्रेन’ नामक रिपोर्ट में बताया गया कि 2014 में केवल दिल्ली में सौ से अधिक सफाई कामगारों की सीवर की सफाई के दौरान मौत हुई थी। इस साल भी सीवर में मरने वालों की खबरें लगातार आती रही हैं। मगर स्वच्छता अभियान में इन मरने वालों का कहीं नाम नहीं है। नेता-अभिनेता जरूर अपनी तस्वीरें छपवाते घूम रहे हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में जिन शौचालयों का निर्माण हुआ है, वहां पानी की बड़ी समस्या है। वहां कोई पाइप लाइन नहीं है। ज्यादातर शौचालयों में डिब्बे या बाल्टी में पानी लेकर जाना पड़ता है। इससे शौचालयों की ठीक से सफाई नहीं हो पाती। जाने कितने शौचालय तो बेकार हो गए या बंद पड़े हैं। जिन घरों में शौचालय बने हैं, उनमें पुराने और बड़े-बूढ़े लोग जाने से हिचकते हैं। वे कोशिश करते हैं कि इससे बेहतर कहीं खुले में ही शौच कर लें। कथित उच्च जाति के लोग अपने निजी शौचालयों की सफाई भी सफाईपेशा जातियों से ही करवाते हैं। शौचालयों की सफाई के लिए सफाईपेशा जाति के स्त्री-पुरुषों को दस या बीस रुपए मासिक दिए जाते हैं। मना करने पर जातीय दबंगई भी दिखाई जाती है।

एक अनुमान के मुताबिक पिछले साढ़े तीन साल में स्वच्छ भारत अभियान के प्रचार-प्रसार पर पांच सौ करोड़ रुपए से अधिक व्यय किए गए हैं। इतनी बड़ी धनराशि व्यय करने के बाद देश में स्वच्छता का एक हल्का-फुल्का माहौल तो बना लेकिन इसे किसी सार्थक मुहिम में नहीं बदला जा सका। जागरूकता के नाम पर हम सिर्फ सफाईकर्मियों का काम बढ़ा पाए। जन-सामान्य के दायित्व से यह अभी भी दूर है। ऐसा प्रतीत होता है कि गंदगी फैलाना सबका काम है और सफाई करना एक वर्ग विशेष का।

अगर हम सफाई कर्मियों की बात करें तो श्रम कानूनों को ताक पर रख कर, प्रशासन ने सफाई के कार्य को ठेकेदारी प्रथा के हवाले कर दिया है। रोजगार के नाम पर सफाई कामगार ठेकेदारी प्रथा की चक्की में पिस रहे हैं। ठेकेदारों द्वारा इनका जम कर शोषण किया जा रहा है। न इनके कार्य की कोई समय-सीमा निर्धारित है, न ही उचित वेतन और न ही अवकाश की व्यवस्था है। न इलाज का प्रबंध और न ही कोई भविष्यनिधि आदि की कटौती। ठेकेदारी प्रथा ने सफाई कामगारों को एक तरह बंधुआ मजदूर बना दिया है। सवाल उठता है कि ठेकेदारी प्रथा संविधान के किस उद्देश्य की पूर्ति करती है?

सीवर सफाई के दौरान अपनी जान गंवाने वालों के लिए नेता, बुद्धिजीवी, समाजसेवी और दलित नेता तक संवेदना के दो शब्द नहीं बोलते। यही हाल मीडिया का है। जबकि स्वच्छता अभियान के असली नायक वे हैं, जो सफाई के दौरान मारे गए हैं। ये नायक हर मंच से गायब हैं। सामाजिक न्याय और कल्याणकारी राज्य की अवधारणा का तकाजा है कि सफाईकर्मियों को सम्मान से देखा जाए। सफाई कामगारों के हित में जीवन बीमा, स्वास्थ्य बीमा, बच्चों की शिक्षा और पुनर्वास जैसी कल्याणकारी योजनाएं सिर्फ बनाई न जाएं, उन्हें लागू किया जाए। एक तरफ सरकार इनके विकास की बातें करती है और दूसरी तरफ उन्हें ठेकेदारों के हवाले करती जा रही हैं, जहां उन पर दिन-रात शोषण का चाबुक फटकारा जाता है। अगर स्वच्छता अभियान इसी तरह निजी ठेकेदारों के भरोसे आगे बढ़ेगा तो यह एक ढकोसले से ज्यादा कुछ नहीं होगा।

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