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दुनिया मेरे आगेः सिनेमा का समाज

अब सिनेमा हमारे लिए दिवास्वप्न ही होता जा रहा है। भारतीय और खासकर हिंदी सिनेमा के बारे में यह बात बहुत वास्तविकता के साथ लागू होती है।
Author January 5, 2018 03:43 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

अब सिनेमा हमारे लिए दिवास्वप्न ही होता जा रहा है। भारतीय और खासकर हिंदी सिनेमा के बारे में यह बात बहुत वास्तविकता के साथ लागू होती है। सिनेमाघरों में लगातर दर्शकों को आकृष्ट करने में हारती चली जा रही फिल्मों के बीच अक्सर कोई बहुचर्चित और टिकट खिड़की पर सफलता की गारंटी माने जाने वाले किसी नायक की फिल्म आ जाती है, जिसका प्रचार-प्रसार समय के साथ उसी तरह होता है, जैसा निर्माण के बड़े घरानों और बड़े नायक-नायिका की फिल्मों के समय किया जाता है। अब ये बातें साफ देखी जा सकती हैं कि जिस पैमाने पर किसी फिल्म का प्रचार-प्रसार होता है, उसमें उसका बजट अब फिल्म के निर्माण के बजट से बहुत कम नहीं होता है, बल्कि कई मायनों में दर्शकों को झकझोर कर उठाने के लिए यह बराबर या अपवाद की स्थिति में ज्यादा भी हो सकता है।

कई बार आने वाली फिल्म की टिकटों की अग्रिम बिक्री ही इतनी रोमांचकारी होती है कि मीडिया में यह खबर भी तरतीब से कारोबार के लिहाज से ही फैलाई जाती है। तो टिकटों की अग्रिम बिक्री में भारी कामयाबी, यूट्यूब और सिनेमाघरों में फिल्म के ट्रेलर को लाखों की तादाद में देखा जाना, प्रचार के लिए फिल्म से पहले बाहर आ गए गाने, यह सब कमाई के लिए भी फिल्म की बेहतरी के लिए किया जाता है। आखिर जब कोई बड़ा घराना फिल्म बनाते हुए नायक का कद देख-जान कर ही बजट की परवाह नहीं करता है तो नायक भी अच्छा-खासा धन हासिल करने के लिए खूब पसीना बहाता है।

इतना सब होने के बावजूद तेजी से व्यतीत होते समय में जैसे दिन और साल बीतते हैं, तीज-त्योहार पलक झपकते आते और चले जाते हैं, वैसे ही फिल्म के मामले में देखा जा सकता है। अगर फिल्म किन्हीं स्थितियों में सफल होगी तो भी उसका जोर तीन हफ्ते तक होना भी काफी मान लिया जाता है। इतने दिनों में फिल्म इस तरह निचुड़ कर कमा कर दे देती है फिर दोबारा उसका मूल्य वही नहीं रह जाता है। यों भी, अब हमारे यहां फिल्म एक ही बार नाच-गाने का खेल होकर रह गई है। दो-चार या छह महीने बाद दोबारा उसके आने का प्रश्न ही नहीं उठता, गोया एक बार का प्रदर्शन उस फिल्म के लिए एक जन्म बराबर हो जाता है।

आम दर्शकों को हमेशा की तरह आज भी परदे का नायक लुभाता है। तब तो और भी, जब वह भव्य विदेशी कैमरों की सहायता से परदे पर किसी भी तरह का जोखिम भरा कारनामा करता नजर आता है। लेकिन उसकी बहादुरी एक मनोरंजन की कहानी की तरह है। उससे बहुत ज्यादा प्रेरित होने या भ्रमित होने की जरूरत नहीं है। सिनेमा हमेशा से दिवास्वप्न ही रहा है, इसलिए वह आगे भी यही रहेगा। सिनेमा में जिस तरह के संघर्ष का बखान होता है, वह सच्चा सामाजिक संघर्ष कहां पाया जाता है? वहां प्रेम और उसकी सहजता या अनेक बार विडंबनाओं का जैसा चित्रण होता है, वह यथार्थ में बिल्कुल अलग और बदला हुआ होता है।

सिनेमा में जिस तरह के पथ या पगडंडी रचे जाते हैं, वैसे केवल सपनों में आते हैं। सिनेमा के जैसे रिश्ते-नाते भी किसी पटकथा का हिस्सा होते हैं, न कि जीवन का। कई बार लगता है कि सिनेमा की शत्रुता भी किसी हद तक मानवीय है, क्योंकि समाज के संकट दूसरे हैं। पत्र-पत्रिकाओं में कथा, कहानी का छपना, मंच पर नाटक का होना या सिनेमाघर में सिनेमा का प्रदर्शन अनुभूतियों से लेकर चाक्षुष माध्यमों के मनोरंजन हैं जो समय को व्यतीत करने, साधने या सदुपयोग करने के लिए किए जाते हैं।

मनोरंजन के तमाम माध्यमों ने आज तक समाज को ऐसा सबल, आश्वस्त, आत्मविश्वास से भरा या जोखिम उठाने वाला नहीं बनाया है कि वह संकटों से जूझ सके। सामाजिक ढांचे, सरोकारों और आदर्शों को तोड़ने वाली शक्तियां अपने कुकृत्यों में बहुत आगे हैं। उनके लिए बना-बनाया कानून कुछ नहीं कर पा रहा और सरकारों को नए कानून बनाने पड़ रहे हैं। अपराधी, हर नए बनने वाले या अस्तित्व में आने वाले कानून से ज्यादा शातिर और दुस्साहसी हो गया है। किसी अपराध की घटना सामने आने के बाद पुलिस के बड़े से बड़े अधिकारी का वक्तव्य बड़ा ही हतप्रभ कर देने वाला होता है।

हमारे सिनेमा के खलनायक बेचारे दयनीय हैं। वे कई बार षड्यंत्र करते-करते जोकर की तरह व्यवहार करने लगते हैं। लेकिन समाज का खलनायक अपनी तरह से निश्चिंत है। अखबारों के पन्ने अपराध समाचारों से जाग कर बैठने वाले व्यक्ति को कई बार न केवल पूरे दिन के लिए, बल्कि जीवन भर के लिए डरा दिया करते हैं। इस तरह हर दिन हम जीवन भर अपने और अपने लोगों के लिए डरने पर मजबूर हैं।

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