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दुनिया मेरे आगेः तकनीकि दीवारें

बचपन की यादों में स्कूल और अलग-अलग मौके पर छुट्टियों के दिन की खास जगह बची रह जाती है। फिलहाल तो स्कूलों में परीक्षाओं के दौर हैं, लेकिन दो महीने बाद का इंतजार बच्चों को अभी से रहने लगता है।

Author February 24, 2018 4:06 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

बचपन की यादों में स्कूल और अलग-अलग मौके पर छुट्टियों के दिन की खास जगह बची रह जाती है। फिलहाल तो स्कूलों में परीक्षाओं के दौर हैं, लेकिन दो महीने बाद का इंतजार बच्चों को अभी से रहने लगता है। मुझे भी गरमी की छुट्टियों के बारे में सुनते ही वे दिन याद आ जाते हैं, जिनका इंतजार बचपन में मैं और मेरा छोटा भाई बड़ी ही शिद्दत से करते थे। बस यही इंतजार रहता था कि कब हमारे कुछ और संबंधियों के भी बच्चे आएंगे और हम सब मिल कर खूब खेलेंगे। उन छुट्टियों में हमें कई सारे काम करने होते थे। जैसे मिट्टी के वे छोटे-छोटे और कच्चे घर फिर से बनाने होते थे, जो हर साल की तरह पिछले साल हमारी छुट्टियां खत्म होते ही मां ने हटा दिए थे। जब वे बच्चे आते तब उन्हें यह भी बताना होता था कि इस साल हमारे गांव की दुकानों पर कौन-कौन सी नई खट्टी-मीठी गोलियां और टॉफियां आ गई हैं। पिछले साल मई-जून में ही एक दिन मैंने अपनी एक और रिश्तेदार के बेटे को फोन किया। उनके घर में तीन बच्चे हैं। इसके अलावा, एक अन्य संबंधी के दो और बच्चे छुट्टियों में उनके घर आए हुए थे। सभी की उम्र छह से बारह साल के बीच थी।

घर में पांच बच्चे होने के बावजूद फोन पर बात करते हुए उनके घर का माहौल मुझे काफी शांत लग रहा था। मैंने उनसे पूछा कि बच्चे घर पर नहीं हैं क्या, तो उन्होंने जवाब दिया के बच्चे घर पर ही हैं। फिर मुझे लगा कि बच्चे किसी दूसरे कमरे में होंगे, इसलिए उनकी आवाज नहीं आ रही है। लेकिन इस बारे में पूछने पर पता चला कि सारे बच्चे उनके साथ ही बैठ कर खेल रहे हैं। यह मेरे लिए हैरान होने और चौंकने की बात थी कि वहीं पांच बच्चे खेल रहे हैं और फोन पर कोई आवाज या शोर जैसा कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था। भाई ने बताया कि घर के सभी लोगों के पास उनके मोबाइल हैं और उसमें टीम बना कर सभी आॅनलाइन गेम खेल रहे हैं। उस समय यह सुन कर मैं हंसने लगी, क्योंकि मैंने सोचा नहीं था कि वे सभी बच्चे इस तरह खेल रहे होंगे। लेकिन इस अनुभव ने मुझे कई अन्य पक्षों पर भी सोचने के लिए मजबूर कर दिया।

मोबाइल फोन में आॅनलाइन टीम बना कर खेल खेलने के इस अनुभव ने मुझे रवींद्रनाथ ठाकुर के लेख ‘सभ्यता और प्रगति’ में साझा किए गए उनके बचपन के अनुभवों की याद दिला दी। जब वे बच्चे थे तो छोटी-छोटी चीजों से अपने खिलौने बनाने और अपनी कल्पना में नए-नए खेल ईजाद करने की उन्हें पूरी आजादी थी। उनके खेलने का मजा उनके साथियों की भागीदारी पर भी निर्भर करता था। लेकिन एक दिन उनका एक साथी एक महंगा खिलौना उनके बाल समाज में लाया। वह इस खिलौने पर बहुत इठलाता था। उसके बाद वह अपने साथियों के साथ न तो खेलता था और न ही अपने खिलौने से उन्हें खेलने देता था। उसका ध्यान अपने दोस्तों के साथ खेलने के बजाय अपने खिलौने को देखने और सुरक्षित रखने में रहता था।

लेकिन इस महंगे खिलौने से खेलने के प्रलोभन में उसने एक ऐसी चीज खो दी थी जो कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण थी- एक संवेदनशील, श्रेष्ठ और पूर्ण बच्चा। उसके खेल में न कोई रचनात्मक ऊर्जा और आनंद था और न ही साथियों को खुला निमंत्रण। खेल-कूद जैसी गतिविधि का संबंध शारीरिक और मानसिक चुस्ती, भागदौड़, हंसी-ठिठोली आदि से होता है। लेकिन आजकल के अनुभवों से ऐसा लगता है, मानो इसका पूरा अर्थ ही बदल गया है। इस प्रवृत्ति में न केवल बच्चे, बल्कि माता-पिता भी खुद को ढालने में लगे हैं। हालांकि इसमें उनकी व्यस्तता और अन्य बाध्यताएं भी जिम्मेदार हैं, लेकिन हम सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ सकते। बच्चा माता-पिता या वयस्कों को उनके काम में परेशान न करे और व्यस्त रहे, इसके लिए उन्हें मोबाइल फोन देकर बहलाना सामान्य-सी बात हो गई है।

जब भी बच्चा कोई शरारत करता है, जैसे कुछ मांगना, बाहर जाने या इधर-उधर घूमने की जिद करना तो मोबाइल फोन देकर उसे शांत रखने की कोशिश की जाती है। हम वयस्क होने के नाते भी इस बात को सही ढंग से नहीं समझ पा रहे हैं। ऐसा करके घूमने, चीजों को छूने, आसपास के पौधों, वस्तुओं को छूकर देखने, महसूस करने के अवसरों को हम उनके बचपन और बाल अनुभवों से बड़ी आसानी से निकाल कर फेंक रहे हैं। ऐसी स्थिति में अगर यह कहा जाए कि वर्तमान में बच्चों के खेल-कूद का तकनीकी घेराव हो गया है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। लेकिन यह चिंता की बात है कि बच्चे जिस कदर मशीनों से घिर रहे हैं, उनसे खेल के मैदान छूट रहे हैं, उनका आपस में मिलना-जुलना कम हो रहा है, ऐसे में भविष्य में समाज और सामाजिक संबंधों के क्या स्वरूप होंगे और उसमें संवेदनाओं की क्या जगह होगी? ऐसा हुआ तो उसका नुकसान सबको उठाना होगा!

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