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दुनिया मेरे आगेः जीवंत वसंत

प्रकृति का शृंगार और मनुष्य का उल्लास है वसंत। माघ शुक्ल पंचमी से मौसम जैसे करवट लेता है।

Author January 25, 2018 3:01 AM

पूरम सरमा

प्रकृति का शृंगार और मनुष्य का उल्लास है वसंत। माघ शुक्ल पंचमी से मौसम जैसे करवट लेता है। हवा भले चुभती हो, लेकिन धूप चटकने लगती है और देह को रास आने वाला मलयानल सनन-सनन की आवाज में इधर से उधर दौड़-धूप करता लगता है। खुले आकाश पेड़-पत्तों और नदियों-खेतों के चौरस दालानों में वसंत खिलखिलाता है। सरसों की तो बस पूछिए मत। वह पीताम्बरी बन जाती है धरती की। बूढ़ा पीपल और नीम भी बतियाने लगते हैं। अमराई में बौराने लगता है कोई बौर। फूलों की यह खास ऋतु होती है। फूल तो जैसे खिल जाने को बेताब हों। भीतर का उल्लास और उत्साह, वसंत के स्वागत में लदे-फदे वृक्ष चुप नहीं रहते। पक्षियों का शांत मन कलरव कर उठता है और वहां घरों से भी कहीं ज्यादा गहमागहमी हो जाती है। छोटी-छोटी चिड़िया की जुबान लंबी हो जाती है और कोयल तो जैसे इन सबकी प्रधान बन कर अपनी एक ही टेर से सब पर साम्राज्य जमा लेना चाहती है। कहीं से उड़ता आता परिंदा परदेसी के लौटने जैसी बेला का स्मरण दिलाता है।

रात में चांदनी के हल्के प्रकाश में कोचर बोलता है, तो वह डराता नहीं, बल्कि उसकी कर्कश आवाज भी जैसे अपनेपन में बदल जाती है। दूधिया प्रकाश में नहाई चम्पा की कली और रजनीगंधा के सफेद फूल एक-दूसरे से लजाने लगते हैं। पलाश फूटने को तत्पर और मौलश्री में नव पल्लवन प्रारंभ हो जाता है। वसंत का जैसे अंत होगा ही नहीं, वह बागों में आसन जमाए ऐसे जा बैठा है कि वनिता विभोर होकर मस्ती में प्रकृति का राग आलाप रही है। वसंतोत्सव की इस बेला में धरती की शृंगारप्रियता चरम पर है।

वसंत का पता निगोड़े कागा को भी चल गया है। वह किसी मुंडेर पर जाकर कांव-कांव का बेसुरा राग आलापता है। लेकिन यह राग तो बिरहनियों की आशा का केंद्र और उनके भीतर सोई निराशा को आशा में बदलने का राग है। इसलिए वे उन्हें घी से सने ग्रास खिलाते हुए मनोकामना पूर्ण होने की अभिलाषा जताती हैं। तभी वह फुर्र से उड़ जाता है। उसे लगता है कि परदेश से लौटने वाला अब पल दो पल के बाद लौट ही आएगा, पूरा वसंत भले बीत जाए इसी आंख-मिचौली में, लेकिन उसका कर्कश राग विरहणी के पोर-पोर को वसंत में भिगो जाता है। फगुनौरी तीर की तरह चुभती है और देह में हो रहे परिवर्तन उसे संपूर्ण चेतना के साथ वसंत पर केंद्रित रखते हैं। कहीं रात में कोई छैला अलगोजे पर जब कजरी की टेर लगाता है तो हृदय विदीर्ण होकर आंखों से नींद उड़ा देता है। बस पूरी रात करवटों में बीत जाती है।

वसंत को कौन नहीं चाहेगा… कौन नहीं पहचानेगा! वह शिशुओं की भोली मुस्कानों और तुतलाती बोली में चलना सीखता है। वह मां की ममता और पिता के वात्सल्य में भी अठखेलियां करता है। सब ठौर व्याप्त यह वसंत कहीं कालीदास बन जाता है, तो कहीं वह निराला-सा फक्कड़ और कहीं वह मधुशाला में डूबा जीवन का सही राग पाने की कोशिश में होता है। पद्माकर के छंद प्रकृति में निनादित होने लगते हैं और प्रकृति अपने पूर्ण उत्कर्ष से बिहारी के संयोग भाव से लबरेज और सराबोर हुई आनंद को तलाश लेती है।
मनुष्य के भीतर कविताएं जन्म लेती हैं और पशु-पक्षियों की अपनी भाषा का यही समय है, जब वह अपना स्वर पा जाती है। विहान बेला में ही जैसे वे दौड़-धूप में लगे स्वागत द्वार सजाए शहनाई पर कोई मीठा राग गाने में व्यस्त हों। वसंत को ऋतुओं का राजा इसीलिए माना गया है कि वह हर किसी को आभास दे जाता है कि वह आ गया है। जीव-जगत भरमाया चौकन्ना और प्रसन्नता से भरा दिग्भ्रमित-सा अपने में ही खो जाता है। वनचर इधर से उधर, उधर से इधर बस भागा-दौड़ी में लग जाते हैं। हिरनों के झुंड पोखर के पास खड़े प्रकृति को निहारते हैं और खरगोश बिलों से बाहर आकर निर्भीक होकर घूमते हैं।

वसंत को जो जान गया, वह मान गया कि इसका नशा कितना गहरा और सुखकारी है। इसलिए वह इसमें डूबना चाहता है। वसंत की किलकारी से पहाड़ों का वैभव भी अछूता नहीं रहा है। वे भव्य परिधान से सजे तलहटी में बंदनवारें सजाए वनदेवी के स्वागत के लिए नगाड़े बजा रहे हैं। सूरज सबसे पहले छूता है उनके शिखर को। भीतर की कंदराओं तक में कोहरे का धुआं इस वसंत की दस्तक से दौड़ कर बाहर आ गया है और पहाड़ का पूरा सौष्ठव सीना ताने वसंत के आगमन से उत्फुल्ल है। इन पत्थर दिल पहाड़ों में भी जान डाल दी है लाल टहनी पर झूलते एक फूल ने। वसंत को तो जैसे यही दायित्व मिला था कि वह हर किसी को जीवंत कर डाले। पेड़ों, पत्तों, फूलों और फलों में वंसत ने जो प्राण फूंका है, उससे धरती उसकी ऋणी हो गई है और वह वसंत का आभार प्रकट करती दिखती है। प्रकृति के इस मनोहारी और अनुपम सौंदर्य ने हर किसी को मोह लिया है।

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