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दुनिया मेरे आगेः फीके रंगों का वैशाख

साल भर में वैशाखी का दिन कभी गांव-कस्बों में खुशियों और उमंगों के मेलों में डूबा हुआ नजर आता था। लेकिन शहरों में गुम होते समाज और संस्कृति के सवालों के बीच बदलते समय ने सबसे बड़ा कुठाराघात गांवों की संस्कृति और परंपरा के साथ किया है।
Author April 13, 2018 02:42 am

कृष्ण कुमार रत्तू

साल भर में वैशाखी का दिन कभी गांव-कस्बों में खुशियों और उमंगों के मेलों में डूबा हुआ नजर आता था। लेकिन शहरों में गुम होते समाज और संस्कृति के सवालों के बीच बदलते समय ने सबसे बड़ा कुठाराघात गांवों की संस्कृति और परंपरा के साथ किया है। आज गांव खंडहर होते खामोशी में मौन धारण किए हुए हैं और कभी गांव को ही अपना जीवन मानने वाला आदमी जीवन के ही सवालों से जूझता हुआ गांवों से टूट कर शहर की ओर भाग रहा है। ऐसे माहौल में वैशाख की चटख धूप और नौरंगी सूर्य की गरमी में डूबे हुए उस आदमी का गांव आज बेहद उदास है।

उत्तर भारत में वैशाख महीने में आने वाला सबसे बड़ा पर्व वैशाखी का है। अब यह त्योहार शहरीकरण की चकाचौंध में एक कृत्रिम आयोजन की तरह लगने लगा है और राजनीति ने ग्रामीण इलाकों की स्वस्थ सामाजिक आबोहवा में आपसी मेलजोल और प्यार की संस्कृति को जहरीले दायरे में बांट दिया है। जिन्हें याद होगा, वे जानते होंगे कि कभी गांव में वैशाख महीने में जिंदगी का खुशियों से लबरेज वातावरण होता था, जिसमें किसी उलझन और दबाव के बिना सहजता के साथ गंवई रसरंजन समूचे गांव में धर्म या जाति से निरपेक्ष समाज के हर वर्ग को एक समरसता और भाईचारे के सूत्र में बांधता था। गांवों में नई फसल की आमद का एक अनूठा त्योहार तो इन दिनों भी मनाया जाता है, लेकिन वैशाख की संक्रांति को पंजाब में सिख पंथ की स्थापना का पर्व भी कभी गांव की रूह में आस्था का अलौकिक जज्बा भरता था।

आज विज्ञान के विकास के कारण जिस नई सामाजिक पाश्चात्य जिंदगी के नवधनाढ्य वर्ग ने गांवों और उनकी मेलजोल और सहयोग की संस्कृति को खत्म कर दिया है, उसमें गांवों के लोगों के उत्साह और उमंगों के पर्व वैशाखी की शक्ल को भी लगभग बदल दिया है। अब ग्रामीण इलाकों में सालाना या छह महीने पर लगने वाले मेलों का स्थान गांवों से हट कर शहरों के समारोह भवनों या मॉलों में ‘इवेंट’ और वैशाख ‘थीम’ में सीमित होकर रह गया है। गांवों में गाए जाने वाले वैशाख संक्रांति के गुड़ से भी मीठे गीत अब अलोप हो गए हैं। उनके स्थान पर शहरों की लचर फिल्मी संस्कृति से भरे द्विअर्थी संवादों से लटके-झटके देते गीत गांवों के युवाओं में खूब लोकप्रिय हो रहे हैं। अब चीखते-चिल्लाते और आवाज की धमक से आसपास को दहलाते डीजे की चकाचौंध ने मधुर और कर्णप्रिय गीतों और धुनों पर सहजता से तन-मन की थिरकन को छीन लिया है। लोगों के मन से जुड़े तारों को उन्माद में तब्दील कर दिया है। सच तो यह है कि अपनी जमीन और भाषा के रिश्ते से उदासीन हुए युवा अपनी पहचान को पूरी तरह गंवा चुके हैं। सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि इन सबके बावजूद कोई भी व्यक्ति इस पर संजीदा होकर बात करने और सोचने के लिए तैयार नहीं है। बल्कि यों कहें कि संस्कृति के इन सवालों पर बात करने को पिछड़ापन मानता है। जबकि संस्कृति की जड़ता और प्रतिगामी पहलू के पीछे पागल होने में उसे कोई हिचक नहीं होती।

आजकल इस मौसम में वैशाख की शुरुआत में तपते हुए सूर्य के तेज में फीके होते रंगों का आलम यह है कि अब ये रंग सबरंग नहीं रहे, अलबत्ता बदरंग रंगों में तब्दील हो गए हैं। वैशाख अब परंपरा का और गांव के गंवई रिश्तों का एक खत्म होता ऐसा समय है जो वैशाख की रिवायती खुशियों को भी लील गया है। गांव के लोगों का अपनी जमीन और घर से रिश्ता लगभग टूट गया है। लगता है, वैशाख की इस पहली आमद का पहला सूरज भी जैसे रूठ गया है। अलोप होते गांवों में वैशाखी के गीत और मेले अब नहीं भरते। अब उनकी जगह फूहड़ गीतों के अखाड़ों ने ले ली है, जिन्हें कई बार परिवार के साथ सुनना असहज कर देता है। सोशल मीडिया ने उसको सबके साथ इस तरह से बांट दिया है कि जैसे जीवन का सबसे बड़ा बहुमूल्य खजाना यही हो। लेकिन कई बार संस्कृति बचाने के नाम पर हिंसा करने वाले लोगों को संस्कृति के इस तरीके से चुपचाप नष्ट होते जाने पर कोई फिक्र नहीं होती।
समय का इतिहास बताता है कि बदलाव प्रकृति का नियम है। लेकिन लोग जब अपनी परंपराएं, इतिहास और भाषा की संस्कृति को गंवा देते हैं और आपसी द्वेष बढ़ाने वाले बेमानी मूल्यों को ही संस्कृति मानने लगते हैं तो अकेले वैशाख क्या, हम अपनी पहचान के सभी नक्शों को वक्त के खंडहरों में बदलते लाचार देखते रह जाते हैं। शायद यह हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी है कि हम अपने सहज स्वाद को कहीं दूर छोड़ कर आगे निकल आए हैं। यहां से लौटने का सवाल मैं आप सब पर छोड़ता हूं इन फीके रंगों के वैशाख में!

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