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दुनिया मेरे आगेः भरोसे की कला

नाटक के लिए कहा जाता है कि यह विश्वास दिलाने की कला है। दरअसल, कला का हर माध्यम यकीन दिलाने की कला ही है।

Author January 2, 2018 02:43 am
(प्रतीकात्मक तस्वीर)

सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी

नाटक के लिए कहा जाता है कि यह विश्वास दिलाने की कला है। दरअसल, कला का हर माध्यम यकीन दिलाने की कला ही है। फिर भले ही वह संगीत हो, नृत्य, चित्रकला, सिनेमा हो या नाटक या कविता। भौतिक दुनिया में आप जितनी भी वस्तुएं देखते हैं, वे सभी अपने मूल रूप की छाया या प्रतिबिंब हैं। हर कलाकार अपने ही नजरिए से दुनिया को देखता है। तभी तो जो है और उसने जैसा उसे देखा है, उसमें फर्क होता है, क्योंकि हर व्यक्ति की दृष्टि दूसरे से अलग होती है। यही कारण है कि असलियत और एक दृष्टि विशेष से नजर आने वाली असलियत में फर्क होता है। यही फर्क कलाकार की दुनिया और वास्तविक दुनिया में होता है।

आजकल चूंकि नवीनतम तकनीक उपलब्ध हैं, इस कारण किसी कस्बे या देहात में बैठ कर भी कैमरे के जरिए न्यूयार्क, पेरिस, स्विट्जरलैंड या मुंबई या फिर कश्मीर की पृष्ठभूमि दिखाई जा सकती है। पहले कृत्रिम वर्षा के लिए फोम आदि का सहारा लिया जाता था। आज कैमरे में सभी तरह के फोटो उपलब्ध हैं और उनका उपयोग हर कुशल निर्माता करता है। यही सृजनात्मकता है। आप कितने कौशल और चतुराई से संसाधनों का उपयोग करते हैं, इस पर आपकी सफलता निर्भर है।

आज जब कोई नाटक या फिल्म देखते हैं, पेंटिंग पर नजर डालते हैं या कविता पढ़ते हैं तो यकीन दिलाया जाता है कि हम जो कुछ भी देख या पढ़ रहे हैं, वह वैसा ही रचा-बसा है, जैसा हमारी जिंदगी में। कलाकार जितनी अच्छी तरह से यह विकल्प पेश करता है, उतना ही कामयाब होता है। जब हम किसी भी विधा की अभिव्यक्ति देखते हैं तो हमें लगता है कि इसमें दृश्य, घटनाएं और चरित्र हमारे जीवन का हिस्सा हैं। वे हमें अपने आसपास ही चलते-फिरते नजर आते हैं। यही कला और जीवन का करीबी रिश्ता है। यकीन दिलाने की कला का यही कौशल है कि वह कला को जीवन से इस खूबी से जोड़े कि दोनों में कोई फर्क नहीं बचे। कविता सुनते या पढ़ते वक्त और संगीत-नृत्य को सुनते-देखते हुए भी यही अनुभूति होती है कि मानो हमारे मन की बात व्यक्त की गई हो। विश्वास दिलाने का यही हुनर कला को जीवंत बनाता है।

कई बार कविता पढ़ते या सुनते समय मुझे यही लगता है कि जो कवि कह रहा है, वह वही है जो खुद मैं कहना चाहता रहा हूं, पर कह नहीं पाया। खासकर अच्छी गजलों को पढ़ते या सुनते हुए अक्सर यही महसूस होता रहा है। मूर्तिकार असलियत का यकीन दिलाने लायक मूर्ति गढ़ने की कोशिश में और अन्य कलाकार भी इसी तरह यकीन दिलाने लायक कृति के निर्माण में जिंदगी गुजार देते हैं। दरअसल, हर कला का स्रोत जिंदगी ही है। जीवन से ही कला की उत्पत्ति हुई और धीरे-धीरे सभी कलाएं समय के साथ और उन्नत होती गर्इं। हर युग में कलाओं में परिवर्तन हुए। फिर चाहे वह मूर्ति कला हो, चित्रकारी, नृत्य या गायन या कविता। प्रयोग भी हुए और समसामयिक घटना क्रम का प्रभाव भी पड़ा। लेकिन कलाओं का मूल जुड़ाव जिंदगी से बना रहा। अगर कला जीवन से कट जाती तो अलग-थलग पड़ जाती और अप्रासंगिक हो जाती।

प्रचार-प्रसार के इस दौर में कलाओं के कुछ रूप सुर्खियों में आए। इंटरनेट के जमाने में वे ही कलाकार चर्चित हुए जो इंटरनेट में पहुंचे या पहुंचाए गए। जो इसके बाहर रहे, वे उतने चर्चित नहीं हुए। यह भी एक विचित्र बात है कि सोशल मीडिया जिसे चाहे, रातों-रात आसमान पर पहुंचा दे। शुरुआती दौर में सोशल मीडिया का शोर और असर राजनीति और सम-सामयिक सरोकारों तक सीमित था। अब वह कलाओं को भी प्रभावित कर रहा है। कला भी आसपास के परिवर्तनों से अप्रभावित कैसे रह सकती है?
हर कलाकार अपने हुनर को लगातार अभ्यास और रचनाधर्मिता के सहारे चमकाने की कोशिश करता है। इसीलिए बेजान बांसुरी, शहनाई, तबला और ढोलक स्तरीय कलाकार के हाथों से जीवंत होकर बोलने लगती हैं। यही चित्रकला, नृत्य, कविता या शायरी में भी होता है। कला का वादों की वाद्या में और इस या उस विधा का एक खास दायरे में सिमट जाना उसे संकीर्ण तो करता ही है, अनावश्यक विवाद और खेमेबंदी को भी प्रोत्साहित करता है।

दरअसल, हर विधा अपने-अपने तरीके से विकल्प पेश करने या यकीन दिलाने की कला ही है। कौन-सी कला कितनी कामयाब हो पाती है, यह कलाकार की क्षमता और उसे मिलने वाले अवसर और प्रोत्साहन दर पर निर्भर करता है। अभिव्यक्ति की सफाई और अनुभूति की तीव्रता कला की सफलता का मूल मंत्र है। कलाकार कितनी अच्छी तरह हमें यकीन दिलाता है, यह महत्त्वपूर्ण है। सच यह है कि अगर अनुभव कला-जीवन का विश्वसनीय विकल्प है तो उस विकल्प पर यकीन दिलाने का हुनर भी एक कला ही है।

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