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दुनिया मेरे आगेः सुनहरी धूप में ऊंघता देश

हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता और संस्कृति के हमारे दंभ को दो सौ वर्षों की गुलामी ने चूर-चूर कर दिया था। गुलामी की जंजीरों से जब मुक्ति मिली तो लगा था कि देश का स्वर्णिम इतिहास अब फिर से लिखा जाएगा।

हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता और संस्कृति के हमारे दंभ को दो सौ वर्षों की गुलामी ने चूर-चूर कर दिया था। गुलामी की जंजीरों से जब मुक्ति मिली तो लगा था कि देश का स्वर्णिम इतिहास अब फिर से लिखा जाएगा। यह देश एक बार फिर से सुशासन, समृद्धि और समता का मंत्र जपता हुआ विश्व के अग्रणी देशों के बीच स्थान पाएगा। न्यायपूर्ण सुशासन की नींव रखने की उम्मीद गांधी बाबा के उन अहिंसक सैनिकों से की गई थी जो स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों में शहर की गलियों में चक्कर लगाकर प्रभातफेरी गाते थे ‘उठ जाग मुसाफिर भोर भई, अब रैन कहां जो सोवत है।’ वे ही बताते थे ‘जो सोवत है सो खोवत है, जो जागत है सो पावत है’। गुलामी की नींद से झकझोर कर उठा देने वाले इस आह्वान की शक्ति थी मुसाफिर को ‘तेरी गठरी में लागा चोर’ कह कर सचेत करने में। अब देश उस संदेश की गहराई को इतना भूल चुका है कि चुराई हुई गठरियां दिख भी जाएं तो उनमें लागा हुआ चोर किसी को नहीं दीखता।

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रुडयार्ड किपलिंग के अनुसार ‘पूरब पूरब है और पश्चिम पश्चिम, और वे दोनों कभी मिल नहीं पाएंगे।’ लेकिन सुबह की नींद त्यागने का संदेश देने में पूरब और पश्चिम करीब आ जाते थे। पूरब उषाकाल की लाली में डूबती रात्रि के अंतिम प्रहर की अनुशंसा करता था उसे ब्राह्म मुहूर्त कह कर। उधर धुर पश्चिम अर्थात अमेरिका में बेंजामिन फ्रैंकलिन का कहना था ‘अर्ली टु बेड ऐंड अर्ली टु राइज, मेक्स अ मैन हेल्दी वेल्दी ऐंड वाइज।’ पश्चिम के अनुसार, भोर से ही चुगने में जुट जाने वाली चिड़िया के हिस्से में खाद्य कीड़े-मकोड़े आएंगे। लेकिन पश्चिम भोर में उठ जाने के बाद शेष दिन भर सजग रहने को भी जीवन की नियामतें पाने के लिए आवश्यक समझता है। इधर हमें भोर में जगाया गया तो अर्ली बर्ड की तरह हम भी स्वतंत्रता का दाना तो चुग पाए लेकिन अब इस विरासत को ठीक से संभाल नहीं पा रहे हैं। दौड़ के आरंभ में खरगोश की तरह काफी स्फूर्ति के साथ लंबी-लंबी छलांगें लगाने के लिए हम उठे तो, लेकिन जल्दी ही उन छलांगों से थक गए। अब हम रास्तों से थक कर दो घड़ी नींद के आगोश में जा बैठने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहे हैं।

जिन्हें ठेल-ठेल कर तड़के उठाया जाता रहा हो उन्हें आदतन भोर में ही नींद खुल जाना अभिशाप-सा लगता है। लेकिन किसी शायर के अनुसार ‘हरेक रंज में राहत है आदमी के लिए।’ और नींद भी कभी रंज देती है तो कभी राहत। राहत पहुंचाती है गर्मी की लंबी दोपहरिया में बांहें फैलाए किसी सघन पेड़ की छांव तले किसी गहरी खटिया में चैन खोजती हुई नींद या किसी उबाऊ भाषण के दौरान या बेमन के विषय की कक्षा में बरबस झोंकों में आने वाली नींद। लेकिन सबसे मीठी नींद तो वह है जो किसी सेवानिवृत्त वृद्ध को भोर में ही उठ बैठने के रंज में राहत पहुंचा सके। ऐसी सुहानी और भली नींद सर्दियों की सुबह में दैनिक क्रियाओं से मुक्त होकर, पेट भर नाश्ता कर लेने के बाद गुनगुनी सुनहरी धूप में किसी आरामकुर्सी पर पैर फैलाकर अखबार के पृष्ठों पर फैले आतंक, हत्या, बलात्कार, रेल दुर्घटनाओं और नेताओं के घिसे-पिटे बयानों से थककर आती है। ऐसी कोमल और भावभीनी नींद जिसमें अखबार पर हाथों की पकड़ धी-रे धी-रे ढीली होती जाती है, चश्मा आंखों से अपने आप नीचे सरक आता है और अखबार हाथों से छूटकर सीने पर आकर टिक जाता है।

पिछले दिनों सार्वजनिक जीवन में बहुत कुछ ऐसा हुआ है कि लगता है जैसे यह पूरा देश जो कभी गुलामी की जंजीरें तोड़ कर नवनिर्माण के गीत गाता हुआ भोर के धुंधलके में ही प्रभातफेरी पर निकल पड़ता था अब किसी थके हुए बूढ़े की तरह थोड़ी बहुत-भौतिक सुविधाओं की गुनगुनी धूप पाकर अपनी आंखें बंद करके ऊंघने लगा है। अखबारों की सुर्खियों से चीखते सार्वजनिक जीवन में व्याप्त अराजकता के समाचार सर्द बर्फानी हवाओं की तरह जनमानस को त्रस्त कर रहे हैं लेकिन अदालतें, जांच आयोग, सार्वजनिक संस्थाएं, सभी तकनीकी खामियों की सुनहरी धूप सेंक रही हैं। वे जब ऊंघती हैं तो निर्विवाद तथ्यों के अखबार उनके शिथिल हाथों से फिसल कर गिर-गिर जाते हैं, न्याय का चश्मा जो सार्वजनिक जीवन में व्याप्त भ्रष्टाचार देख पाने की क्षमता दे सकता है उनकी आंखों से फिसल कर नीचे गिर जाता है। हमारी संस्थाएं हत्या देख पाती हैं लेकिन हत्यारे को नहीं, भ्रष्टाचार देख पाती हैं, भ्रष्टाचारी को नहीं। आरामकुर्सियों में बैठे हुए कुछ सुविधासंपन्न लोगों को मयस्सर होने वाली गुनगुनी धूप का मीठा स्पर्श उन्हें देश की हड््िडयों को भेद कर अंदर पैठ जाने वाली सर्द हवाओं जैसी हताशा का गुमान भी नहीं होने देता है।

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