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दुनिया मेरे आगे: अतीत की गलियां

आने वाली पीढ़ी के लिए इंटरनेट भी शायद पुराना हो जाए, क्योंकि हर साल या दो साल में तकनीकी कुछ नया लेकर आती है। हालांकि टेक्नोलॉजी कितनी भी तेजी से आगे क्यों न बढ़ती जाए, कितने ही स्मार्ट कंप्यूटर, कितने ही तेज कंप्यूटर क्यों न आ जाएं, हम जैसे कंप्यूटर के पहले-पहले उपयोगकर्ता तब के 1.2 एमबी और 1.44 एमबी की फ्लॉपी के उपयोग का कौतुक बताते ही हैं। आज की पीढ़ी के कई लोगों ने तो शायद फ्लॉपी के बारे में सुना भी नहीं हो।

Film starदिलीप कुमार। फाइल फोटो।

राजेंद्र वामन काटदरे

भूतकाल में रमना हम सभी को अच्छा लगता है। यकीन न हो तो अपने बुजुर्गों की बातें याद करें जो कहते थे कि ‘हमारे जमाने में तो घी चवन्नी सेर मिलता था और छाछ तो दूध-घी वाले फोकट में दे जाते थे’। सिर्फ बुजुर्ग ही क्यों, हम भी तो अपने स्कूली दिनों को याद करते ही हैं और कहीं स्कूल के दिनों का कोई मित्र मिल जाए तो कहना ही क्या! फिर स्कूल के पसंदीदा शिक्षकों की बातें, स्कूल की कक्षाएं छोड़ कर देखी गई फिल्मों की यादें, स्कूल के बाहर टोकरी में बेर-इलायची इमली लेकर बैठने वाली काकी और पेड़ से तोड़ कर खाए अमरूदों और कच्ची कैरियों को याद करते हुए हम भी तो नहीं अघाते!

एक पीढ़ी के हीरो सहगल, मोतीलाल वगैरह थे, उसके बाद देव-दिलीप-राज की तिकड़ी ने लोगों के दिलों पर राज किया। जहां तक हमारी बात है तो हम राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन के दीवाने थे। इसके बाद की पीढ़ी ने शाहरुख खान को दिलों में जगह दी। नई पीढ़ी के अपने नायक हैं और सिनेमा हॉल के बड़े पर्दे की जगह अब इंटरनेट पर वेब सिरीज के रूप में नए-नए धारावाहिक देखने में नई पीढ़ी रमना पसंद करती है। हम देख सकते हैं कि हरेक पीढ़ी अपने समय के नायक-नायिकाओं को याद कर यह राग छेड़ देते हैं कि हमारे जमाने में ऐसी बढ़िया फिल्में बनती थीं।

आने वाली पीढ़ी के लिए इंटरनेट भी शायद पुराना हो जाए, क्योंकि हर साल या दो साल में तकनीकी कुछ नया लेकर आती है। हालांकि टेक्नोलॉजी कितनी भी तेजी से आगे क्यों न बढ़ती जाए, कितने ही स्मार्ट कंप्यूटर, कितने ही तेज कंप्यूटर क्यों न आ जाएं, हम जैसे कंप्यूटर के पहले-पहले उपयोगकर्ता तब के 1.2 एमबी और 1.44 एमबी की फ्लॉपी के उपयोग का कौतुक बताते ही हैं। आज की पीढ़ी के कई लोगों ने तो शायद फ्लॉपी के बारे में सुना भी नहीं हो।

यों हम उस पीढ़ी से हैं, जब दो-तीन या पांच-दस पैसे और पच्चीस-पचास पैसे चलते थे। उन्हें हम चवन्नी, अठन्नी कहते थे। अब तो खैर रुपए और दो रुपए ने भी अपनी कीमत खो दी है। अब ‘कटिंग चाय’ यानी आधी कप चाय के भी कहीं छह रुपए तो कहीं दस रुपए गिनने पड़ते हैं। ऐसे में गायक चंचल का महंगाई पर गाया वह गीत याद आता है कि ‘पहले मुट्ठी में पैसे लेकर थैला भर शक्कर लाते थे… अब थैले में पैसे जाते हैं और मुट्ठी में शक्कर आती है’। आज महंगाई है कि दिनोंदिन बेरोकटोक बढ़ती ही जाती है और एक जमाने में प्याज के दामों पर एक सरकार गिरा दी गई थी। देखिए… दो-तीन पैसों का जिक्र होते ही हम और आप भी आखिर भूतकाल में रम ही गए!

गृहिणियां भी आपस में बात करती हैं तो भाजी-तरकारी की बातें निकल ही आती हैं। फिर बातें वहीं होती हैं कि पहले फूलगोभी और पत्ता-गोभी भी कितनी स्वाद वाली होती थी। हम तो कच्ची खा जाते थे। मगर अब तो न जाने कौन से रसायन, कौन-सी खाद डालते हैं कि फूल तो बड़े-बड़े और सफेद झक आते हैं, मगर स्वाद होता ही नहीं। या फिर यह कहते हैं कि हम तो स्कूल से आते थे तो अचार, मुरब्बे से रोटी खा लेते थे और आज के बच्चे हैं कि नूडल्स, पिज्जा, पास्ता के बिना इनका काम ही नहीं चलता।

बात करें तो बातें स्कूल की हों, फिल्मों की हों या तकनीकी की हों या विशुद्ध घरेलू, यानी साग-भाजी की हों, पुरानी बातें, पुरानी यादें निकल ही आती हैं। ऐसे ही एक घर में बुजुर्ग सासु मां कोने में खटोले पर पड़ी-पड़ी खांस रही थी और मध्यम उम्र की बहू अपने बेटे-बेटी के ब्याह को लेकर चिंतित थी और अपनी बूढ़ी सास को कोसे जा रही थी।

इनके जमाने में तो सोना दो-चार सौ रुपए तोला ही रहा होगा, इतना सस्ता था सोना, मगर ये न हुआ कि दस-पांच तोले सोना लेकर रखतीं तो आज गुड़िया के ब्याह में काम आ जाता! सास खांस रही थी और ताने सुन रही थी, लेकिन सोने की बात पर शायद वे आपा खो बैठीं और खांसते-खांसते बोलीं कि ‘बहू हमसे तो गलती हो ही गई जो सस्ता सोना खरीद कर न रख सके, मगर तुम ये गलती मत करना… अभी सोना चालीस-पैंतालीस हजार तोला ही तो है, तुम ही आठ-दस तोले खरीद कर रख लो, वरना जब तुम बूढ़ी हो जाओगी, तब सोना शायद लाख-दो लाख रूपए तोला होगा… तब तुम्हारी बहु तुम्हे यहीं सुनाएगी कि इतना सस्ता था सोना आपके जमाने में, लेकिन खरीद कर नहीं रखा।’

सच तो यह है कि हर युग, हर काल में, हर जमाने में मानव जाति के सामने नई-नई चुनौतियां, नए-नए आह्वान होते हैं, जिनसे उसे दो-दो हाथ करना होता है, मगर एक चुनौती को पार कर लेने के बाद नई चुनौती ज्यादा कठिन लगती है और पहले वाला आसान। यानी वही कि हमारे जमाने में या पहले तो ऐसा नहीं होता था, या ऐसा होता था। भूतकाल में रमना सचमुच अच्छा लगता है।

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