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दुनिया मेरे आगे: दोहराव का औजार

किसी भी काम को अच्छे से सीखने-समझने के लिए ठहराव का होना थोड़ा जरूरी होता है। छोटा मार्ग आकर्षित जरूर करता है और संयोग से कभी-कभी लक्ष्य शीघ्र मिल भी जाता है, पर ऐसे में हम उन अद्भुत अनुभवों से खुद को वंचित कर देते है जो हमें अभ्यास और पुनरावृत्ति के दौरान परिपक्व, अधिक सक्षम, मजबूत और बहुआयामी बनाते हैं।

Mindशांति के क्षण। फाइल फोटेा

एकता कानूनगो बक्षी

गौर कीजिए कि बचपन के दिनों में ऐसे कौन-से खास शब्द थे, जिनका उपयोग हमारे व्यक्तित्व के निर्माण और मजबूत नींव स्थापित करने के लिए बहुतायत से किया जाता रहा है। संभव है बहुत सारे ऐसे शब्द आपको सूझ गए हों, लेकिन मुझे जिस शब्द ने बहुत प्रभावित किया, वह है- ‘दोहराना’। किसी चीज को बार-बार याद करना या अपने को सक्षम या समर्थ बनाने के लिए पुनरावृत्ति की प्रक्रिया को दोहराना कह सकते हैं। इस प्रक्रिया में इसका ध्यान रखा जाता कि सीखने की प्रक्रिया को पर्याप्त समय दिया जाए।

साथ ही मन को एकाग्र करने पर भी जोर दिया जाता है, ताकि किसी भटकाव से बचा जा सके और मन पूरी तरह से दिए हुए काम या उद्देश्य में रम जाए। शिक्षकों के लिए तो यह सबसे कारगर तरीका रहा। गिनती, पहाड़े, बारहखड़ी और कठिन सबक सिखाने के लिए सख्ती से सैकड़ों बार दोहराने को कहा जाता था, जब तक कि वह कंठस्थ न हो जाए और स्थायी रूप से दिमाग में बैठ जाए। हालांकि केवल रट्टा लगाने से काम नहीं सधता। यह बस एक जरिया होता किसी औजार की तरह मदद करने भर को।

दरअसल, दोहराव या पुनरावृत्ति किसी कार्य में हमें मजबूत बनाती है, बशर्ते हमारा काम सही दिशा और उद्देश्य लिए किया जा रहा हो। लंबे समय तक एक जैसा काम करते रहने से हमारे आत्मविश्वास में जबर्दस्त इजाफा होता है। अनुभव के चलते निपुणता तो आती ही है, कम समय में हम बेहतर प्रदर्शन भी करने लगते हैं। इस तरह दोहराते हुए निर्धारित काम के भीतर की नई संभावनाओं और नवोन्मेष को भी खोज पाना संभव होता जाता है। अपने अनुभव से दूसरे को भी शिक्षित करने के अनेक रास्ते खुलते जाते हैं। एक-एक करके धीरे-धीरे एक से अधिक कार्य संपादित करने की निपुणता और क्षमता हमारे भीतर पैदा होने लगती है।

सर्कस में हमने एक कलाकार को करतब करते हुए देखा है कि वह पहले अपने हाथों से दो बॉल ऊपर उछालता है, फिर उन्हें बेचूक पकड़ता है। फिर दो से तीन बॉल हो जाती है और देखते ही देखते तीन से पांच बॉल वह एक साथ हवा में उछालने और सहजता से संभालने लगता है। गेंदें बहुत रोमांचक रूप से कलाकार के हाथों और हवा में नाचने लगती हैं। उसको मिली तालियों के पीछे यकीनन पर्दे के पीछे उस कलाकार का एकाग्रचित्त अभ्यास और दोहराव की लंबी यात्रा ही रहती है। अनुशासन और समर्पण से किए गए काम बेहतर प्रदर्शन सुनिश्चित करते ही हैं।

कई लोगों को पुनरावृत्ति या दोहराव भारी ऊब भरा भी लग सकता है। हालांकि उबाऊपन एक सहज भाव है, लेकिन नए अनुभव का आकर्षण भी सबमें होता है। हर व्यक्ति जीवन के नए-नए पहलुओं को छूना चाहता है, जिससे उसका व्यक्तित्व निखर सके। मगर इस प्रयास में हड़बड़ाहट की स्थिति उसे दिशाहीन भी कर सकती है।

किसी भी काम को अच्छे से सीखने-समझने के लिए ठहराव का होना थोड़ा जरूरी होता है। छोटा मार्ग आकर्षित जरूर करता है और संयोग से कभी-कभी लक्ष्य शीघ्र मिल भी जाता है, पर ऐसे में हम उन अद्भुत अनुभवों से खुद को वंचित कर देते है जो हमें अभ्यास और पुनरावृत्ति के दौरान परिपक्व, अधिक सक्षम, मजबूत और बहुआयामी बनाते हैं।

हाथ में जो काम लिया है, उसके प्रति हमेशा थोड़ा बहुत लगाव होना भी बेहद जरूरी है। मात्र निपटाने के लिए करना उस काम की गुणवत्ता और सफलता को कमतर तो कर ही देता है, साथ ही काम को बोझ की तरह महसूस करना व्यक्ति को मानसिक और शारीरिक तौर पर पस्त कर देता है। असल में दिए हुए काम को पूरी निष्ठा और रुचि के साथ करना ही लक्ष्य होना चाहिए। ऐसे में हम कठिन और दूरस्थ लक्ष्य को पाने के अनावश्यक तनाव से भी बच पाते हैं। अपने वर्तमान के काम को पूरा करने की जो संतुष्टि मिलती है उससे हमें अगले अभियान और संघर्ष के लिए पर्याप्त ऊर्जा भी मिल जाती है।

एक जैसे कामों को लंबे समय तक करते हुए अगर मन उचट जाए तो अपने बचपन के दिनों को याद कर लेना भी लाभदायक हो सकता है। जिस तरह हम कभी पहाड़े दोहराते थे, अलग-अलग सुर और राग में उन्हें गाते-मुस्कुराते हुए कंठस्थ करने की कोशिश करते थे। कुछ तो ऐसा करते हुए मजेदार भाव-भंगिमाएं बनाते हुए अभिनय के साथ अपना सबक पूरा करते थे।

घर पर खेलते, नाचते हुए हम अपने पाठ मस्ती में दोहराते रहते थे। काम करने के नित नए नवोन्मेषी रोचक तरीके खोजने में हमें कभी कोई परहेज नहीं करना चाहिए। निरर्थक कामों में या फिर जिन कामों में हम अपना भविष्य या उद्देश्य सही दिशा में पूरा होता नही देखते या फिर सामाजिक दायित्वों का निर्वाह नहीं कर पा रहे, उनके प्रति उपेक्षापूर्ण रवैया रखना होगा।

प्राकृतिक रूप से पुनरावृत्ति की प्रक्रिया हमारे जीवन का हिस्सा है। हर नया दिन आमतौर पर पिछले दिन की तरह ही आता है। हर नया साल बीते हुए साल की तरह ही महीनों, दिनों और घंटो, क्षणों में बीतता है। बदलाव की संभावना और शक्ति केवल हमारे भीतर मौजूद होती है। हमारे दृष्टिकोण, काम करने के तरीके, आचरण, ज्ञान, विवेक, इरादों हौसलों की समृद्धि और अच्छे उद्देश्यों में सक्रियता के कारण पूरे दृश्य को बेहतर बना देने की हिम्मत ही है जो हमसे कुछ न कुछ दोहराने का आग्रह करती रहती है।

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