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दुनिया मेरे आगेः दूर बजत कोई धुन

उस उदास रात बहुत सन्नाटा था, दूर-दूर तक कहीं कोई आवाज नहीं आती थी। लग रहा था सारा गांव गहरी नींद में सो रहा था। बस मुझे ही नींद नहीं आ रही थी।

Author February 21, 2018 6:02 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

ममता व्यास

उस उदास रात बहुत सन्नाटा था, दूर-दूर तक कहीं कोई आवाज नहीं आती थी। लग रहा था सारा गांव गहरी नींद में सो रहा था। बस मुझे ही नींद नहीं आ रही थी। तभी बहुत दूर एक गीत सुनाई दिया। इतनी रात में गीत कौन सुन रहा होगा? शायद देर रात तक खुली रहने वाली किसी दवा की दुकान पर बज रहा होगा या कोई मजदूर झूमता हुआ अपने मोबाइल पर सुनते हुए जा रहा होगा। एक पल के लिए आवाज आती थी, दूसरे पल हवाओं में लहरा कर गुम हो जाती थी। मैं गीत को सुनने की पूरी कोशिश कर रही थी, पर सुन या समझ नहीं पा रही थी। उस दूर से आती-जाती आवाज को रोकना चाहती थी, लेकिन कैसे रोकती? उस एक पल में मैं कितनी बेचैन हो गई कि लगता था, बस इसे किसी भी तरह पूरा सुन लूं कहीं। कहीं ये फिर से हवाओं में गुम न हो जाए। मैंने अपनी देह की सारी ऊर्जा उसे सुनने में लगा दी, मगर नाकाम रही। उस रात मन बहुत उदास रहा… दिमाग बेचैन रहा कई हफ्ते तक! कोई अधसुना सुना-सा गीत मुझे इस कदर परेशान कर देगा, कभी सोचा नहीं था। और फिर धीरे-धीरे उस गीत को भूल गई। जिंदगी चलती रही।

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बहुत दिनों बाद एक दिन किचेन में काम करते हुए अचानक से रेडियो पर वही गीत बजा- ‘ये दुनिया उसी की, जमाना उसी का, मुहब्बत में जो हो गया हो किसी का…!’ यह गीत सुन कर उस रात वाली घटना याद आ गई। रेडियो का स्वर ऊंचा कर पूरा गीत सुना, कुकर की सीटी और बर्तनों के शोर के साथ। फिर कई बार सुना। अब भी अक्सर सुनती हूं। लेकिन उस रात वाली मिठास नहीं महसूस हो सकी। मुझे लगता है उस रात वह गीत सन्नाटे में सुनाई दे रहा था या हो सकता है मैं ही उसे पूरे दिल से सुन रही थी और वह गीत भी पता नहीं कितनी दूर से सिर्फ मुझ तक ही आ रहा था। अब भी अक्सर विविध भारती पर फरमाइशी गीत सुनती हूं। अक्सर वह गीत सुनाई देता है, लेकिन न जाने क्यों वैसा अनुभव दोबारा नहीं हुआ। इंतजार करती हूं अक्सर रातों को कि फिर कोई गीत बहुत दूर से मुझ तक आए हवा में लहराता हुआ-सा… बोल या धुन समझ न आए तो न आए, लेकिन वह मन को भाए बस। कोई सुनसान रास्तों से गुजरे और कोई गीत फिर बज उठे… धीरे-से लरजता-सा, कांपता-सा!

मुझे लगता है कि चीजें हमारे बस में नहीं होतीं, जो हमारी पहुंच से बाहर होती हैं और कभी समझ नहीं आतीं, जिन्हें हम कभी पास नहीं रख सकते, छू नहीं सकते, किसी बाक्स में डालकर सुरक्षित नहीं रख सकते, जिनके आने और जाने की कोई तिथि नहीं होती, वही चीजें हमें सबसे अधिक प्रिय होती हैं। उन्हें खोने का डर हमेशा बना रहता है, जाने हुए को भूल जाना और अनजानी चीजों के पीछे दौड़ते जाना- यह मन की फितरत है। मन को नहीं भातीं वे चीजें, जो उसे सहज उपलब्ध हो जाए। उसे चाहिए वह धुन जो कहीं बहुत दूर बजती हो! मन को भाता है दूर बजता वह संगीत जो पल-पल हमारे कानों को छूता है और फिर हवाओं में गुम हो जाता है। हम बेचैन हो उठते हैं कि कौन-सा गीत था, क्या धुन थी! ओह, वह याद क्यों नहीं आ रहा! बस वह मन को भाया था। अब भाए हुए को कैसे खींच कर हाथों में ले आएं! दिखता होता तो देख लेते… आंखों में भर लेते…! ठीक से सुनाई देता हो तो सुन लेते। याद कर लेते गुनगुना लेते। पढ़ने लायक होता तो पढ़ लेते… रख ही लेते कहीं लिख कर किसी गुप्त डायरी में।

बहरहाल, उस गीत को उस सुनसान रात में सुनना, उसका पल-पल मुझ तक कांपते हुए आना मेरे कानों को छूना और फिर पल-पल दूर जाना, खोते जाना… ये अहसास भुलाए नहीं भूलते। मुझे यह भी लगता है कि ये सारा संसार सिर्फ अहसासों के कोमल, नन्हें और पवित्र तंतुओं से बुना हुआ है। वे दिखाई नहीं देते, लेकिन दुनिया की हर घटना के मूल में छिपे होते हैं। दूर से गीत सुनाई देने वाले उस रोज जरूर मैं किसी प्रेमिल अहसास से भरी रही होऊंगी जो मुझे वह गीत इतना प्रिय लगा। जो हमारी अंगुलियों की छुअन से दूर होता है, उसके लिए हमारे अहसास बहुत मजबूत होते हैं। हम अपनी रूह को खींच कर उसमें से अहसास निचोड़ लेते हैं और भेज देते हैं उस अदृश्य, अज्ञात की तरफ! बदले में वह अज्ञात भी आपको जवाब देता है। और आप मंत्रमुग्ध से खोए जाते हैं, भीगते जाते हैं।

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