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भविष्य की फिक्र में

कभी-कभार अपनी कई पुरानी चीजों को निकाल कर देखती हूं तो मन प्रफुल्लित हो उठता है।

house holdसांकेतिक फोटो।

अंबालिका

कभी-कभार अपनी कई पुरानी चीजों को निकाल कर देखती हूं तो मन प्रफुल्लित हो उठता है। उतनी ही तरोताजा, वैसी ही चमकती रंगत, उतनी ही मजबूत बनावट जितनी की खरीदते वक्त थी। वहीं जब आज कोई चीज खरीद लाती हूं तो कुछ ही समय बाद वह अपना चेहरा उतार लेती है। रंग उड़ जाते हैं, पेंच टूट जाते हैं, मानो अपनी बनावट पर खुद ही शर्मिंदा हो रो उठती है। फिर याद आता है कि यह मिलावट का दौर है। मिलावट भी ऐसी कि सच-झूठ का अंतर मिटा दे। इंसान के कर्म इतने गर्त में जा बैठे हैं कि सही और गलत की पहचान में भी अकर्मण्यता नजर आने लगी है। आज इंसान सही-गलत का फैसला भी नहीं ले पा रहा। अपने स्वार्थ की चीजें उसे सही लगती हैं, बाकी चाहे कुछ भी हो।

मैं नहीं जानती कि इन चीजों के लिए किसे दोषी ठहराया जाए। हमारे बुजुर्गों ने कभी भी हमें गलत का साथ देना नहीं सिखाया। पीढ़ियों से हम यही सीखते रहे है। फिर क्यों आज की पीढ़ी के लिए कुछ भी नैतिक-अनैतिक नहीं रह गया है? दरअसल, अपने मूल से उखड़ती पीढ़ी आत्मकेंद्रित बनती जा रही है। उसे लोगों के होने न होने से कोई फर्क नहीं पड़ रहा। वह खुद में मग्न है। यह आत्मकेंद्रित दर्शन भी हमें प्रकारांतर से अपना गुलाम बना रही है। अक्सर ऐसा लगता है कि कल और आज की पीढ़ी एक बड़े खाई से गुजर रही है और यह मिलावट की पद्धति उसी खाई की उपज है। सामान तो क्या, विचार-प्रक्रिया में भी मिलावट होती जा रही है।

आज आमतौर पर लोग यह नहीं समझ पाते कि वे क्या हैं और उन्हें क्या करना चाहिए। वे अपने आत्मबल की पहचान खोते जा रहे हैं। उनमें संयम की कमी होती जा रही है। आजकल बच्चे अमूमन सभी कामों का आसान रास्ता ढूंढ़ते फिरते हैं। परेशानियां उन्हें विचलित करती हैं और वे तुरंत ही गलत का दामन थाम लेते हैं। उलझनों में फंसे रहना और जल्द से जल्द इससे निकलने के उपाय ढूंढ़ना उसे आत्मकेंद्रित बना रहा है। वे यह नहीं समझ पाते हैं कि विपरीत परिस्थितियां हमें मजबूती देती हैं और अनुकूल स्थिति हमें विवेचना का मौका देती हैं।

आज लोग तात्कालिक खुशी ढूंढ़ते हैं। केवल खुशी ही नहीं, अपने जीवन में हर चीज उन्हें तात्कालिक ही चाहिए होती है। वे केवल आज को जीना चाहते हैं, कल के लिए उनके पास वक्त नहीं या फिर कह सकते हैं कि वे बेपरवाह हैं। ‘जिंदगी न मिलेगी दोबारा’ जैसी बातें उनके जेहन में घर करती जा रही हैं। इस तर्ज पर बने सिनेमा भी इसी बात का द्योतक है कि अपने आज को जियो, कल किसने देखा है।

यह सच है कि इंसान को वर्तमान में जीना रहना चाहिए, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि भविष्य की फिक्र को तिलांजलि दे दें। आज को जी तो लें, लेकिन क्या करें जब कल का सामना करना पड़े? पिछला एक साल इस बात का उदाहरण रहा है। एक अप्रत्याशित परिस्थिति की वजह से कितने ही लोगों की नौकरी चली गई और चारों तरफ हताशा फैल गई। लेकिन क्या हम हार मान कर बैठे रहें? जो केवल आज में यकीन करते हैं, अगर उनके अभिभावक ने समय रहते थोड़े संसाधन या पूंजी का संग्रह नहीं किया होता तो क्या इतनी बड़ी विपत्ति का सामना वे कर पाते? अगर वे भी इसी तर्ज पर जीते कि केवल आज ही भर जिंदगी है, तो क्या हुआ होता?

‘कल’ आता है और ‘कल’ को आना ही होता है। हमारा कल हमारे सपने हैं। हमारा कल हमारा विश्वास है, हमारी आशा है और जीवन आशा का ही दूसरा नाम है। फिर उगती पीढ़ी को कोई कैसे समझाए कि तात्कालिकता कुछ भी नहीं होता। इसी को पाने के चक्कर में वे अपने विचार-बिंदु और अपनी जिंदगी में मिलावट किए जा रहे हैं। जबकि जीवन चक्र का नियम ही यही है कि लोग बड़े होते हैं, आजीविका का अर्जन करते हैं, सांसारिक नियमों में बंध कर अपने बच्चों के सुख की कामना करते हुए अंत तक कुछ न कुछ करते जाते हैं। यही आशा और भविष्य जीवन है जो मिलता एक बार ही है, लेकिन अपने सारी जिम्मेदारियां निभाने के लिए मिलता है।

आज हम आत्मकेंद्रित होने के नाम पर अपनी खुशी के लिए आनंदित और उल्लसित होकर अपने आसपास के लोगों का तनिक भी खयाल नहीं रखते। हम भूलते जा रहे हैं कि समाज और राष्ट्र के प्रति भी हमारा कुछ दायित्व है। अपने उल्लास में अगर किसी का अहित हो तो वह अनर्थ होता है। अगर परिवार हमारा आश्रय है तो वह हमारा दायित्व भी है। जीवन में आनंद का स्थान अवश्य है, लेकिन किसी की मयार्दा या किसी के स्वाभिमान को कुचल कर नहीं।

हम उल्लसित रहें, मगर अपने मस्तिष्क और मन में तारतम्य बना कर जिएं। समाज से कुछ लें तो समाज को कुछ दें भी। जीवन में कुछ भी तात्कालिक नहीं होता। यह केवल मानसिक संतुष्टि भर है। जीवन वर्षों की प्रक्रिया का परिणाम है, साधना है। जो आज है, वह कल भी होगा। हमें अपने आने वाली पीढ़ी को बेहतर भविष्य देना सीखना चाहिए। यह नहीं कि सब कुछ आज ही समाप्त कर दें।

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