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फिलहाल मौसम जिस तरह लहरों की तरह ऊपर-नीचे हो रहा है, उसमें वसंत और फागुन की मिलावट है और पारंपरिक तौर पर इसे आम जीवन खास वक्त के तौर पर देखा-समझा जाता है

springसांकेतिक फोटो।

संतोष उत्सुक

फिलहाल मौसम जिस तरह लहरों की तरह ऊपर-नीचे हो रहा है, उसमें वसंत और फागुन की मिलावट है और पारंपरिक तौर पर इसे आम जीवन खास वक्त के तौर पर देखा-समझा जाता है। हो सकता है कि लोग कुछ अलग महसूस करते भी हों। लेकिन मुझे लगता है कि यह मौसम इस बात की ताकीद भी करता है कि तापमान में चूंकि स्थिरता नहीं रहती है, इसलिए अपना खयाल जरा ज्यादा रखा जाए। खासतौर पर मौसम में उतार-चढ़ाव के मद्देनजर बुजुर्गों को घर से बाहर कम निकलने की सलाह दी जाती रही है। यों घर-परिवार में बुजुर्गों का खयाल रखा जाए या नहीं, लेकिन बाजार भलाई और हित के नाम पर हमेशा आगे दिखता है।

एक तरफ मांग के अनुरूप बाजार में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली स्वादिष्ट चीजें और उनके विज्ञापन बढ़ रहे हैं तो दूसरी तरफ बुढ़ापा की रफ्तार कम करने या फिर उसे रोकने तक के लिए दवाइयां बनाने का दावा किया जा रहा है। जाहिर है, इन दावों के साथ वे दवाइयां बिक भी रही हैं। इन दवाइयों के निर्माता कहते हैं कि बुढ़ापा देर से आए, यानी वरिष्ठ जन जीवित रहें और वातावरण को देखते हुए घर से भी कम निकलें या न निकलें। एक तरह से देखें तो विश्व स्वास्थ्य संगठन बुढ़ापे को बीमारी घोषित करने पर विचार कर रहा है। हालांकि बुढ़ापा अगर वास्तविक रूप में आ जाए तो उसे किसी रोगी तरह बरतना पड़ता है, देखभाल और खयाल रखना पड़ता है।

लेकिन इसी क्रम में हो यह भी रहा है कि हमारे बुजुर्ग मकान के एक कोने में घर का अनदेखा सामान की तरह होते जा रहे हैं। यह मान लिया जा सकता है कि हमारे यहां उन्हें जिंदगी की खुशियां, उनके अधिकार दिलाने से संबंधित कानूनों की मौजूदगी है, लेकिन अधिकतर वरिष्ठजन सामाजिकता, परिवार के सम्मान का खयाल, शर्म या अन्य मानसिक परिस्थितियों के कारण कानूनी अधिकारों से वंचित किए जाने के बावजूद न्यायालय की शरण में नहीं जाते।

जिस वृद्धावस्था में पहुंच चुके व्यक्ति को वांछित माहौल, उचित स्वास्थ्य सुविधाएं तो क्या दो वक्त का पौष्टिक नहीं, केवल भरपेट खाना भी नहीं मिलेगा, वह ठीक से उठेगा-बैठेगा और चलेगा कैसे। चिकित्सा की पढ़ाई में शल्य क्रिया के लिए तैयार हो रहे एक नए चिकित्सक कहते हैं कि एक दिन में तीन बार भोजन करना चाहिए। दूसरी तरफ बुढ़ापा आने की प्रक्रिया को धीमी करने में जुटे विशेषज्ञों का कहना है कि दिन में तीन नहीं, दो बार भोजन अवश्य करें। इस सिद्धांत के अनुसार जब भूख लगती है तो मानवीय शरीर को आराम मिलता है और यही स्थिति उम्र बढ़ने की प्रक्रिया में रुकावट पैदा करती है। हमारे यहां तो वैसे भी करोड़ों लोगों को एक वक्त का खाना नसीब नहीं होता। बुढ़ापा विशेषज्ञों के सिद्धांत यहां दो गुणा पहले से ही लागू हैं, क्योंकि करोड़ों लोग एक वक्त ही खाना खा रहे हैं।

किसी भी देश की जनसंख्या में सबसे खराब स्थिति बूढ़ों की होती है। ऐसी वय में पहुंचे बहुत से लोग अपने जीवन का देश छोड़ कर जाना चाहते हैं। यह किसकी नाकामी है। क्या एक समाज और संवेदना से लैस मनुष्य होने के नाते हमें यह सोचने की जरूरत नहीं है? इसमें कोई शक नहीं कि जवानी और उत्तरार्ध कैसे बेहतर बिताया जाए, इस बारे सही सोच विकसित करने की जरूरत है, लेकिन क्या इस क्रम में बुजुर्गों को हाशिये पर धकेल दिया जाना चाहिए? बुढ़ापे को सहज प्राकृतिक बदलाव की तरह लिया जाना चाहिए और समाज-परिवार और सरकार की जिम्मेदारी है कि वे बुढ़ापे को त्रासदी न बनने दें।

कुछ समय पहले इंदौर में बुजुर्गों की घोर अनदेखी, उन्हें कहीं से उठा कर कहीं और फेंकने की घटना और उनकी सामाजिक उपेक्षा यह बताती है कि कानून की ठंडी धूप तले बुजुर्ग कैसे सिकुड़ रहे हैं। हमारे यहां परिवर्तन बहुत समय तक टूटे-फूटे ढंग से चलता, गिरता संभलता है। अगर राजनीतिक समर्थन मिल जाए तो सीधा चल पाता है, नहीं तो धराशायी हो जाता है। लगभग दस साल पहले हुई जनगणना के अनुसार करीब दस करोड़ चालीस लाख से ज्यादा बुजुर्ग हमारे देश का हिस्सा हैं। जीवन साथी की मृत्यु, उससे अलगाव या बच्चों के कहीं दूर चले जाने के कारण भी डेढ़ करोड़ से ज्यदा बुजुर्ग अकेले रह रहे हैं। इनसे बात करने, इनकी बात सुनने वाला कोई नहीं है। इनके लिए बीमारी की हालत ज्यदा दुखदायी रहती है।

गुजरात का एक संगठन अकेले रह गए बुजुर्गों को मिलवाने का काम कर रहा है और आपसी सहमति होने पर उनका विवाह भी करवा दिया जाता है। अगर वे लिव-इन या सहजीवन शैली में रहना चाहते हैं तो उसका प्रबंध भी हो जाता है। अगर समाज वाकई यह मानता है कि बुजुर्गों को भी सम्मानजनक तरीके से जीने का अधिकार है तो उनके इस अधिकार की रक्षा करते हुए संजीदा प्रयास क्यों नहीं किए जाते। अगर अभिभावक किन्हीं कारणों से अपने बच्चों के साथ नहीं रह पाते, जीवन-साथी की मृत्यु हो चुकी है, बीमारी के कारण शरीर साथ नहीं दे रहा, आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है, तो भी समाज और सरकार यह व्यवस्था करे कि वे अपने जीवन को अलविदा भी सम्मानजनक तरीके से करें। यह उनका अधिकार है और इसे पूरा करना समाज और सरकार की जिम्मेदारी है।

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